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9/01/2021

श्री स्कन्द-महापुराण / Shri Skand Puran

   
                           
   
श्री स्कन्द-महापुराण / Shri Skand Puran

🔵इस अध्याय में:-  (निम्बेश्वर की स्थापना तथा ग्यारह रुद्रों का प्राकट्य एवं उनके दर्शन-पूजन की महिमा)🔵

        🙏  सूतजी कहते हैं- :दुःशील ने दक्षिण दिशा में अपने गुरु के नाम से भी शिवालय बनवाया, जो निम्बेश्वर के नाम से विख्यात हुआ। वह बड़े भक्तिभाव से उनके चरणारविन्दों का चिन्तन करने लगा। उसकी स्त्री का नाम शाकम्भरी था उसने अपने नाम वाली श्रीदुर्गादेवी की वहाँ स्थापना की। उनके पास जो शेष धन था, उसे उन दोनों पति-पत्नी ने देव-पूजन के लिये ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया और स्वयं भिक्षान्न भोजन करने लगे।🙏
         🌹 कुछ काल के अनन्तर दुःशील की मृत्यु हो गयी। उस समय शाकम्भरी ने दृढचित्त होकर पति के साथ चिता की आग में प्रवेश किया। फिर वे दोनों पति-पत्नी विमानcमें बैठकर स्वर्ग को चले गये। जो दुःशील का यह उत्तम उपाख्यान पढ़ेगा, वह अज्ञानजनित सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जायगा।🌹
          🌈पूर्वकाल की बात है, उत्तम व्रत का पालन करने वाले काशी निवासी मुनि हाटकेश्वरदेव के दर्शन के लिये उत्सुक होकर चले। उनमें परस्पर होड़ लग गयी थी कि 'पहले मैं, पहले मैं, भगवान् हाटकेश्वर का दर्शन करूँगा जो सबके आगे वहाँ जाकर भी पहले हाटकेश्वर शिव का दर्शन नहीं कर लेगा, वह अकेला सबको कष्ट देने के पाप का भागी होगा।' ऐसा कहकर वे सब काशीपुरी से अत्यन्त वेग पूर्वक दौड़ते हुए चले। इसी समय भगवान् हाटकेश्वर उन सब मुनियों कास्पर्धा जनित अभिप्राय जानकर उन सबको दर्शन देने के लिये पाताल से नागच्छिद्र के द्वारा निकले और ग्यारह स्वरूपों में स्थित हो गये त्रिशूल, तीन नेत्र, जटाजूट, अर्धचन्द्र तथा मुण्डमाला से विभूषित हो, वे एक ही साथ सबकी दृष्टि में आये। उन मुनियों  ने अपने समक्ष खड़े हुए भगवान् वृषभध्वज का दर्शन करके धरती पर घुटने टेक उन्हें प्रणाम किया और पृथक्-पृथक् उनकी स्तुति की। उनमें से एक जानता था, भक्तवत्सल देवदेव महादेवजी पहले मेरी दृष्टि में आये हैं। दूसरा समझता था, पहले मुझे ही भगवान् का दर्शन हुआ है। ऐसा जानते हुए उन श्रेष्ठ तापसों ने भगवान्  का  इस  प्रकार  स्तवन किया।🌈
          🛐तापस बोले- 'जो देवताओं के भी अधिदेवता तथा सर्वदेव स्वरूप हैं, उन भगवान् शिव को नमस्कार है। शान्त, सूक्ष्म तथा अन्धकासुर का नाश करने वाले शिव को नमस्कार है। जो सदा द्युलोक के आश्रित रहकर विभिन्न वायुओं के द्वारा सम्पूर्ण जगत् को जीवन प्रदान करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रों को नमस्कार है। जो पूर्व दिशा में रहकर सब लोकों की भूतों के महान् भय से रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रों को नमस्कार है। जो पश्चिम दिशा में रहकर दुरात्मा पिशाचों के भय से समस्त जगत् की रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रों को नमस्कार है। जो ऊपर के लोकों में रहकर जम्भ के महान् भय से सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रों को नमस्कार है। जो नीचे-ऊपर दोनों जगह रहकर सम्पूर्ण लोकों की कूष्माण्डों के भय से रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रों को नमस्कार है। जो सहस्रों की संख्या वाले अथवा असंख्य रुद्र, पृथ्वी पर रहकर रोगोंसे जगत् को बचाते हैं, उन सबको भी नमस्कार है।🛐
