ध्यान क्या है ? ( भाग--04 )
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी किअद्भूत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पुज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन
---:ध्यान, प्रेम और शान्ति:---
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साधना के सम्बन्ध में बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनसे बहुत ही कम लोग परिचित हैं। पहले मस्तिष्क को ही ले लें--यह पहला केंद्र है। मस्तिष्क हर वक्त तनावग्रस्त रहता है यहाँ तक कि निद्रा-काल में भी। मनुष्य पूरे दिन जो भी कार्य करता है, वही कार्य वह निद्रा-काल में भी करता है। पूरे दिन का प्रतिविम्ब रात्रि है। दिनभर मानस-पटल पर विचारों की, भावों की, कार्यों की और अनुभवों की जो छाया बराबर पड़ती रहती है, उसीकी प्रतिध्वनि अथवा प्रतिच्छाया निद्रा-काल में बराबर उभरती रहती है। मनुष्य का जो काम दिन में पूरा नहीं हुआ रहता है, उसे मन निद्रा-काल में पूरा करने का प्रयास करता है। दिनभर व्रत-उपवास रखने वाला व्यक्ति निद्रा-काल में स्वप्न में भोजन करता है। दिन के अभाव की पूर्ति इस प्रकार निद्रा-काल में हो जाती है। नारी-सुख से वंचित मनुष्य स्वप्नावस्था में नारी-सुख प्राप्त कर अपने को संतुष्ट कर लेता है। जाग्रत अवस्था में जिस वस्तु का अभाव रहता है, उस अभाव की पूर्ति स्वप्नावस्था में स्वयं हो जाती है।
अब ह्रदय को लीजिये। मस्तिष्क की तरह वह भी हर समय तनावग्रस्त रहता है। हर समय वह घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि से भरा रहता है। प्रेम क्या है, स्नेह क्या है, दया क्या है, करुणा क्या है ?--इन सबको एक प्रकार से मनुष्य जानता ही नहीं। उनसे विपरीत जो कुछ भी है, उनसे वह परिचित है। ह्रदय एक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र है। उसमें एक ही काल में और एक ही अवस्था में एक ही वस्तु रह सकती है, दूसरी नहीं--या तो प्रेम रहेगा या घृणा रहेगी। लेकिन मनुष्य अपने एक ही ह्रदय में दोनों काम करता है। कभी प्रेम करता है वह तो कभी घृणा। वह भली-भांति न प्रेम से परिचित है और न तो पूर्णरूप से घृणा से ही। यदि पूर्णरूप से वह प्रेम से परिचित होता तो उसके ह्रदय में कभी घृणा उत्पन्न नहीं हो सकती। प्रेमपूर्ण ह्रदय में घृणा का भाव कभी रह ही नहीं सकता। जरा सोचने की बात है ऐसा क्या कोई ह्रदय है जो प्रेम भी करे और घृणा भी। सच्चा ह्रदय बस एक को जानता है--प्रेम को या फिर घृणा को। यदि वह दोनों को जानता है तो वह ह्रदय नहीं है, पशु है। पशु के पास ह्रदय नहीं होता। ह्रदय का वास्तविक गुण है--प्रेम। प्रेम के वृक्ष पर ही दया, कृपा, करुणा, प्रेम, स्नेह आदि के सुगन्धित फूल खिलते हैं समय-समय पर।
जिसको मनुष्य प्रेम समझता है, वह वास्तव में प्रेम नहीं होता। सच तो यह है कि मनुष्य के ह्रदय में प्रेम नाम की वस्तु है ही नहीं। घृणा के भाव के कम हो जाने को ही वह प्रेम समझता है। आजकल जो प्रेम दृष्टिगोचर होता है, वह प्रेम नहीं, वासना है। सच्चे प्रेम में वासना, कामना, स्वार्थ की भावना लेशमात्र भी नहीं रहती। प्रेम कुछ पाना नहीं चाहता, सदा देना ही चाहता है। प्रेम में हमेशा दूसरे का ध्यान रहता है, स्वयं का नहीं। ऐसे प्रेमपूर्ण ह्रदय में घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष रह ही नहीं सकते।
प्रेम के बाद है आनन्द। मनुष्य ने अपने जीवन में क्या कभी आनन्द का अनुभव किया ? यह कहना कठिन है कि किसी ने प्रेम और आनन्द का कभी अनुभव किया है और कभी किया है शान्ति का अनुभव ? मनुष्य अब तक जिसको जानता-समझता आया है, वह है अशान्ति। अशान्ति की मात्रा जब कभी जीवन में कम हो जाती है, उसे ही वह शान्ति समझ लेता है। लेकिन वह वास्तविक शान्ति है ही नहीं। इसी प्रकार वह घृणा को जानता है, प्रेम को नहीं। वह ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध को जानता है, प्रेम, करुणा, दया और शान्ति को नहीं। एक परम योगी का ह्रदय ऐसा ही होता है--स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण और उनकी सुगंधों से भरा-भरा।
------:मस्तिष्क और ह्रदय तनाव से मुक्त कैसे हो ?:------
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एकमात्र ध्यान से ही मस्तिष्क और ह्रदय तनावमुक्त रह सकते हैं। जैसे-जैसे ध्यान गहन से गहनतम होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे दोनों केंद्रों के तनावों से मुक्त होता जायेगा। मस्तिष्क और ह्रदय दोनों स्वच्छ और निर्मल होते जायेंगे। अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जायेगी जब व्यक्ति का मस्तिष्क और ह्रदय एक परमयोगी का मस्तिष्क और ह्रदय बन जायेगा।
आगे और इंतज़ार करें--

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