Chitthi : चिट्ठी का जमाना
कितने साफ मन, जज्बाती, और
सहनशील होते थे लोग तब
जब वो मासूम लोग चिट्ठियां लिखा करते थे।।
एक सादे से पन्ने पर चंद बोलते हर्फों में
उतार कर अपने जज्बाती मन को
छोड़ देते थे एक अंधेरे डिब्बे में,
मन में भरपूर विश्वास लिए कि
इक दिन ये उसको जरूर मिलेगी।।।
और
वो जज्बाती मन लिए हुए सादा सा पन्ना
कितने ही अनजान हाथों को छूता हुआ
बिना थके मीलों का सफर करता हुआ
भावों के मोतियों को सहेजे हुए
इंतजार में व्याकुल उन हाथों तक पहुंच कर
ही अमर आंनद का मोक्ष प्राप्त कर लेता था
अब
यहां, वो अमर आंनदी मोक्ष प्राप्त सादे से
पन्ने को पाने वाला उसे छूते ही पिघल जाता था
एक एक लफ्ज़ उसके सामने वही तस्वीर खोलता था
जिस लहजे में वो लिखे गए थे
हां,तब चिट्ठी के अक्षर बोला करते थे
उन्हीं भावों में जिनमें लिखने वाला व्यक्त करता था
इस तरह वो पाती पाने वाला
मिल लेता था उस पाती लिखने वाले से
और गले लगा लेता था उसे
उस सादे से पन्ने को सीने से लगाकर
पर
अब जज्बाती लोगों के शब्द मशीनी हो गए हैं
अब वो लगाव ओर प्रेम के भाव नहीं बोलते
अब इन लफ्जों में होती है बस
लिखावट की टिक टिक भर ही
अब लिखने वाला कितना भी रस डाल ले
परोसे तो बस शब्द ही जाते हैं।
लिखना किस मायने में और
उसको पढ़ना अलग मायने में
मिटा रहा है दूरस्थ सम्बन्धों का अपनत्व और लगाव।।।
और
सहनशीलता तो बस तब जवाब दे देती है
जब दस मिनट पहले किए गए सन्देश का
कोई जवाब ही न आए किसी भी कारण से
तब कारण कोई नहीं समझता बस
रिश्तों में दरार अा ही जाती है बरबस ही
जो बढ़ जाती है समय और गलतफहमियों से
और बस सब ख़तम ......
हां
तभी तो अब लगता है कितने साफ मन,
जज्बाती और सहनशील होते थे लोग तब
जब वो मासूम लोग चिट्ठियां लिखा करते थे
और वो सादे पन्ने के हर्फ जज़्बात बयां करके
दूरस्थ लोगों के रिश्तों को सालों तक जोड़े रखते थे।।।।।।
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