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6/04/2022

ध्यान क्या है ? ( भाग--01 )

   
                           
   

ध्यान क्या है ? ( भाग--01 )


परम श्रध्देय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन


पुज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन


          ध्यान  एक यौगिक प्रक्रिया है। ध्यानयोग की चरम उप्लब्धि है--समाधि। बिना समाधि को उपलब्ध हुए अन्तर्जगत् में प्रवेश नहीं किया जा सकता। अंतर्जगत का मतलब है--सूक्ष्म जगत। जब तक सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना शुरू नहीं होती , तब तक अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। स्थूल शरीर से हज़ारों वर्ष साधना करते रहना कोई उपलब्धि नहीं है। केवल अपने को भ्रान्ति में डाले रहना है कि हम साधना कर रहे हैं। साधना करना और साधना करने का भ्रम पालना अलग-अलग है। जो व्यक्ति यह कहता है कि वह साधना करते हुए उस उच्च अवस्था को प्राप्त हो चुका है, जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं, तो बहुत कुछ सम्भव है कि वह साधना-साधना कह कर साधना की मादकता में डूब जाने को ही साधना समझता हो। साधना और साधना समझने की मादकता में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। बहुत से साधक जो विद्वान नहीं है, केवल अन्ध- विश्वासी ही हैं, वह भजन- कीर्तन, पूजा-उपासना को ही साधना समझते हैं और उसी में मस्त रहते हैं। पूजा-उपासना, भजन-कीर्तन का अपना महत्त्व अवश्य होता है पर वह सब साधना नहीं होती। साधना होती है शरीर को साधना, प्राणों को साधना, मन को साधना और अन्त में आत्मा को साधना। सूक्ष्म शरीर से साधना करने को ही सही मायने में आध्यात्मिक साधना करने की शुरुआत  कहते हैं।

      सूक्ष्म शरीर से साधना करते समय साधक का सूक्ष्म जगत के विभिन्न आयामों में प्रवेश स्वतः हो जाता है। सूक्ष्म जगत में प्रवेश होने पर साधक के भौतिक शरीर का अतिक्रमण हो जाता है। साधक को भारहीनता का बोध होना शुरू हो जाता है। इसका एकमात्र कारण है--भूतत्व (पृथ्वी तत्व) का अतिक्रमण होना।इस स्थिति में साधक का समय का बोध लुप्त हो जाता है। कब सवेरा होता है, कब साँझ होती है, कब क्या होता है--इन सबकी प्रतीति नहीं होती है ध्यानकर्ता को।

       भौतिक जगत का अस्तित्व साधक के लिए न के बराबर हो जाता है। सारा जीवन अंतर्मुखी हो जाता है। ध्यान की सीमा और अवधि बढ़ती जाती है। अन्त में एक ऐसी अवस्था आती है जब पूर्णतया समाधिस्थ हो जाता है वह। अब पहली बार सूक्ष्म शरीर में अपने अस्तित्व का बोध करता है साधक। स्थूल शरीर भी है और स्थूल जगत का भी है अस्तित्व--इन दोनों की स्मृति का अभाव हो जाता है उसके लिए, कारण कि स्मृति, बुद्धि और मन की परिधि में होती है और मन माइनस हो जाता है, एक प्रकार से लुप्त ही हो जाता है। 

      मन की चार अवस्थाएं हैं--चेतन मन की अवस्था, अर्धचेतन मन की अवस्था, अचेतन मन की या अवचेतन मन की अवस्था और अ-मन की अवस्था। सारे अनुभव सारे बोध मन की तीन अवस्थाओं में ही होते हैं। जब मन की 'अ-मन' अवस्था उपलब्ध होती है तो मन का अस्तित्व लुप्त हो चूका होता है। मन के अस्तित्व के लुप्त होते ही सारे बोध समाप्त हो जाते हैं, सारी स्मृतियाँ भी अस्तित्व खो देती हैं। जब साधक की समाधि टूटती है तो उस समय आत्मा द्वारा की गयी सारी अनुभूतियाँ मन के सहयोग से मन के धरातल पर आकर स्मृतियों का रूप धारण कर लेती हैं। मन के विभिन्न आयामों की सीमा में जो बोध होते हैं, उन्हें अनुभव कहा जाता है लेकिन आत्मा के द्वारा जो बोध होते हैं, उन्हें ही हम अनुभूतियों की संज्ञा दे सकते हैं। यह ही अन्तर है मन के अनुभवों में और आत्मा  के द्वारा की गयी अनुभूतियों में। आत्मा द्वारा जो भी अनुभूतियाँ होती हैं, उन सब का वर्णन कर पाना बुद्धि और मन के वश की बात नहीं है, फिर भी जो कुछ जितना भी सामर्थ्य मन में होता है, उसी के अनुसार आत्मा द्वारा की गयी अनुभूतियाँ मन के पटल पर स्मृति के रूप में अंकित हो जाती हैं जिनका वर्णन साधक अपने शब्दों में एक सीमा में कर देता है।

      समाधि की अवस्था में उपलब्ध रहस्यमय और अप्रकट ज्ञान भण्डार को वाणी का रूप देना सम्भव उसी के लिए है, जिसने सभी आध्यात्मिक विषयों का जीवन में गहनतम अध्ययन, चिन्तन और मनन किया हो। जो व्यक्ति केवल भक्ति मार्ग से समाधि को उपलब्ध होता है, ज्ञानमार्ग का उसने जीवन में कभी अनुसरण नहीं किया है, उसे समाधि में सारे बोध तो होंगे लेकिन समाधि भंग होने की स्थिति में समाधि की अनुभूतियों का वर्णन वह अपनी वाणी द्वारा नहीं कर सकता।

     अब तक इस संसार में जितने भी गूढ़, गोपनीय और रहस्यमय विषय अवतरित हुए हैं, वे सब समाधि की अवस्था में ही अवतरित हुए हैं जिन्हें 'ऋतम्भरा' वाणी द्वारा सर्वप्रथम ऋषियों ने सूत्रों का रूप दिया था जिन्हें समझ पाना सर्वसाधारण के वश की बात नहीं है।


आगे इंतज़ार करे---





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