मेरठ, नाम बदल गया पर मिट्टी नही बदली।
जिस मिट्टी को मय ने सजाया सँवारा, जिस मिट्टी को स्वयं विश्वामित्र ने शिव की उपासना हेतु चुना उस मिट्टी पर सिंधु घाटी सभ्यता का आखिरी छोर होने का आवरण डाल कर छद्म इतिहासकारों ने इति श्री कर दी लेकिन उन्हें यह पता नही कि सत्य पर आवरण पड़ सकता है किंतु उसे नष्ट कभी नही किया जा सकता।
सिनौली के प्रमाणों के उजाले में महाभारत को देखने का प्रयास कर रहे पुरातत्वविदों को महादेव ने एक और सत्य परिचित कराया।
मेरठ शिवलिंग पर जो लिपि मिली है उसे पढ़ने की कोशिश में यह बताया जा रहा है कि लिपि ईसापूर्व की है।
यह तथ्य उन धूर्त वामियों के मुँह पर जोरदार तमाचा है जो कहते थे कि भारत में लेखन की परंपरा का कोई प्रमाण नही मिलता है।
जो मृदभांडों के सहारे ही इतिहास की मनगढ़ंत और सुविधाजनक व्याख्या करते आ रहे उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने श्रुत परंपरा को साक्षर भारत की परंपरा होने से क्यों इनकार किया।
अब लेखन के प्रमाण आ रहे हैं तो क्या वे लोग अपने कृत्यों और ऊल जलूल लेखन के लिए क्षमा माँगेंगे।
मेरठ का पुराना नाम मयराष्ट्र था जिसे मंदोदरी के पिता दानवराज मय ने बनाया था।
यह वही मय के उत्तराधिकारियों को भी मय ही कहा गया उन्ही मय के द्वारा इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया गया था।
वहीं पर एक जगह है बरनावा जहाँ पर मोम के बने जले आवासों के प्रमाण मिले हैं यह वही जगह है जिसे महाभारत में वारणावत कहा गया है जहाँ पुरोचन ने पांडवों को मारने के लिए लाख का घर बनाया और बाद में उसे जला दिया था।
किंतु कामरेडों ने मेरठ की पहचान आलमगीरपुरी सभ्यता को जोड़कर बड़ी चालाकी से महाभारतकालीन प्रमाणों को छिपाने का काम किया।
जाने कितने कुहासे अभी और छँटेंगे।
देवासुर संग्राम को मूल निवासी बनाम बाहरी आर्य बताने वालों ने खूब प्रयत्न किए कि सत्य बाहर न आये।
सिनौली के उत्खनन को 2005 में रोक दिया पर आभार मोदी जी का और योगी जी का कि उन्होंने इस कार्य को पुनः शुरू करवाया है।

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