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2/25/2022

अथ रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र"

   
                           
   

अथ रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र "


जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमैवयं' चकार चडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥ १॥


सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्रीगंगाजी की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएँ लटक रही हैं. तथा जी शिवजी डमरू की डम डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे भगवान शिवजी हमारा कल्याण करें ।


जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि । धगद्गद्ध गज्जवलल्ललाट पट्टपावेके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥


“ अति अम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजीकी चंचल लहरें जिन शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं तथा जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ धधक कर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल चंद्रमा से विभूषित मस्तक वाले भगवान शिवजी में मेरा अनुरोग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे । "


धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर स्फुरदृर्गत संतति प्रमोद मानमानसे | कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥


“पर्वतराजसुता के तिलासमय रमणीय कदाक्षों से परम आनंदित चित्त वाले (माहेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर ( दिशा ही हैं वस्त्र जिसके) शिवजी की आराधना में मेरा चित कब आनंदित होगा ।"


जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा - कदंतकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे । मध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीये मेदुरे मनो विनोद द्रुतं बिभर्तु भूतभतीरॆ ॥४॥


जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के, प्रकाशमान पीले प्रभा- समूहू रूप केसर कांति से ... दिशा बंधुओं के मुखमंडल को चमकाने वाले, मतवाले, गजासुर के चर्मरूप उपरने से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले भगवान शिवजी में मेरा मन विनोद को प्राप्त हो ।


सहस्त्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः | भुजेंगरोज मालया निर्बंदुजाटजूटक थिये चिराय जायतां चकोर बधुशेखरः ॥५॥


इंद्रादि समस्त देवताओं के सिर से सुसज्जूित पुष्पों की धूलराशि से धूसरित पादपृष्ठ वाले 'सर्पराज़ों की मालाओं से विभूषित जटावाले प्रभु हमें चिरकाल के लिए सम्पदो दें ।


ललाट चत्वरज्वलद्वनंजयस्फुरिगभा निपीतपंचसायकं निमन्नि लिपनायम् । सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं महाकपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥६॥


" इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्निज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, बे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेजरूप नर मुंडधारी भगवान शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें ।


कराल भाल पट्टिकाद्यगद्गद्वगज्ज्वल दुर्नजया घरीकृंत प्रचंड पंचसायके । धराधरेंद्र नर्दिनी कुचाग्रचित्रपत्रक - प्रकल्पनैक शिल्पिाने लोचने मतिर्मम ॥७॥


"जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला से प्रचंड कामदेव को भस्म करने वाले तथा पर्वत राजसुता के स्तन के अग्रभाग पर विविध भांति की चित्रकारी करने में अति चतुर त्रिलोचन में मेरी प्रीति अटल हो ।


नवीन मेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधूबंधुकंधरः । निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुर : कलानिधानबंधुरः श्रियं जगेरधरः ॥ ८ ॥


“नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि के घने अंधकार की तरह अति गूढ़ कंठ वाले, देवनदी गंगा को धारण करने वाले, जगचर्म से , सुशोभित, बालचंद्र की कलाओं के बोझ से विनम, जगत के बोझ को धारण करने वाले भगवान शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्तिदें ।”


प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा • विडंति कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिंदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्दिांध कच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥६॥


" फूले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्यामप्रमा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कंधे वाले, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों को काटने वाले, दक्षयज्ञविध्वंसक, गजासुरहंता, अंधकारसुरनाशक और मृत्यु का नष्ट करने वाले भगवान शिवजी का में भेजन करता हूँ । "


अगर्वसर्वमंगला कलाक़दम्बमंजरी -

प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् । स्रोतकं पुरातकं भावंतकं मुखांतक गजांतकांच कांतकं तमंतकांतकं भजे ||१०||


कल्याणमय, नाशन होने वाली समस्त कलाओं की कलियों से बहते हुए रस की मधुरता का आस्वादन करने में भ्रमररूप, कामदेव को भस्म करने वाले, त्रिपुरापुर, विनाशक, संसार दुःखहारी, दक्षूयज्ञ विध्वंसक, गजासुर तथा अंधकासुर को मारने वाले और यमराज के भी यमराज भगवान श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ


जय त्वदभविभ्रम भ्रमद्रजंगस्फुर गद्वगढ़ निर्गमत्करील भाल हव्यवाट् - धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगलुंगमंगलू ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥


अत्यंत शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से क्रमशः ललाट में बड़ी हुई प्रचंड अग्नि वाले मृदंगू की धिम-धिम मंगलकारी उद्या ध्वनि के क्रमारोह से चंड तांडव नृत्य में लीन होने वाले भगवान शिवजी सब भाँति से सुशोभित हो रहे हैं


दृषूद्विचिन्त्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्त्रजो गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः तृणार विंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समे प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ १२ ॥


" कड़े पत्थर और कोमल विचिन्न शय्या में, सर्प और मोतियों की मालाओं में, मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में शत्रु और मित्र में, तिनके और एक कॅमललोचननियों मे, प्रजा और महाराजाधिकराजाओं के समान दृष्टि रखते हुए ; विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति संभभाव दृष्टि रखने वाले शाश्वत शुभ देवता भगवान शिवजी की पूजा मैं कब कर सकूँगा


कूदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमंजलिं वहन् । विमुक्त लोललोचनो ललामभालूलग्नक : शिवेति मंन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।।१३।


कब मैं श्रीगंगाजी के कुहारकुंज में निवास करता हुआ, निष्कपटी होकर सिर पर अंजलि धारण किए हुए चंचल नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुंदरी पार्वतीजी के मस्तक में अंकित शिवमंन्त्र, उच्चारण करते हुए परम सुख को प्राप्त करूँगा ।”


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमूल्लिका निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः । तनोतु नो मनोमुद विनोदिनीं महंनिशं परिश्रय परं पदं तद्ग जत्विषां चयः ॥ १४॥


“देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पूरोग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंदयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें ।


प्रचण्ड वाडवानल प्रश्नाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना | विमुक्त वाम लोचनी विवाहकोलिकध्वनि : शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥


" प्रचंड बड़वानल की भाँति पायों को भस्म करने में, स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तूथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह के समय में गान की गई मंगलध्वनि, सब मंत्रों में परमप्रेष्ठ- शिवमंत्र का पाठ करके सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ ।


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम् हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नायथा गतिं विमोहन हि देना तु शंकरस्य चिंतनम् ॥ १६॥


इस परम उत्तम शिवतांडव श्लोक को निव्यप्रति मुक्तकंद से पढ़ने से या सुनने से संतति वगैरह में है। से पूर्ण हरि और गुरु में भक्ति बनी रहती है । जिसकी कोई दूसरी, गति नहीं होती तो शिव की ही शरण में रहेता है ।


पूजाडवसानसमये दशवकन्नगीतं यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरी रथगजेंद्ररंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखी प्रददाति शम्भुः ॥१७॥


शिवपूजा के अंत में इस रावणकृत शिवतांडव स्तोत्र का प्रदोष समय में गान करने से या पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती है, और रथ गज-घोड़े में सर्वदा युक्त रहता है । है ।


॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम् ॥


चन्द्रमौलि शिव कामरिपु. शशिधर शंभु महेश पशुपति गिरिजापति, उमानाथ भूतेश ॥


# कण कण में भोलेनाथ


# शिव है बाहर, शिव ही अंदर | शिव की रचना सात समंदर ॥ # ॐ नमः शिवाय





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