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4/25/2021

श्री लिंग पुराण ( अनुक्रमणिका )

   
                           
   

श्री लिंग पुराणअनुक्रमणिका)




श्री लिंग पुराण में आज 

*अनुक्रमणिका*


सूतजी बोले- महात्मा ब्रह्मा जी ने ईशान कल्प की कथा लेकर इस लिंग पुराण को बनाया। पुराण का परिमाण तो सौ करोड़ श्लोकों का है परन्तु व्यास जी ने संक्षेप में उनको चार लाख श्लोकों में ही कहा है। व्यास जी ने द्वापर के आदि में उसे अलग-अलग अठारह भागों में विभाजित किया है। उनमें से यहां लिंग पुराण की संख्या ग्यारह है, ऐसा मैंने व्यास जी से सुना है। उसे मैं आप लोगों से अब संक्षेप में कहता हूँ।


इस महापुराण में पहले सृष्टि की रचना प्रधानिक रूप से तथा वैकृतिक रूप से वर्णन की गई है तथा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और ब्रह्माण्ड के आठ आवरण कहे गये हैं। रजोगुण का आश्रय लेकर शर्व (शिव) की उत्पत्ति भी उसी ब्रह्माण्ड से ही हुई है। विष्णु कहो या कालरुद्र कहो वह उस ब्रह्मण्ड में ही शयन करते हैं ।


इसके बाद प्रजापतियों का वर्णन, वाराह भगवान द्वारा पृथ्वी का उद्धार, ब्रह्मा के दिन-रात का परिमाण तथा आयु की गणना बताई है। ब्रह्मा के वर्ष कल्प और युग देवताओं के, मनुष्यों के तथा ध्रुव आदि वर्षों की गणना है। पित्रीश्वरों के वर्षों का वर्णन, चारों आश्रमों के धर्म संसार की अभिवृद्धि देवी का अविर्भाव कहा गया है। स्त्री पुरुष के जोड़े के द्वारा ब्रह्मा का सृष्टि विधान, रोदानान्तर के बाद रुद्र के अष्टक का वर्णन, ब्रह्मा-विष्णु का विवाद, पुनः लिंग रूप से शिव की उत्पत्ति का वर्णन है । शिलाद की तपस्या का वर्णन तथा वृत्रादि इन्द्र के दर्शन का वर्णन, व्यावतार तथा कल्प और मन्वंतरों का वर्णन इस पुराण में किया गया


कल्प कल्पान्तरों की कथा तथा कल्प भेदों के क्रम से वाराह कल्प में वाराह भगवान के अवतार की कथा, मेघ वाराह कल्प में रुद्र के गौरव का गान, पुनः ऋषियों के मध्य में पिनाकी (शिव) के लिंग उत्पत्ति का वर्णन हुआ है ।


लिंग की आराधना, स्थान, पूजा का विधान, शौच ( पवित्रता ), काल लक्षण, वाराह के महात्म्य एवं उनके क्षेत्र का वर्णन, पृथ्वी के स्थानों की संख्या की गिनती, विष्णु के स्थानों की गणना का वर्णन किया गया है । पुनः स्वारोचिष कल्प में दक्ष का पृथ्वी पर पतन, दक्ष का शाप तथा दक्ष का शाप मोचन, कैलाश का वर्णन, चन्द्ररेखा की उत्पत्ति, शिव विवाह की कथा तथा शिव के संध्या वृत्तों की कथा का शुभ वर्णन है। पाशुपात योग का वर्णन चारों युगों का परिमाण तथा युग धर्म का विस्तार पूर्वक वर्णन हुआ है। शिवजी के द्वारा पुत्र उत्पत्ति तथा मैथुन के प्रग से जगत के नाश का भय, देवताओं को सती का शाप, विष्णु भगवान द्वारा रक्षा होना, शिवजी का वीर्योत्सर्ग, स्कन्द का जन्म, ग्रहण आदि पर्व में शिव लिंग को स्नान कराने का फल, क्षुब्दधी का विवाद, दधीचि और विष्णु की कथा, नन्दी नाम वाले देवाधिदेव महादेव की उत्पत्ति, पतिव्रताओं का आख्यान, पशु-पाश का विचार प्रवृत्ति लक्षण तथा निवृत्ति लक्षण का ज्ञान, वशिष्ठ के पुत्रों की उत्पत्ति तथा वशिष्ठ के पुत्र महात्मा मुनियों का वंशविस्तार, राजशक्ति का नाश, विश्वामित्र का दुष्ट भाव तथा कामधेनु का बांधा जाना, वशिष्ठ का पुत्र शोक, अरुन्धती का विलाप, स्नुषा का भेजा जाना, गर्भ स्थित बालक का बोलना, पाराशर, व्यास, शुकदेव जी का अवतार, शक्ति पुत्रों द्वारा राक्षसों का विनाश, पुलस्त्य की आज्ञा से देवताओं का उपकार, विज्ञान और पुराणों का निर्माण का वर्णन इसमें है । लोकों का प्रमाण, ग्रह, नक्षत्रों की गति, जीवितों


