श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--11 )
परम श्रध्देय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन
पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन
------:वह भयानक दृश्य:------ ***********************************
हे भगवान ! कहाँ आकर फंस गया मैं ? जिसके पीछे-पीछे चलकर वहां तक पहुंचा था, उसका कहीं नामो-निशान भी नहीं दिखलायी पड़ रहा था। आखिर गयी कहाँ स्वर्णा ?
मैं आँगन में खड़ा-खड़ा यह सोच ही रहा था कि अचानक मेरी दृष्टि बायीं ओर वाले कमरे की ओर घूम गयी। न जाने क्यों और किस प्रेरणा के वशीभूत होकर कमरे के भीतर चला गया मैं। वह कमरा जरा साफ़ लगा मुझे। दुर्गन्ध भी नहीं थी उसमें। मैंने देखा--कमरे के एक ओर नीचे जाने के लिए सीढियां थीं। आश्चर्य हुआ मुझे। सोचा--निश्चय ही उस कमरे के नीचे तलघर होगा। हो सकता है--स्वर्णा उसी में हो। मन में यह विचार आते ही मैं हिम्मत करके धीरे-धीरे उतरने लगा। सीढियाँ आड़ी-तिरछी और धूल से भरी हुई थीं। कोई-कोई बिलकुल टूटी भी थी।
मेरे नीचे पहुंचते ही दहशत से फड़फड़ाते चमगादड़ 'चीं-चीं' करते हुए सिर और कानों को छूते हुए निकल गए। सचमुच वह काफी लम्बा-चौड़ा कमरा था। दीवारों के ऊपर कई रोशनदान थे जिनमें से छनकर न जाने किधर से रौशनी आ रही थी। कमरे में एक छोटा दरवाजा भी था। उत्सुकतावश जब मैं उस रहस्यमय दरवाजे के करीब पहुंचा तो वहां भी नीचे जाने के लिए आड़ी-तिरछी सीढियां दिखाई दीं मुझको। आश्चर्य तो हुआ ही, इसके आलावा कौतूहल भी हुआ और न जाने कैसे मेरे पैर बरबस उन सीढ़ियों की ओर बढ़ गए।
सीढियाँ उतरकर अंततः मैं जब नीचे पहुंचा तो एकबारगी स्तब्ध रह गया। उस कमरे में पहुँचते ही मेरी नज़र जिस पर पड़ी वह थी भयानक शक्ल की एक अधेड़ औरत, जिसे देखते ही एकदम भयभीत हो उठा मैं। प्राण सूख गए मेरे। उस औरत के शरीर का रंग बिलकुल काला था। सिर घुटा हुआ था। आँखें गोल-गोल और टमाटर की तरह बाहर निकली हुईं थीं। दोनों पुतलियाँ विचित्र ढंग से अपनी जगह से घूम रही थीं। उसका पेट बाहर की ओर निकला हुआ था। उसके हाथ में जलती हुई लालटेन थी जिसे पकड़कर निश्छल भाव से वह इस प्रकार खड़ी थी जैसे पत्थर का कोई बुत हो।
उस कमरे में गहरी नीरवता छाई हुई थी। साथ ही एक विचित्र उदासी और खिन्नता-सी व्याप्त थी वहां। लालटेन की पीली रौशनी में उस औरत की जो छाया कमरे की दीवार पर पड़ रही थी, उससे कमरे का वातावरण और भी भयानक हो उठा था।
हाँ, एक बात बतलाना तो भूल ही गया। कमरा हद से ज्यादा लम्बा-चौड़ा था। दीवार तथा फर्श को लाल रंग के पत्थरों से बनाया गया था। तभी न जाने कहाँ से अचानक कमरे में ताजा हवा का झोंका आया और उसी के साथ पूरे कमरे में राल, गुग्गुल, चन्दन और अगरबत्ती की मिली-जुली सुगन्ध फ़ैल गयी। एकबारगी चौंक पड़ा मैं। कहाँ से आई थी यह सुगन्ध ? इसी का पता लगाने के लिए कमरे का चक्कर काटने लगा मैं।
जब मैं चक्कर लगा ही रहा था कि उसी समय एक गुप्त दरवाजा अपने आप खुला और दूसरे ही क्षण भयानक शक्ल के एक व्यक्ति ने अपने कोहड़े जैसे सिर को बाहर निकाला। उसकी आँखें गुड़हल के फूल की तरह थीं, जैसे शराब पी रखी हो उसने। क्रूरता और निर्दयता का कुछ अजीब-सा भाव था उसकी आँखों में। फिर उसने अपना सिर भीतर कर लिया, साथ ही वह गुप्त दरवाज़ा अपने आप बन्द हो गया।
थोड़ी देर बाद मैंने उस दरवाजे पर धक्का दिया। सहज ही खुल गया वह तो पता चला कि उसे बंद ही नहीं किया गया था। मेरी ऑंखें भय और आतंक से फटी-की- फटी रह गयीं।
क्रमशः--
आगे है--'रहस्यमय वातावरण'
नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता

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