श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--16 )
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन
पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन
अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति से मैं इतना ही समझ सका कि शायद तीन या चार दिन पहले लाया गया होगा मुझे उस काल कोठरी में। लेकिन क्या अब मैं यहाँ से निकल पाउँगा या इसी तरह से घुट-घुट कर मरूँगा ? अब क्या होगा ?कैसे मिलेगा मुझे त्राण ? काश ! न आया होता यहाँ स्वर्णा की खोज में ! यह दुर्दशा तो न होती ! भूख-प्यास और कमजोरी से मेरी हालत हर क्षण ख़राब होती जा रही थी। छाती में अचानक बहुत तेज दर्द होने लगा। साँस लेने में भी तकलीफ होने लगी। मैं समझ गया कि अब मेरे जीवन का अन्त समीप है। धीरे-धीरे मेरा शरीर शिथिल होता जा रहा था। आँखें भी बंद होने लगीं। फिर मैं कब निढाल होकर ठन्डे फर्श पर लुढ़क गया--पता नहीं।
और जब होश आया तो डॉक्टरों से घिरा पाया। उस समय मुझ पर झुकी हुई मेरे चेहरे की ओर अपलक निहार रही थी स्वर्णा। मैंने देखा--उसकी आँखों में आंसू थे और होंठ थरथरा रहे थे। मुझे होश में आया देख मेरे गले से लिपट गयी वह। उसके आंसुओं से मेरा पूरा चेहरा भीग गया और जब वह मुझसे अलग हुई तो उसकी आँखों में झिलमिल आंसुओं के मोतियों के आलावा एक ऐसा भाव भी था जो सिर्फ अपने अत्यन्त निकट के व्यक्ति में ही होता है।
उन झिलमिलाते मोतियों, थरथराते होठों और अपनत्व के भाव को देखकर मेरे मन के अन्तराल में स्वर्णा के प्रति एक ऐसी कोमल और मधुर भावना अंकुरित हो गयी जिसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास। उस क्षण ऐसा लगा कि हम दोनों का बड़ा पुराना और बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध है।
भट्टाचार्य महोदय ने बतलाया--मैं कापालिकों के जिस साधना-गृह में गया था, वह अति प्राचीन है। वहां पहले नर-बलि होती थी। आज भी शायद दीपावली के अवसर पर होती है। पहले तो वहां किसी का जाना ही मुश्किल है और यदि संयोगवश अथवा दुर्भाग्यवश कोई व्यक्ति वहां पहुँच भी गया तो फिर उसे बाहर नहीं निकलने दिया जाता। साधना-गृह की गोपनीयता बनाये रखने के लिए उसकी वहीँ बलि दे दी जाती है।
क्या मेरी भी बलि दे दी जाती ?--मैंने हकलाते हुए पूछा।
क्यों नहीं ? इसीलिए तो तुमको उस काल-कोठरी में रखा गया था। अगर स्वर्णा ने अथक प्रयास करके तुमको वहां से न निकाला होता तो आज मेरे सामने न बैठकर किसी और ही दुनियां में होते तुम।
यह सुनकर पल भर के लिए स्तब्ध रह गया। फिर पूछा--अच्छा तो स्वर्णा ने बचाया मुझे ? मुझे नहीं मालूम था। स्वर्णा ने भी नहीं बताया मुझे। अच्छा ! लेकिन वह क्यों निकाल कर ले आई मुझे ? क्यों उसने मेरी रक्षा की ?--मेरी समझ नहीं आ रहा है...।
भट्टाचार्य महोदय भला इसका क्या उत्तर देते ? वह मौन रह गए। मैं उठकर कालीबाड़ी से बाहर निकल आया। रास्ते में बराबर मैं स्वर्णा के ही बारे में सोच रहा था। उसका व्यक्तित्व तो पहले ही मेरे लिए रहस्यमय था लेकिन अब इस घटना से और भी जटिल हो गया वह रहस्य। एक पिशाचसिद्ध साधिका के पाषाणवत कठोर ह्रदय में मेरे प्रति इतनी कोमलता और उदार भावना क्यों आई और उसकी आँखों में मेरे लिए आंसू क्यों थे ? क्यों थरथराये थे मेरे लिए होंठ ?
मैं जितना सोचता और जितना समझने की कोशिश करता, उतना ही और उलझता जा रहा था। आखिर घर पहुँचते ही दोनों हाथों से सिर थाम कर बैठ गया। पूरी रात नींद नहीं आई। लगातार करवटें बदलता रहा। किसी प्रकार भोर की बेला में जरा- सी झपकी लगी तो उसी तंद्रावस्था में मैंने देखा--मेरे सामने वही कापालिक खड़ा है और अपनी क्रूरताभरी लाल-लाल आँखों से मुझे घूर रहा है। चेहरा उसका क्रोध से तमतमा रहा है। उसके हाथ में बलि देने वाला वह भयानक खड्ग भी था। वह धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ा फिर एक झटके से खड्ग वाला हाथ ऊपर उठाकर एकदम मेरी और झपट पड़ा।
जोर से चीख पड़ा मैं। और उसी चीख के साथ ही मेरी आँख खुल गयी। सारा शरीर पसीने से भीग उठा था मेरा। मेरा रोम-रोम कांप रहा था उस समय।
क्रमशः--
नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता

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