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12/05/2021

श्रीरंग अवधूत महाराज

   
                           
   

श्रीरंग अवधूत महाराज


नाममंत्र मोटो छे जगमां, जगम-मरण भूत जाय;

मुक्ति सुंदरी दौडी आसे आकर्षण एवूं थाय !

हरिना नामनो सौथी मोरो छे आधार ।’


श्रीरंग अवधूत महाराज के पूर्व आश्रम का नाम पांडुरंग विट्ठल वालमे है उनका जन्म 1898 में हुआ  उनके पिता विट्ठलपंत एक धर्मपरायण, वैदिक विद्वान ब्राह्मण थे।उनका परिवार देवले गांव ( रत्नागिरी जिले के संगमेश्वर तालुका में) का था  बाद में वो गोधरा आ गए


दिव्य, उज्ज्वल, इस आत्मा में पूर्वजों की अभूतपूर्व साधना को पूरा करने की तीव्र लालसा थी; ईश्वर के वरदान की लालसा यंत्र की सीढि़यों पर चढ़ने लगी।

 उस समय श्रीवासुदेवानंदसरस्वती महाराज श्रीनिवासवाड़ी आए। श्रीटेम्बेस्वामी ने कहा, 'यह बच्चा हमारा है। रास्ता साफ हो गया उन्होंने अवधूत जी को अपना लिया 

श्रीरंग अवधूत महाराज की बुद्धि तेज थी, स्मरणशक्ति तेज थी।


 गुजरात में दत्त सम्प्रदाय के अधूरे काम को पूरा करें यही उनके गुरु ने उन्हें बताया  और इसलिए साधकों और भक्तों की माता नर्मदा, जिनके दोनों किनारों पर असंख्य तीर्थ स्थल हैं,वह श्रीनरेश्वर क्षेत्र को चुना और वही महाराज जी रहने लगे


 अवधूत महाराज ने भक्ति को पोषित किया और गुजराती लोगों के दिलों में घर बना  लिया। 'दिगंबरा दिगंबरा, श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा'   भजन के साथ, महाराज जी ने गुजरात का दौरा करना शुरू कर दिया। हर तरफ भक्ति की महक छाने लगी। अधिक से अधिक गुजराती लोगों को यह एहसास होने लगा कि धन, सम्मान और प्रसिद्धि से परे एक खुशहाल दुनिया है।


अवधूतजी ने नरेश्वर आश्रम को पूरी तरह से वैदिक परंपरा में रखा और चुपचाप निष्काम भक्ति का उपदेश दिया। कई नास्तिकों को आस्तिक बना दिया गया,, कुछ को घरों को तोड़कर बचा लिया गया, कुछ को मिर्गी से मुक्त कर दिया गया, कई अंधे और अपंग हो गए, कई को नशे से मुक्त कर दिया गया, कई को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाया गया। जिज्ञासु भक्तों के मार्गदर्शक बने उन्होंने बहुतों को ज्ञान की दिशा दी, बहुतों के जीवन में सुधार किया


रंग अवधूत रे. रंग अवधूत रे ॥

नारेश्वरनो नाथ मारो रंग अवधूत रे ॥





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