महारथी कर्ण ( सुंदर कविता )
भाल मेरा सूर्य सा
तेजमयी वर्ण है,
राधा मा का लाडला
नाम मेरा कर्ण है..........
शौर्य मेरा वीरभद्र सा
पांडवो का भाई था,
बाहुबल के समक्ष मेरे
महाबली जरासंध धराशाई था......
ऋषि दुर्वासा से दिव्य मंत्र पाकर
माता कुंती प्रसन्न हुई,
अधीरता में पिता भास्कर का ध्यान किया,
पुत्र पाकर वह धन्य हुई .......
माता कुंती की गोद में मैने
केवल कुछ वक्त ही गुजारा था,
कैसा अद्भुत वो क्षण था
जब मेरी जननी ने मुझे निहारा था ......
अपने पुत्र के भविष्य का
मैया को स्मरण हो आया था,
तभी आंखो में अश्रु भरके
मुझे गंगा में बहाया था .........
मुझे गंगा मां को सौंपने का
हर जन्म में मेरी मैया को अधिकार है,
और जो मेरी जननी को अपशब्द कहे
ऐसे प्रशंसक पर धिक्कार है........
अधिरथ बाबा और राधेय मां
मां गंगा से पाकर मुझको हुए खुशहाल थे,
वह केवल कृष्ण और कर्ण थे
जो दो मैया के लाल थे ........
बड़े बड़े कांटे मेरी आत्मा में
घुसकर सता रहे,
मेरे सबसे पहले गुरु गुरु द्रोण को
लोग अहंकारी बता रहे.......
मेरे गुरु द्रोण को गाली दे कोई
ये मुझे कभी नही भाया था,
उसी परम पूज्य गुरु ने मुझे
धनुष पकड़ना सिखाया था .........
गलती मेरी बड़ी थी बचपन से रहा
अधर्मी दुर्योधन के साथ में,
यदि पांडवो से लाग डांट छोड़ हृदय में धर्म होता,
तो गुरु द्रोण थमा देते ब्रह्मास्त्र मेरे हाथ में .......
भूल से सीख लेलो मेरी फिर से
मैने भविष्य की सभी संभावना को विफल किया,
एक गुरु को त्याग दिया
और जाकर दूजे से छल किया ........
गुरु परशुराम का श्राप
हम सबको ये सिखाता है,
छल और असत्य से प्राप्त ज्ञान
काम नही आता है.......
मिला ज्ञान परशुराम से
पूरे आर्यावर्त में मैने नाम किया,
मेरे अतुलित शौर्य को स्वयं
जरासंध में प्रणाम किया ........
जब युद्ध मे करता था तो
नवग्रह रुक जाते थे,
स्वयं नभ में पिता मेरे
तीरों से छुप जाते थे .......
सूर्य नारायण का अंश था
पर युद्ध में मैं रुद्र था,
अधर्मी मित्र का जो साथ था
तो हो चला तनिक उग्र था .......
पर वचनों का मान रखा
कवच कुंडल को त्यागा था,
भास्कर पिता का परामर्श था
तो इन्द्र से शक्ति अस्त्र भी एक मांगा था .........
मन ही मन प्रसन्न था की
श्रेष्ठ में बन जाऊंगा,
इन्द्र की वासवी शक्ति
उसके अंश पर चलाऊंगा .......
पर संसार की है नियति
विजयश्री धर्म के हाथ आनी थी,
और वासवी शक्ति मुझे
पुत्र समान घटोत्कच पर चलानी थी ......
महाभारत के उस रण को भी
शौर्य मेरा याद है,
भीम सात्यकि जैसे योद्धाओं को भी
चखाया मैने पराजय का स्वाद है.......
स्वयं धर्मराज ने त्याग दिया
समक्ष मेरे युद्ध था,
रुद्र तांडव हो जाता था
जब होता सूर्यपुत्र क्रुद्ध था......
जीवन की अंतिम परीक्षा थी
सामने अनुज मेरा पार्थ था,
प्रेम और करुणा की मूरत था वह
ना मन में कोई स्वार्थ था........
विजयधारी कर्ण ने अतुलित
सामर्थ्य दिखलाया था,
मेरा रूप विकराल देख
भीम और माधव ने उत्साह पार्थ का बढ़ाया था .........
पर चक्र धरा में जा फसा
विनाश मेरा अवश्यंभावी था,
और मेरा अधर्म उस दिन
मेरी वीरता पर हावी था .......
मुरलीवाले ने धुरा रथ की थामी थी
और पार्थ ने चमत्कार किया,
मेरा शीश धरा पर गिर गया
ना किसी के श्राप का भी तिरस्कार किया ........
मुझे मिले हर श्राप का मान रखकर
धर्म का बिगुल मेरे अनुज ने बजा दिया,
अधर्म के साथ खड़े भाई का शीश गिराकर
धर्मराज के शीश पर विजय मुकुट सजा दिया ........

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