बोओगे सो काटोगे ( हिन्दी कहानी )
एक मांसाहारी परिवार था। परिवार का प्रमुख रोज एक मुर्गे को हलाल करता था। मुर्गा चीखता और वह अट्टहास भरता।
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उसके तीन अबोध बच्चे थे। बड़ा करीब चार वर्ष का था, दूसरा ढाई वर्ष का और तीसरा गोद का बच्चा था।
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उसके बच्चे जब पिता के इन कृत्यों को देखते तो उन्हें लगता कि उनके पिता कोई खेल खेलते हैं और पिता को उसमें बड़ा आनन्द आता है।
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एक दिन पिता किसी काम से कहीं बाहर गये। घर में मुर्गा नहीं आया, बच्चों ने सोचा आज पिताजी नहीं हैं, चलो आज अपन यह खेल खेलें।
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बड़े बेटे ने छोटे को लिटाया, लिटाकर एक पैर से उसे दबाया, एक हाथ से सिर दबाया और उसके गले को छुरे से रेत दिया।
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जैसे ही रेता, बच्चा चीख पड़ा।
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वह चीखा तो इसके भी होश उड़ गये। वह सीधा भागकर ऊपर गया।
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चीख की आवाज़ सुनी तो माँ जो अपने सबसे छोटे बेटे को टब में नहला रही थी, वह उसे वहीं छोड़कर ऊपर भागी।
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बेटे ने देखा माँ आ रही है मुझे मारेगी। उसने अपना सन्तुलन खो दिया और छत से गिरकर अपनी जान दे दी।
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इधर वह बेटा भी गले की नस कट जाने के कारण मर चुका था। माँ दोनों बेटों का हाल देखकर वहीं मूर्छित होकर गिर गई।
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काफी देर बाद उसे होश आया तो याद आया कि छोटे बेटे को टब में नहलाता हुआ छोड़कर आई थी।
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तब तक काफी समय गुजर चुका था। जब वह नीचे आई तो उसका गोद का बालक टब में ही शान्त हो चुका था।
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ये है पाप का कहर। आदमी पाप करता है तो उसका परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है।
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अफसोस कि मनुष्य सब चीजों को देखते हुए, समझते हुए भी पाप करने से भय नहीं खाता।
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जो बोयेंगे, ऐसा ही काटेंगे.... पाप का फल, आज नही तो कल।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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