लालबहादुर शास्त्री जी
#इस_लेख मे आप जान पायेंगे की #शास्त्री जी की ह्त्या की गई थी या उनकी मृत्यु स्वाभविक हुई थी, व उनके जीवन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण बाते, ऐसा लेख आप को फिर #पढने को नही मिलेगा।
"#मिट्टी_के_लाल, गूदडी के लाल",#हरित क्रांति व #श्वेत_क्रांति के शिल्पकार, पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न से सम्मानित
‘जय जवान जय किसान’ के ओजस्वी उद्घोष से राष्ट्रीय जीवन में नव-ऊर्जा का संचार करने वाले, सादगी,शुचिता व त्याग से परिपूर्ण , महान देशभक्त, पूर्व प्रधानमंत्री "श्री लाल बहादुर शास्त्री जी " के पावन जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन, व आप सभी देश वासियो को हार्दिक शुभकामनाएं , आपका जीवन हमारा पथ प्रदर्शक बने।
जय_जवान_जय_किसान
जन्म : 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय वाराणसी।
मृत्यु : 11 जनवरी 1966 ताशकन्द सोवियत संघ रूस ।
भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा।
शास्त्री जी ने #काशी_विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की।
जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया।
उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया।
1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री #ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो-अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं।
उनके पुत्र #सुनील_शास्त्री अपने पिता की ह्त्या से दुखी थे और बाद मे वे #भारतीय_जनता_पार्टी में चले गये।
उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। #शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।
ताशकन्द में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त #भारत_रत्न से सम्मानित किया गया।
#लाल_बहादुर_शास्त्रीजी_के_निधन_के पीछे क्या कोई साजिश थी?
2 अक्टूबर को आज के दिन ही देश के एक महान सपूत लाल बहादुर शास्त्री की भी 116 वीं जयंती हैं ।
महात्मा गांधी की हत्या हुई थी ये सबको पता है लेकिन क्यो हुई थी ये सबसे छिपाया गया है , ऐसा ही एक और महापुरुष है लाल बहादुर शास्त्री जी जिनकी मृत्यु का रहस्य आज तक सुलझाया नहीं जा सका है ।
शास्त्री जी का निधन 11 जनवरी 1966 को उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में हुआ था तब उजबेकिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था।
पाकिस्तान व भारत मे कुछ लोग शास्त्री जी की मृत्यु को स्वाभाविक मानते हैं तो #भारत के अधिकतर लोग कहते हैं कि उनके साथ #षडयंत्र हुआ था।
उनकी मृत्यु के समय की घटनाओं पर रिसर्च किया है और ये पता लगाने की कोशिश की है ... कि जनवरी 1966 में ताशकंद में क्या हुआ था।
आज शास्त्री के निधन को 53 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन शास्त्री जी के निधन का रहस्य आज भी बना हुआ है ।
लाल बहादुर शास्त्री सही मायनों में जन-नेता थे मुझे ये कहते हुए अफसोस हो रहा है कि देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक शास्त्री जी की मृत्यु का सच आज भी देश नहीं जानता है ।
सबसे दुख की बात तो ये है कि इन 53 वर्षों में देश में कई सरकारें आईं और चली गई लेकिन किसी भी सरकार ने शास्त्री जी के मृत्यु का सच जानने की कोशिश नहीं की
वर्ष 1965 के युद्ध का परिणाम आज भी पाकिस्तान को शर्मसार करता है तब भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी और पाकिस्तान का अहंकार चूर चूर हो गया था
इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के कहने पर भारत और पाकिस्तान युद्धविराम के लिए तैयार हुए और समझौते के लिए ताशकंद को चुना गया ।
10 जनवरी वर्ष 1966 को ताशकंद में भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ जिसमें लाल बहादुर शास्त्री भारत द्वारा जीती गई ज़मीन #पाकिस्तान को लौटाने पर राज़ी हो गए समझौते के बाद शास्त्री जी सोने के लिए चले गए इसके बाद रात 2 बजे दुनिया को उनके निधन का समाचार मिला शास्त्री के निधन को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं लेकिन सच क्या है, ये कोई नहीं जानता।
हमारे देश में अगर एक अभिनेता की रहस्यमयी हालात में मृत्यु हो जाती है....