के श्राद्ध का विधान, श्राद्ध एवं श्राद्ध योग्य ब्राह्मणों के लक्षण, पंच महायज्ञों का प्रभाव और पंच यज्ञ की विधि, रजस्वला के नियम, उसमें नियम पालने से पुत्र की विशेषता, मैथुन की विधि, क्रम से हर एक वर्ण का वर्णन, सभी के लिये भक्ष, अभक्ष का विचार, प्रायश्चित का वर्णन विस्तार से किया गया है ।


नरकों के तस्करों का वर्णन तथा कर्म के अनुसार दंड का विधान और दूसरे जन्म में स्वर्गीय तथा नारकीय कर्मों का ज्ञान, नाना प्रकार के दान तथा प्रेतराज के पुर का वर्णन, पंचाक्षर रुद्र तथा कल्प महात्म्य, वृत्रासुर और इन्द्र का महान युद्ध, श्वेत मुनि और मृत्यु का सम्वाद तथा श्वेत मुनि के लिए काल का नाश तथा देवदारु वन में शिवजी का प्रवेश, सुदर्शन की कथा, संन्यास के लक्षणों का वर्णन हुआ है ।


इसके बाद ब्रह्मा जी द्वारा भगवान शंकर का श्रद्धा साध्य कहा जाना, मधुकैटभ दैत्यों द्वारा ब्रह्मा जी की गति क्षीण करना, विष्णु का मत्स्य रूप धारण करना, सभी अवस्थाओं में लीलाओं का वर्णन, शंकर की कृपा से विष्णु और विष्णु की उत्पत्ति, मंदराचल को धारण करने के लिए कूर्म अवतार, संकर्षण भगवान और कौशिकी देवी की उत्पत्ति तथा यादवों में स्वयं भगवान का अवतार लेना । कंस की दुष्टता, श्रीकृष्ण की बाल लीलायें, पुत्रों के लिए शिवजी का पूजन करना, विष्णु और रुद्र द्वारा कपाल से जल की उत्पत्ति, पृथ्वी के भार को दूर करने के लिए विष्णु द्वारा रुद्र की आराधना का वर्णन इस पुराण में किया गया है।


पूर्व काल में वेनु राजा के पुत्र पृथु द्वारा पृथ्वी का दुहा जाना, भगवान द्वारा भृगमुनि का शाप धारण करना, देव तथा दानवों को भृगु का शाप, श्रीकृष्ण का द्वारका में निवास, लोक कल्याण के लिए दुर्वासा के मुख से शाप ग्रहण करना, वृष्णि अंधकों के नाश के लिये ऋषियों का शाप, एरक तथा तोमर की उत्पत्ति, एरक की प्राप्ति पर यादवों में विवाद, युद्ध और उनका नाश, श्रीकृष्ण का जाना, मोक्ष धर्म वर्णन, इन्द्र, हाथी, मृग रूप धारी अंधक, अग्नि और दक्ष का वर्णन, आदि देव ब्रह्मा जी, कामदेव तथा दैत्यों का वर्णन इसमें आया है।


इसमें महादेव जी के द्वारा दैत्य हलाहल की आज्ञा का वर्णन, जलंधर का वध तथा सुदर्शन चक्र की उत्पत्ति, भगवान विष्णु को उत्तम शस्त्रों की प्राप्ति तथा शिवजी के और भी हजारों उत्तम चरित्रों का वर्णन है। ब्रह्मा, विष्णु और महान तेज वाले इन्द्र के प्रभाव का वर्णन है । शिवलोक का वर्णन, पृथ्वी पर रुद्र लोक वर्णन और पाताल में तारकेश्वर का वर्णन, सब मूर्तियों में शिवालय की विशेषता तथा लिंग का प्रारम्भ से विस्तार पूर्वक .वर्णन इस महापुराण में किया गया है ।


इस प्रकार संक्षेप में जानकर भी जो मनुष्य इसका गुणगान करता है। वह सब पापों से छूट कर ब्रह्म (शिव) लोक को प्राप्त करता है ।


*🙏🌹हर हर महादेव🌹🙏*

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