ध्यान क्या है ? ( भाग--06 )
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि चन्दन
------:ध्यान के तीन चरण:------
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तीनों केंद्रों से सम्बंधित ध्यान के तीन चरण हैं।
प्रथम चरण--प्रथम चरण में अपनी दोनों भौंह के मध्य नीलज्योति का ध्यान करना चाहिए। नीलज्योति का सम्बन्ध मस्तिष्क से है। जौ के आकार की नीलज्योति की कल्पना करके उसी पर मन को केंद्रित करना चाहिए। इस ध्यान का सम्बन्ध रात्रि के अन्धकार से। रात्रि का समय हो, एकान्त स्थान हो, हल्का-हल्का अँधेरा हो। उस समय मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के विचारों को न आने दें क्योंकि विचारों के कारण ही मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है। विचारों को उत्पन्न न होने देना या न आने देना अत्यन्त कठिन कार्य है। इसके अभ्यास के लिए कुछ दिन दीर्घ श्वास जोर-जोर से भरना चाहिए और जोर से छोड़ना भी चाहिए। इसका परिणाम यह होगा कि आप थक जायेंगे। थकने से आपके मस्तिष्क की मांसपेशियां, स्नायु तन्तु और नस-नाड़ियां शिथिल हो जाएँगी और जब मस्तिष्क शिथिल होगा तो वह अपने अन्तराल में, अपने आप डूबने लगेगा। ध्यान के समय मस्तिष्क को हल्का और शिथिल छोड़ना आवश्यक है। जब आपका अभ्यास हो चुकेगा तो इसे आप बंद कर सकते हैं।
मस्तिष्क को शिथिल कर ध्यान का यह प्रथम चरण पूरे एक वर्ष नित्य करना चाहिए। हाँ, एक बात का ध्यान रहे-- ध्यान के स्थान और समय में परिवर्तन नहीं होना चाहिए।(इसके पीछे एक रहस्य है और वह रहस्य यह है--जिस समय आप ध्यान करते हैं और गहराई में डूबते हैं, उस समय आपके मस्तिष्क से कुछ विद्युत् चुम्बकीय तरंगे निकलती हैं जो आपके ध्यान के स्थान पर चारों और बिखरती रहती हैं। उन विद्युत् चुम्बकीय तरंगों से आपके मस्तिष्क का सम्बन्ध होता है, इसलिए जब उस स्थान पर आप दुबारा ध्यान लगाने बैठते हैं तो पूर्व से बिखरी हुई तरंगों के संयोग से शीघ्र ही आपका मस्तिष्क ध्यानस्थ हो जाता है)।
ध्यान के समय शरीर पर हलके नीले रंग का वस्त्र हो, आसन भी नीले रंग का ऊनी हो और चौकोर हो। आसन को भूमि पर रखकर उस पर बैठना चाहिए। अच्छा हो यदि आसन के नीचे एक चौकोर चौकी हो, इससे आपके और भूमि के बीच थोड़ी दुरी बढ़ जायेगी और भूमि का गुरुत्वाकर्षण बल आपके शरीर की ऊर्जा को आकर्षित नहीं कर पायेगा। निस्तब्ध वातावरण हो, किसी भी प्रकार की कोई आवाज़ न हो।
मस्तिष्क जितना शिथिल होगा, उतना ही वह संवेदनशील होगा। जैसे-जैसे काल्पनिक नीलज्योति पर आपका ध्यान प्रगाढ़ होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे आप अपने भीतर अनिर्वचनीय शान्ति का अनुभव करने लग जायेंगे। कुछ ही अवधि के बाद वह काल्पनिक नीलज्योति साकार हो उठेगी आपके भ्रूमध्य में। जौ के आकार में वह नीलवर्णा ज्योति प्रज्ज्वलित दिखलायी देने लगेगी ध्यानावस्था में।
आगे है--'द्वितीय और तृतीय चरण'

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