तो पूरा देश चर्चा करने लगता है लेकिन एक #प्रधानमंत्री की मृत्यु पर ऐसा कभी नहीं हुआ कोई आपको ये नहीं बताता, कि आखिर किन परिस्थितियों में लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ था और क्यों उनकी मृत्यु का सच आज तक देश के सामने नहीं आ पाया है ।
आज हम इसी रहस्य को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उससे पहले आपको आज शास्त्री के व्यक्तित्व के बारे में जानना चाहिए ।
शास्त्री जी ने जब देश की कमान संभाली, तब देश बहुत बड़े #अनाज के संकट का सामना कर रहा था तब लाल बहादुर शास्त्री ने अपने परिवार के साथ हफ्ते में एक दिन उपवास रखना शुरु किया
जिसके बाद उन्होंने देश से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की शास्त्री जी की इस अपील को पूरे देश ने दिल से स्वीकार किया और इसका देश के हर नागरिक ने पालन भी किया ।
शास्त्री जी प्रधानमंत्री बन चुके थे लेकिन उनके पास एक कार तक नहीं थी उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद पंजाब #नेशनल_बैंक से #पांच_हजार का लोन लेकर एक फिएट कार खरीदी जिसकी पूरी किश्त उन्होने अपनी मेहनत व सैलरी से भरना शुरु किया था लेकिन उसकी किश्ते पूरी के पहले ही उनका रहस्यमयी तरीके से निधन हो गया
जिसके बाद इस लोन को शास्त्री जी की पत्नि ने अपनी पेंशन से चुकाया।
पाकिस्तान से समझौते के लिए शास्त्री जी जब ताशकंद गए तो उनके पास एक गर्म कोट तक नहीं था ताशकंद में बहुत अधिक सर्दी पड़ रही थी तब सोवियत संघ के प्रधानमंत्री #Alexei_Kosygin
( अलेक्सी कोशिगीन ) ने तोहफे में शास्त्री जी को एक गर्म ओवर कोट दिया. जिसे उन्होने अपने साथ गए एक कर्मचारी को गिफ्ट मे दे दिया।
ताकि उसे ठंड ना लगे. इस घटना का पता चलने पर रूसी नेता अलेक्सी कोशिगीन ने कहा था कि हम कम्युनिस्ट हैं लेकिन प्रधानमंत्री शास्त्री एक सुपर कम्युनिस्ट हैं ।
उनके जीवन की एक मूल्यवान व शिक्षाप्रद घटना ।
लालबहादुर शास्त्री जी की सीधी रहन-सहन आज भी राष्ट्र समर्पण भाव की प्रेरणा देती है ।
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी सरलता और महानता की प्रति कृति थे ।उनके जीवन के अनेक प्रसंग प्रेरणाप्रद हैं ।
जब वे देश के प्रधानमंत्री थे तब की बात है । एक दिन वे कपडों की मिल देखने के लिए गए । उनके साथ मिल के स्वामी, उच्च अधिकारी तथा अन्य प्रशासकीय लोग थे । मिल देखने के उपरांत वे मिल के गोदाम में गए और वहां उन्होंने सुंदर साडियां दिखाने के लिए कहा ।
मिल के स्वामी और अधिकारियों ने उन्हें एक से बढकर एक साडियां दिखाई। शास्त्रीजी साडियां देखकर बोले, ‘‘साडियां तो बहुत सुंदर है, इनका क्या मूल्य है ?’’
‘‘यह साडी 800 रुपयों की है और इसका मूल्य एक सहस्र रुपए (1000 ₹) है ।’’ मिल के स्वामी ने कहा ।
इस पर शास्त्रीजी बोले, ‘‘यह तो बहुत महंगी है । मुझे अल्प मूल्य की साडियां दिखाइए ।’’ यहांपर यह ध्यान में लेना चाहिए की प्रस्तुत घटना 1964 की थी । उस समय एक हजार रुपयों का मूल्य अधिक था ।
‘‘अच्छा, यह देखिए, यह साडी पाच सौ रुपयों की है और यह चार सौ रुपयों की है’’ मिल का स्वामी दूसरी साडियां दिखाते हुए बोला ।
‘‘अरे भाई, ये भी बहुत महंगी हैं ! मेरे जैसे निर्धन को अल्प मूल्यों की साडियां दिखाइए, जो मैं खरीद सकूंगा ।’’ शास्त्री जी ने कहा । ‘‘वाह, सरकार ! आप तो हमारे प्रधानमंत्री है । आपको निर्धन कैसे कह सकते है ?
