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10/05/2020

तारा तारिणी माता का मंदिर/शक्तिपीठ मंदिर

   
                           
   

तारा तारिणी माता का मंदिर/शक्तिपीठ मंदिर


तारा तारिणी माता शक्तिपीठ का मंदिर, उड़ीसा के ब्रह्मपुर या बेरहामपुर शहर से 29 किलोमीटर दूर ऋषिकुल्या नदी के किनारे स्थित पुण्यगिरी पर्वत पर है। पुण्यगिरी पर्वत को इस क्षेत्र में रत्नागिरी, तारिणी पर्वत और कुमारी पहाड़ के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस शक्तिपीठ स्थान पर माता सती के स्तन गिरे थे। यहां मां तारा और मां तारिणी को आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है।





तारा-तारिणी माता के इस शक्तिपीठ के विषय में खास बात यह है कि यह शक्तिपीठ उन 4 प्रमुख तंत्र शक्ति पीठों में से एक माना जाता है जिनको तंत्र पीठ या तंत्र विद्या के लिए विशेष माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में जिन चार प्रमुख शक्ति पीठों को तंत्र पीठ के रूप में माना जाता है उनमें ब्रह्मपुर का मां तारा तारिणी शक्ति पीठ या स्तन पीठ, दूसरा पूरी जगन्नाथ मंदिर के परिसर में स्थित बिमला शक्तिपीठ या पाद शक्ति पीठ, तीसरा गुवाहाटी का कामाख्या शक्ति पीठ या योनि शक्ति पीठ और कोलकाता का दक्षिण कालिका शक्तिपीठ या मुख खंड शक्ति पीठ हैं। इन चारों ही शक्तिपीठों को आदि शक्ति पीठ भी माना गया है। इसलिए यह स्थान हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है।


मान्यताएं –


शक्तिपीठों को लेकर मान्यता है कि अपने पिता दक्ष द्वारा अपमानित होकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया था। जिसके बाद क्रोध में आकर भगवान शिव ने वैराग्य धारण कर लिया और माता सती के उस शव को अपने कंधे पर उठाए ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने रहे। उनके वैराग्य धारण कर लेने से सृष्टि के संचालन में बाधा उत्पन्न हो रही थी। इसलिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े कर दिए थे। जहां-जहां भी माता सती के शव के अंग गिरे थे उन सभी स्थानों पर माता सती के शक्तिपीठों की स्थापना हो गई और उनकी रक्षा करने के लिए भगवान शिव स्वयं आज भी अपने भैरव रूप में वहां विराजते हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए ये शक्ति पीठ रूपी तीर्थ स्थल अनादिकाल से अत्यंय पावन तीर्थ कहलाते आ रहे हैं। माना जाता है कि इन शक्तिपीठों के दर्शन मात्र से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं और अतुलनीय सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विभिन्न धर्म शास्त्रों में भी इन शक्तिपीठों के प्रभावों की महिमा बताई है। देवी भागवत पुराण में के अनुसार शक्तिपीठों की संख्या 108 है, जबकि कालिका पुराण में छब्बीस बताई गई है। शिवचरित्र में इनकी संख्या इक्यावन मानी गई है। जबकि दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूड़ामणि में इन शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है। और इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है तारा तारिणी शक्तिपीठ मंदिर।


महत्व –


मंदिर में विराजित तारा तारिणी को दो बहनों तारा और तारिणी का संयुक्त रूप माना जाता है। इसमें देवी तारा को विद्या की देवी सरस्वती माना गया है। जबकि तारिणी को देवी काली का रूप माना जाता है। इसके अलावा देवी तारिणी को आदिशक्ति दुर्गा भी कहा गया है। तंत्र विद्या के कई साधक नवरात्री के दिनों में और कुछ विशेष अवसरों पर इस स्थान पर साधनाएं करने आते हैं। यहां बौद्ध तांत्रिकों द्वारा भी तंत्र विद्य और पूजा-पाठ करने के प्रमाण मिलते हैं।


