श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--19 )
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन
पूज्यपाद गुरूदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन
उन दिनों बंगाल के राजपरिवार के लोगों ने अपने शत्रुओं को हराने के लिए बड़े- बड़े राजतांत्रिक पाल रखे थे और उनसे भयानक तान्त्रिक प्रयोग और अनुष्ठान करवाया करते थे। चन्दन नगर के राजपरिवार में भी एक राजतान्त्रिक था। जानते हो वह कौन था ? यही प्रधान कापालिक था। इसका प्रभाव पूरे राजपरिवार पर था।
राय साहब का एक परम शत्रु था--मदन मोहन मजूमदार। वह बड़ा ही धूर्त, लम्पट और ऐय्यास किस्म का था और भी कुछ ऐसी बातें थीं जिनके कारण राय साहब उससे भयभीत रहा करते थे। फिर एक बार कुछ ऐसी घटनाएं घट गयीं कि राय साहब ने हमेशा के लिए उसे अपने रास्ते से हटाना ही ज़रूरी समझा। इसी में उन्हें अपनी भलाई दिखलायी पड़ी। जब इस सम्बन्ध में उन्होंने प्रधान कापालिक से बात की तो वह सहर्ष तैयार हो गया सहायता के लिए।
प्रधान कापालिक ने उन्हें भयंकर 'मारण-प्रयोग' कर चौबीस घंटों में उस संकट को हटाने का वायदा कर दिया। लेकिन उसने एक शर्त लगा दी, वह यह कि इसके बदले में उसे स्वर्णा दे दी जाय।
स्वर्णा के रूप और यौवन पर उस प्रधान कापालिक की गिद्ध-दृष्टि पहले से ही लगी हुई थी। उसे वह महाभैरवी बनाकर उच्च तान्त्रिक साधना करना चाहता था। वास्तव में उच्च साधना के लिए स्वर्णा जैसी सुन्दर अक्षत तरुणी मिलती भी कहाँ उसे ? अवसर की प्रतीक्षा थी और वह अवसर उसे अब मिल रहा है, इसलिए उसे वह किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता था। लेकिन राय साहब ने शर्त मानने से साफ इनकार कर दिया। फिर भी उस कुटिल कापालिक ने हार नहीं मानी। बराबर प्रयास में लगा रहा वह।
आखिर कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी घटना घट गयी जिसके फलस्वरूप राय साहब को उस कापालिक की शर्त स्वीकार करनी पड़ी। इसकी चर्चा राय साहब ने जब स्वर्णा से की तो उसका गुलाब-सा खिला चेहरा एक दम काला पड़ गया। आँखों से आंसू निकल पड़े। शरीर थर-थर कांपने लगा उसका। पूरी रात रोती रही स्वर्णा। एक ओर उसके पिता का जीवन था, पुरे राजपरिवार का सम्मान था, राज्य की रक्षा का प्रश्न था और दूसरी ओर था उसका प्यार। आखिर विवश होना पड़ा उसे। अपने पिता के लिए , राजपरिवार के लिए और उसकी रक्षा के लिए अपने प्यार को उत्सर्ग कर दिया उसने।
यह सारी स्थिति जब बकुल को मालूम पड़ी तो वह एकदम बिलख पड़ा। अपने प्यार का वियोग वह सहन न कर सका और काली मंदिर में जाकर उसने भीतर से कपाट बन्द कर लिया और काफी देर तक प्रतिमा के चरणों को पकड़कर रोता रहा। उसके बाद उसने सहसा बलि देने वाला खड्ग उठाया और दूसरे ही क्षण 'खच' की ध्वनि के साथ उसका सिर कट कर धड़ से अलग हो गया।
जब यह दारुण समाचार स्वर्णा को मिला तो वह विह्वल हो उठी, लेकिन अब वह बेचारी क्या कर सकती थी ?
इतना कहकर भट्टाचार्य महाशय चुप हो गए और अपलक शून्य में निहारने लगे। भट्टाचार्य महाशय के शब्दों ने स्वर्णा के अतीत की कथा साकार कर दी थी मेरे सामने। उस समय स्वर्णा के प्रति मेरे मन में जहाँ पीड़ा थी, वहीँ उस कापालिक के प्रति आक्रोश भी था। घर पहुंचा तो थोड़ी देर बाद अचानक स्वर्णा आ गयी। उस साँझ को उसकी उपस्थिति बड़ी विचित्र लगी मुझे। वह एकटक मेरी ओर देख रही थी। जीर्ण, क्लान्त चेहरा, शंख जैसा रंग और अजीब सम्मोहन से भरी ऑंखें। क्या था उस दृष्टि में ?--कह नहीं सकता।
उसके विवर्ण चेहरे की ओर ताकते हुए मैंने कहा--तबियत तो ठीक है न ? कहाँ थी इतने दिनों तक ?
पहले तो तुम मुझे 'आप' कहना बन्द करो आज से--भर्राये स्वर में स्वर्णा बोली--मुझे यह सुनना अच्छा नहीं लगता, समझे।
तो क्या कहूँ ?--हंसकर मैंने पूछा।
'तुम'..मुझे 'तुम' कहकर पुकारा करो।
ठीक है, आजसे 'तुम' कहकर ही पुकारा करूँगा।
चारपाई पर मेरे निकट बैठती हुई स्वर्णा कहने लगी-- तुम अभी तारानाथ भट्टाचार्य से मिलकर आ रहे हो न ? मुझे सब कुछ मालूम है। सब कुछ जानती हूँ मैं। बोलो, क्या-क्या बातें हुईं उनसे ?
जब तुमको सब कुछ मालूम ही है तो मेरे बतलाने से क्या लाभ ?
नहीं, मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूँ।
ठीक है, लो सुनो। और मैंने सब कुछ सुना दिया उसे। फिर अन्त में बोला--स्वर्णा, एक ओर तुम्हारे पास असीम अलौकिक शक्तियां हैं और दूसरी ओर बकुल की तमाम यादें भी हैं तुम्हारे ह्रदय में। सचमुच तुमने बड़ा ही त्याग किया है, स्वर्णा। लेकिन एक बात पूछ सकता हूँ ? क्या उस त्याग का मूल्य वे तमाम पैशाचिक शक्तियां भर ही हैं जिनका बोझ उठाये तुम न जाने कितने सालों से जिन्दा लाश की तरह भटक रही हो काशी की अँधेरी गलियों में ? सोचता हूँ, यदि उन शक्तियों की अपेक्षा त्याग व प्रेम का मूल्य अधिक होता तो उन्हीं शक्तियों की सहायता से तुम अपना बदला ले लेती उस कुटिल कापालिक से। न जाने किस आवेश में कैसे इतना सारा बोल गया मैं--समझ में नहीं आया। स्वर्णा चुपचाप सुनती रही। कुछ बोली नहीं। उसकी ऑंखें डबडबा आयीं।
फिर एक झटके से उठी वह और दुबारा मेरी ओर देखे बिना कमरे से बाहर निकल गयी। मैं उसे जाते हुए देखता रहा। न उसे रोका और न टोका ही। बाद में बहुत अफ़सोस हुआ। क्यों कह दी मन को चोट लगने वाली बात ? नहीं कहनी चाहिए थी। पूरी रात व्याकुल मन लिए करवट बदलता रहा मैं चारपाई पर।
क्रमशः--
( नोट- उपरोक्त लेख केवल सामान्य जानकारी हेतु है )

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