हम तो आपको यह साडियां उपहार में देना चाहते है !’’ मिल के स्वामी ने कहा ।
‘‘नहीं भाई, मैं तुम से उपहार नहीं ले सकता ।’’ शास्त्रीजी ने कहा । इस पर उस मिल के स्वामी ने अधिकार से कहा, ‘‘अपने प्रधानमंत्री को उपहार देना, यह हमारा अधिकार है ।’’
‘‘हा मैं प्रधानमंत्री हूं ।’’ शास्त्रीजी ने शांती पूर्वक कहा । ‘‘परंतु, इसका अर्थ यह नहीं की जिन वस्तुओं को मैं खरीद नहीं सकता उनका मैं उपहार के रूप में स्वीकार करूं और अपने पत्नी को दे दू । भले ही मैं प्रधानमंत्री हूं, तब भी हूं निर्धन ही न ?
आप मुझे सस्ती साडियां दिखाइए । मेरी क्षमता के अनुसार ही मैं साडी खरीदूंगा ।’’
मिल के स्वामी की की हुई सभी विनतीयां व्यर्थ गई । देश के प्रधानमंत्री ने सस्ते भाव की साडियां ही खरीद ली । शास्त्रीजी इतने महान थे की मोह उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकता था ।
#लाल बहादुर शास्त्री....
सादगी और ईमानदारी की मिसाल
★न भूतो न भविष्यति★
#उनके_जीवन_के_कुछ_अन्य_संस्मरण
शास्त्रीजी की पूरी जिंदगी सादगी और ईमानदारी की मिसाल थी।
● सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल नही किया ●
लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने अपनी किताब 'लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' में देश के पूर्व प्रधानमंत्री के जीवन से जुड़े कई आत्मीय प्रसंग साझा किए हैं। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि उनके पिता सरकारी खर्चे पर मिली कार का प्रयोग नहीं करते थे। एक बार उन्होंने अपने पिता की कार चला ली तो उन्होंने किलोमीटर का हिसाब कर पैसा सरकारी खाते में जमा करवाया था।
●पत्नी के लिए नहीं ली महंगी साड़ी●
शास्त्रीजी एक बार अपनी पत्नी और परिवार की अन्य महिलाओं के लिए साड़ी खरीदने मिल गए थे। उस वक्त वह देश के प्रधानमंत्री भी थे। मिल मालिक ने उन्हें कुछ महंगी साड़ी दिखाई तो उन्होंने कहा कि उनके पास इन्हें खरीदने लायक पैसे नहीं हैं। मिल मालिक ने जब साड़ी गिफ्ट देनी चाही तो उन्होंने इसके लिए सख्ती से इनकार कर दिया।
●घर से हटवा दिया था सरकारी कूलर●
शास्त्रीजी मन और कर्म से पूरे गांधीवादी थे। एक बार उनके घर पर सरकारी विभाग की तरफ से कूलर लगवाया गया। जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री को इस बारे में पता चला तो उन्होंने परिवार से कहा, 'इलाहाबाद के पुश्तैनी घर में कूलर नहीं है। कभी धूप में निकलना पड़ सकता है। ऐसे आदतें बिगड़ जाएंगी।' उन्होंने तुरंत सरकारी विभाग को फोन कर कूलर हटवा दिया।
●फटे कुर्ते से बनवाते थे रुमाल●
शास्त्रीजी बहुत कम साधनों में अपना जीवन जीते ते। वह अुनी पत्नी को फटे हुए कुर्ते दे दिया करते थे। उन्हीं पुराने कुर्तों से रुमाल बनाकर उनकी पत्नी उन्हें प्रयोग के लिए देती थीं।
●अकाल के दिनों में रखा था एक दिन का व्रत●
अकाल के दिनों में जब देश में भुखमरी की विपत्ति आई तो शास्त्रीजी ने कहा कि देश का हर नागरिक एक दिन का व्रत करे तो भुखमरी खत्म हो जाएगी। खुद शास्त्रीजी नियमित व्रत रखा करते थे और परिवार को भी यही आदेश था।
●शिक्षा में सुधारों के थे हिमायती●
शास्त्रीजी के बेटे सुनील शास्त्री कहते हैं, 'बाबूजी देश में शिक्षा सुधारों को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। अक्सर हम भाई-बहनों से कहते थे कि देश में रोजगार के अवसर बढ़ें इसके लिए बेहतर मूल्यपरकर शिक्षा की जरूरत है।'
●शास्त्रीजी की टेबल पर रहती थी हरी दूब●
पिता के संस्मरण पर लिखी किताब में शास्त्रीजी के बेटे सुनील शास्त्री ने बताया, 'बाबूजी की टेबल पर हमेशा हरी घास रहती थी। एक बार उन्होंने बताया था कि सुंदर फूल लोगों को आकर्षित करते हैं लेकिन कुछ दिन में मुरझाकर गिर जाते हैं। घास वह आधार है जो हमेशा रहती है। मैं लोगों के जीवन में घास की तरह ही एक आधार और खुशी की वजह बनकर रहना चाहता हूं।'
आज हमने शास्त्री जी के निधन की घटना से जुड़ी फाइलें पढ़ने के बाद एक विश्लेषण तैयार किया है ये विश्लेषण 53 साल पहले देश के दूसरे प्रधानमंत्री की मृत्यु से जुड़े रहस्य को समझने में आपकी मदद करेगा ।
आज इस विश्लेषण के लिए हमने कई राजनेताओं, विशेषज्ञों और इतिहासकारों से बात की इस दौरान हमें पता चला कि पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद..लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री के तौर पर कांग्रेस की पहली पसंद नहीं थे, क्योंकि वे खुली सोच के व्यक्ति तथा राष्ट्रभक्त थे, राष्ट्र हित ही उनके लिए सर्वोपरि था ।