पौराणिक महत्व –


तारा तारिणी शक्तिपीठ मंदिर की स्थापना कैसे हुई यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। एक शक्ति पीठ होने के आलावा तारा तारिणी पीठ की गणना एक तंत्र पीठ के रूप में भी की जाती है। इसलिए कुछ लोग इस तंत्र परंपरा को बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय से जोड़कर भी देखते हैं। इसके अलावा इस शक्तिपीठ मंदिर के नाम में ‘तारा‘ का होना भी इस धारणा को बल देता है। क्योंकि बोद्ध धर्म की मान्यताओं के अनुसार तारा बोधिसत्व का स्त्री रूप थी। इसलिए यह मंदिर बोद्ध धर्म से भी जुड़ा हुआ बताया जाता है। जबकि इस इलाके में सम्राट अशोक के शिलालेख और मंदिर में बुद्ध की छोटी सी प्रतिमा के आलावा और कोई ऐसे ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं जिनके आधार पर यह साबित होता है कि शक्ति पीठ के रूप में प्रचलित होने के पहले तारा तारिणी एक समय में बौद्धिक तंत्र पीठ रहा होगा। लेकिन स्थानीय किवदंतियां कहती हैं कि तारा और तारिणी नाम की दो बहनें थीं जिन्हें माता की कृपा से दैवीय शक्तियां प्राप्त हुईं और बाद में उन्होंने इस पहाड़ी पर मंदिर की स्थापना की थी।


मंदिर संरचना –


मंदिर के गर्भगृह में मां तारा और मां तारिणी नाम की दो देवियों की प्रतिमा है। पत्थर पर उकेरी गई दोनों ही प्राचीन मूर्तियां सोने और चांदी के आभूषणों से सज्जित हैं। स्थानीय लोगों के द्वारा इन दोनों देवियों को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है। यह मंदिर वास्तुकला की प्राचिन कलिंग शैली में बनाया गया आकर्षक मंदिर है। हालांकि मंदिर की संरचना एक दम नई है लेकिन फिर भी इसके विषय में कुछ विशेष जानकारियां उपलब्ध नहीं है।

लगभग 700 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुँचने और वापसी के लिए रोपवे की बहुत ही अच्छी व्यवस्था है। रोपवे से मंदिर तक जाने में पांच से सात मिनट का वक्त लगता है और इस दौरान आप खेत खलिहानों, आस-पास के गांवों और बगल से बहती हुई उड़ीसा की एक प्रमुख नदी ऋषिकुल्‍या का सुंदर नजारा भी देख सकते हैं। इसके अलावा पैदल यात्रियों के लिए भी इस पहाड़ी पर एक सड़क है जो मंदिर तक जाती है। और अगर कोई सीढ़ियों से जाना चाहे तो उसकी भी व्यवस्था है।


आस्था –


दूर-दराज के क्षेत्रों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं और यात्रियों के लिए तारातारीणी मंदिर के पास ठहरने के लिए बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं है। हालांकि उड़ीसा पर्यटन विभाग की ओर से यहां अतिथि भवन बना हुआ है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। जबकि यहां से लगभग 25 कि.मी. की दूरी पर ब्रह्मपुर में और 35 कि.मी. की दूरी पर गोपालपुर में बजट के अनुसार हर प्रकार के यात्रियों के लिए ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था उपलब्ध है।

यह मंदिर उड़ीसा राज्य के जिला गंजाम के प्रमुख शहरों में से एक ब्रह्मपुर या बेरहामपुर से लगभग 25 कि.मी. दूर है। ब्रह्मपुर रेलवे स्टेशन से इस मंदिर तक की दूरी मात्र 13 किमी. है। एक प्रमुख शहर होने के कारण यहां जाने-आने के लिए ट्रेनों अच्छी सुविधा उपलब्ध है। ब्रह्मपुर या बेरहामपुर स्टेशन से टैक्सी, आॅटो और बस के द्वारा इस जगह तक पहुुंचना बहुत आसान है। इसके अलावा भुवनेश्वर, विशाखापटनम और पुरी से भी यहां जाने के लिए टैक्सी सेवा उपलब्ध है। यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भुवनेश्वर में उपलब्ध है जो यहां से 170 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा एक अन्य हवाई अड्डा जो विशाखापट्नम में है यहां से 250 किलोमीटर दूर है।

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