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5/26/2021

अम्मा की मठरियां ( वार्ता )

   
                           
   

अम्मा की मठरियांवार्ता )



आज अम्मा का पूरा काम पूर्ण निष्ठा के साथ निपट गया, बेटे बहू ने बहुत ही दिल से सब कार्य पूरे शास्त्रोचित तरीके से करे। उनको अपने धर्म और रीति रिवाजों पर अटूट विश्वास था, सो बेटे रवि और बहू करुणा ने उनकी आस्था और विश्वास को टूटने नही दिया। दोनों बहनें खबर पाते ही पहुँच गई थी।


रात को अम्मा का परिवार हॉल में एकत्रित हुआ, दोनों बहनें एक दूसरे को इशारा करके जैसे कुछ कहना चाह रही थीं......रवि तो बेचारा अभी तक अम्मा के यूँ चले जाने को जैसे स्वीकार ही नही कर पाया था पर समझदार बहू......वो अचानक उठ कर अलमारी से एक खूबसूरत चाँदी का डिब्बा ले आई और सबके बीच में रख कर बोली," दीदी! ये अम्मा की अंतिम धरोहर जो वो अपने तीनों बच्चों को अपनी निशानी के तौर पर देना चाहती थी....आप लोग पहले देख लीजिए।"


दोनों ने थोड़े दिखावटी संकोच के बाद   अपनी अपनी पसंद के जेवर छाँट लिए। बड़ी दीदी बोली... अम्मा ये बाजूबंद मेरे मनु की बहू के लिए रखे हुए थी....छोटी ने इसी तरह उनका नेकलेस हथिया लिया....।

करुणा आँखों में आँसू भरे चुपचाप सब तमाशा देख रही थी ,रवि को तो जैसे कोई मतलब ही नही था। दोनों दीदी लोगों ने जब उससे कुछ पूछा तो रुंधे कण्ठ से बामुश्किल बोल पाया," मेरी अम्मा चली गई पर उनका पूरा आशीर्वाद हम सब पर हमेशा रहेगा..... बाबूजी और अम्मा का दिया सब कुछ है, आपलोग अपना पसंदीदा

गहना उनका आशीर्वाद समझ कर ले लीजिए।"


तभी करुणा एक बड़ा सा स्टील का डिब्बा लेकर आ गई," ये अम्मा की बनाई मठरियां हैं, ये उस दिन उन्होंने बहुत प्रेमपूर्वक मेरे साथ मिल कर बनवाई थीं, ये अम्मा के हाथों का आखिरी अमृत है ।"


सुनते ही दोनों बहनों की तो भृकुटि ही तन गई,"हद कर दी तुम लोगों ने! इतनी बीमार अम्मा को चौके में घुसा कर मठरी बनवा डाली! वो ये सब सह नही पाई।"

"ऐसा नही है दीदी! उस दिन उनकी तबीयत कुछ ठीक थी , बिस्तर पर पड़े पड़े ऊब गई थी , बहुत समझाने पर भी चौके में आ गई और करुणा के साथ मिल कर सारी मठरियां बनवा डाली! वो तो ठिकुआ बनाने की भी जिद कर रही थी।"

 

दीदियों के तेवर को अनदेखा करते हुए बहू बोली,"अम्मा की बनाई इन मठरियों में से आप लोग भी कुछ प्रसाद स्वरुप  ले लीजिये।"


उसके इतना कहते ही जैसे जबर्दस्त बमविस्फोट हो गया," शर्म करो करुणा! इन्हीं मठरियों ने हमारी अम्मा की जान ले ली और हम इन्हें उनका प्रसाद समझ लें.....ना बाबा ना....हम इतने कठोर नही हैं.... तुम दोनों को मुबारक उनका ये प्रसाद।" कहते हुए दोनों झटके से उठी और अपने हिस्से के जेवर लेकर कमरे में घुस गईं।

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