नेहरू परिवार के प्रिय होने से इस रेस में मोरारजी देसाई का नाम सबसे आगे चल रहा था लेकिन तब कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र आज की तरह नहीं था, और सिर्फ एक परिवार या उसकी पसंद को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी इसलिए प्रधानमंत्री पद के लिए शास्त्री जी का नाम एक #Neutral_Candidate के तौर पर चुना गया लाल बहादुर शास्त्री उस वक्त कांग्रेस के संकट मोचक माने जाते थे, लेकिन उसी कॉंग्रेस ने आज तक उनकी मौत के रहस्य उजागर नही होने दीए।
उनके प्रधानमंत्री बनने से कुछ वक्त पहले कश्मीर में प्रदर्शन हो रहे थे तब लाल बहादुर शास्त्री ने वहां जाकर समस्या का हल निकाला इसीलिए पंडित नेहरू भी लाल बहादुर शास्त्री से बहुत प्रभावित थे ।
1965 के युद्ध में भारत की जीत के बाद..देश का मनोबल वापस लौटने लगा...देश की जनता में राष्ट्रवाद की भावना भर गई शास्त्री जी के नेतृत्व में अनाज के संकट का सामना भी देश ने बहुत हिम्मत के साथ किया ।
उन्होंने जय जवान जय किसान का नारा दिया और ये नारा...उस वक्त के भारत के स्वाभिमान का प्रतीक बन गया लेकिन 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी के निधन से पूरे देश को एक बड़ा झटका लगा ।
आज भी देश जानना चाहता है कि क्या शास्त्री जी के साथ ताशकंद में कोई साजिश हुई थी ?
क्या शास्त्री जी का निधन किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश का परिणाम था ।
क्या इसमें उस वक्त के सोवियत संघ या पाकिस्तान का भी कोई रोल था ? या फिर शास्त्री जी की मृत्यु के पीछे देश की घरेलू राजनीति थी ।
शास्त्री जी के निधन से किसे फायदा पहुंचा क्या लाल बहादुर शास्त्री को उनके हिस्से का सम्मान मिला ?
इन सवालों के जवाब पूरा देश जानना चाहता है. शास्त्री जी के निधन से जुड़े इन्ही सवालों को लेकर एक फिल्म बनी है.
जिसका नाम है The Tashkent Files है जो इसी माह रिलीज़ हो रही है ।
#रहस्यपूर्ण_मृत्यु Part -2
#We_support_hindutava_unity
मुंबई में शास्त्रीजी की आदमकद प्रतिमा पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करते हुए भारतीय सेना ने लाहौर पर धाबा बोल दिया।
इस अप्रत्याशित आक्रमण को देख अमेरिका ने लाहौर में रह रहे अमेरिकी नागरिकों को निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्धविराम की मांग की।
रूस और अमेरिका के चहलकदमी के बाद भारत के प्रधानमंत्री को रूस के ताशकंद समझौता में बुलाया गया।
शास्त्री जी ने ताशकंद समझौते की हर शर्तों को मंजूर कर लिया मगर पाकिस्तान जीते इलाकों को लौटाना हरगिज स्वीकार नहीं था।
अंतर्राष्ट्रीय दवाब में शास्त्री जी को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा पर लाल बहादुर शास्त्री ने खुद प्रधानमंत्री कार्यकाल में इस जमीन को वापस करने से इंकार कर दिया।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही भारत देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का संदिग्ध निधन हो गया । 11 जनवरी 1966 की रात देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की मृत्यु हो गई।
ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उसी रात उनकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया। शास्त्रीजी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन
(नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया।
जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इन्दिरा गान्धी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नन्दा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।
शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई।
पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया।
मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है, यह रिकॉर्ड इंदिरा सरकार के दौरान क्यो गायब हुए कोई इस प्रश्न का जवाब नही दे सकता है।
#We_support_hindutava_unity
यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्री जी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ।
2009 में मनमोहन सरकार से जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्री जी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।
बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी व कोई भी फ़ाईल उप्लब्ध करवाने से मना कर दिया गया।
शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल #आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली।
2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र अंग्रेजी: CIA's Eye on South Asia नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि "शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है।
ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।"
सबसे पहले सन् 1978 में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था।
उस समय 1978 मे ललिताजी जीवित थीं।
उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी ललीता शास्त्री ने दावा किया कि उनके पति को जहर देकर मारा गया उनके बेटे सुनील शास्त्री ने सवाल ने कहा था कि उनके पिता की बॉडी पर नीले निशान थे साथ ही उनके शरीर पर कुछ कट भी थे ।
बता दें कि शास्त्री की मौत 11 जनवरी 1966 को हुई थी इससे पहले वो पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग को खत्म करने के लिए वह समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए ताशकंद गए थे 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी को रात के समय मे तड़के 1.32 बजे अचानक मौत हो गई ।
हालांकि, उस समय की भारत सत्कार के द्वारा आधिकारिक तौर पर कहा जाता रहा है कि उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई ।
यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
गत वर्ष जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी।
Mitrokhin_Archive नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है।
शास्त्री जी की पत्नी ने ही केवल यह नही कहा उनके पती की हत्या की गई है साथ ही उनके परिवार ने भी उठाए है कई सवाल ।
शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे हैं। उनके परिवार के लोगों की तरफ से भी आरोप लगाए जाते रहे है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्टअटैक से नहीं, बल्कि जहर देने से ही हुई ।
कुछ समय पूर्व लाल बहादुर के पुत्र अनिल शास्त्री ने कहा था कि उस वक्त तो वह सिर्फ 17 साल के थे। लेकिन उनकी मां ने बताया था कि जब शास्त्री जी का पार्थिव शरीर दिल्ली आया तो उस वक्त उनका चेहरा नीला पड़ गया था और आंख के पास सफेद धब्बे पड़ गए थे । उन्होंने यह खुद भी देखा था। इसके बावजूद उस वक्त ना तो कोई जांच कमीशन बैठाया गया और ना ही रूस में कोई पोस्टमार्ट्म हुआ था।
पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त कर दी गई थी। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेंट्री लाइब्रेरी में आज भी इसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जवाब दिया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आरएन चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जांच की थी, लेकिन सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।
बाद में पीएम ऑफिस से जब इसकी जानकारी मांगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी। आरटीआई से भी नहीं मिली जानकारी शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पोल एक पत्रिका द्वारा 2009 में खोली गयी। 2009 में, जब एक अंग्रेजी पुस्तक CIA S Eye On South Asia के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से यह कहा गया कि शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुंच सकती है। ये तमाम कारण हैं, जिससे इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता।"
बताते चलें कि सुभाष चन्द्र बोसे से जुडी फाइलों के सार्वजानिक होने से यह भी पता चला है कि नेताजी 1966 तक जिंदा थे।
शास्त्रीजी की मौत किन हालात में हुई यह बात आज भी रहस्य बनी हुई है।
इस पर पीएमओ की ओर से इस तरह का जवाब अपने आप में ही कई सवाल खड़ा करता है। एक बड़ा है कि इसे राजनीतिक मुद्दा न बना कर क्या शास्त्री परिवार और अन्य देशवासी कभी लाल बहादुर शास्त्री की मौत का राज जान पाएंगे?
शास्त्री जी के कुशल नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर लाहौर पर लगभग कब्जा कर लिया था बाद में जिसे इंदिरा गांधी की सरकार ने फिर से पाकिस्तान को सौंप दिया था।
ऐसे माँ भारती के वीर सपूत को हमने अनायास ही खो दिया ।
जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले धरती के लाल "बहादुर शास्त्री जी" को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि।
"मिट्टी के लाल, गूदडी के लाल " महान देशभक्त, पूर्व प्रधानमंत्री "श्री लाल बहादुर शास्त्री जी " के पावन जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन, व आप सभी देशवासियो को हार्दिक शुभकामनाएं।
आप अपने बच्चो को अवश्य बतायें कि 2 अक्टूबर को चरित्रवान, निष्ठावान व देशभक्त लालबहादुर शास्त्री जी की जयन्ती है ।
🙏 #जय_जवान_जय_किसान 🙏

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
If you have any doubts,please let me know