         🧿 इस प्रकार ग्यारह तपस्वियों द्वारा स्तुति की जाने पर वे ग्यारहों रुद्र भक्ति से नत मस्तक हुए उन तपस्वी मुनियों से बोले।🧿
          🌀रुद्र बोले- 'श्रेष्ठ तापसो ! मैं तुम्हारी बड़ी भारी भक्ति देखकर सन्तुष्ट हूँ और ग्यारह स्वरूपों में प्रकट हुआ हूँ, तुम सब लोग मनोवांछित वर माँगो।🌀
         💐 तापसों ने कहा- 'देव! यदि आप हम पर सन्तुष्ट हैं, तो कृपा करके इन ग्यारह स्वरूपों में सदा यहीं रहें, जिससे हम आपकी आराधना करते हुए हाटकेश्वर क्षेत्र में सदैव निवास करें। भगवान् श्रीशिव बोले-मैंने इस क्षेत्र में जिन ग्यारह मूर्तियों को प्रकट किया है, इन सबके साथ यहाँ सदैव निवास करूँगा। मेरी जो आद्या मूर्ति है, वह तो कैलास पर रहती है। इस क्षेत्र में भी जो उत्तम कैलास पर्वत है, वहाँ सदा उसकी स्थिति बनी हुई है। ये मेरी ग्यारह मूर्तियाँ सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये यहाँ सदा उपस्थित रहेंगी। तुम्हारे ही नामों से इन सबकी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य विश्वामित्र-कुण्ड में स्नान करके मेरी इन मूर्तियों की पूजा करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे। मेरे वचन से उन्हें ग्यारह गुने पुण्य फल की प्राप्ति होगी; इसमें संशय नहीं है।💐
          🛑ऐसा कहकर भगवान् त्रिलोचन वहीं अन्तर्धान हो गये। वे मुनि भी वहाँ आश्रम बनाकर बड़ी श्रद्धा से उन मूर्तियों की आराधना करते हुए परम पद को प्राप्त हो गये। दूसरा कोई मनुष्य भी यदि इन ग्यारह विग्रहों का दर्शन और पूजन करेगा, वह उस परमधाम में जायगा, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। जो मानव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के दिन उन सबका भक्ति पूर्वक पूजन करेगा, वह परम गति को प्राप्त होगा।🛑
        💓  षडक्षर मन्त्र के द्वारा भगवान् शिव को एक फूल चढ़ाने से जो फल मिलता है, उससे सौ गुना फल उस मनुष्य को प्राप्त होता है, जिसने शिव की दीक्षा ली है। उसकी अपेक्षा भी सौगुना फल उसे मिलता है, जिसने भगवान् शिव की शरण ले रखी है। जो लोग भक्ति एवं विनय पूर्वक उन विग्रहों का पूजन करते हैं, वे पूर्वोक्त सभी लोगों से सौगुना पुण्यफल प्राप्त करते हैं।💓
          🌑ऋषियों ने पूछा- 'सूतजी ! काशी से आये हुए उन मुनियों के नाम क्या थे, जिनकी भक्ति के कारण भगवान् शिव ग्यारह स्वरूपों में अभिव्यक्त हुए?'🌑
         🔥 सूतजी ने कहा- 'उनमें से प्रथम का नाम त्रिभुवन- प्रसिद्ध मृगव्याध था, दूसरे का शर्व, तीसरे का निन्दित, चौथे का महायशा, पाँचवें का अजैकपाद, छठे का अहिर्बुध्य, सातवें का पिनाकी, आठवें का परन्तप, नवें का दहन, दसवें का ईश्वर तथा ग्यारहवें का नाम कपाली था। ये ही नाम भगवान् शिव ने उन ग्यारह रुद्र-मूर्तियों के भी रखे।🔥
         🌍 मृगव्याध के लिये प्रत्यक्ष गौ तथा गुड़ की बनी हुई गौ भी दान करनी चाहिये। कपाली के लिये मक्खन की, अजैकपाद के लिये घी की, अहिर्बुध्य के लिये सुवर्ण की, पिनाकी के लिये नमक की, परन्तप के लिये रस की, दहन के लिये अन्न की, ईश्वर के लिये जल की तथा अन्य मूर्तियों के लिये प्रत्यक्ष गौ दान करनी चाहिये। जो इन रुद्रों की प्रीति के लिये इन सब प्रकार की गौओं का दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है, ऐसा पितामह ब्रह्माजी का कथन है।🌍
                            
      🕉️ 'ॐ नमः शिवाय'🕉️




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