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10/26/2020

तिलक धारण क्यो करते है

   
                           
   

तिलक धारण क्यो करते है


#सनातन_धर्म_के मानने वाले #तिलक धारण क्यो करते है क्या #तिलक_सभी_जातियो_के_हिंदुओ के लिए है या सिर्फ किसी #जाती_विशेष के लिए।


#तिलक_धारण_क्यों_करें?






शास्त्रों में तिलक-धारण एक आवश्यक धार्मिक कृत्य माना गया तिलक के बिना ब्राह्मण चाण्डाल कहा गया है।


#क्या_ब्राह्मणों_के_अतिरिक्त_अन्य_हिंदू_जातियों_के_लिए_तिलक_आवश्यक_नही


✍सनातन धर्म मे तिलक लगाना आदि काल से ही सभी वर्णो की परम्परा रही है, आदि कवि वाल्मिकी से लेकर तुलसी दास, संत रविदास से लेकर माता शबरी, निषाद राज, संत मीराबाई, संत कबीर,ज्योतिबा फुले,गाड्गे बाबा, हरिजन संत मदारा चेन्नायाह,आदि जितने भी संत महात्मा  हो चाहे वो किसी भी वर्ण  से रहे हो सनातन धर्म मे तिलक लगाने व पूजा प्रणाली की सबको समानता थी। 


✍दलितों को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया। इसी तरह इससे पूर्व के जो भी नाम थे वह हिन्दू धर्म ने नहीं दिए। आज जो नाम दिए गए हैं वह पिछले 70 वर्ष की राजनीति की उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज है।


आइये  इस बिन्दु को पुरा पढकर  हम जानते है।

✍ ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है-

स्नानं दान तपो होमो, देवता पितृकर्म च।

तत्सर्वं निष्फलं याति, ललाटे तिलकं बिना॥


भावार्थ: अर्थात तिलक के बिना सभी जातियों के होम, तपस्या, स्नान, देवता पूजन पितृकर्म, एवं दान (कन्यादान) निष्फल हो जाते हैं। 


✍हिन्दू शास्त्रों में तो तिलक प्रथा को इतना महत्त्व दिया गया कि राज्याभिषेक समारोह का नाम ही 'राज्य तिलक' पड़ गया।


तिलक, टीका, बिंदिया या त्रिपुण्ड, इन सबका सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है। मस्तिष्क शरीर रूपी साम्राज्य का संचालक है।


 मस्तिष्क का ऊपर वाला बड़ा भाग 'प्रमस्तिष्क' कहलाता है। 


✍यह भाग शरीर में आने वाले संवेगों या सूचनाओं (#इम्पलसिस) को ग्रहण करता है । और शरीर के अंगों को सूचनाएं भेजता रहता है। प्रमस्तिष्क मस्तिष्क का वह भाग है जो मनुष्य को देवता अथवा राक्षस, प्रकाण्ड विद्वान अथवा मूर्ख बना देता है।


✍यहां #पिट्यूटरी_ग्रन्थि है जो अन्त:स्रावी तन्त्र की अधिनायक है।

यह कई हारमोन्स उत्पन्न करती है जिससे स्मरण शक्ति, दृष्टि, श्रवण, घाण, संवेदना तथा अन्य बहुत-सी अदृष्ट क्रियाओं का संचालन होता

है।


हमारे दोनों भौंहों के मध्य 'आज्ञा चक्र' की स्थिति है। इस चक्र पर ध्यान घटने से साधक का मन पूर्ण शक्ति सम्पन्न हो जाता है।


यह एक ऐसा चेतना केन्द्र है जहां से समस्त ज्ञान चेतना एवं क्रियात्मक चेतना का समग्र रूप से संचालन होता है। 


✍'आज्ञाचक्र' ही दिव्यनेत्र या तृतीयनेत्र है, जिसकी तुलना टेलीविजन, राडार, टेलीस्कोप की समन्वय युक्त शक्ति से की जा सकती है।


यहां पर तिलक लगाने से 'आज्ञाचक्र' जागृत होगा। आज्ञाचक्र जागृत होने से मनुष्य की शक्ति ऊर्ध्वगामी हो जाती है। 


उसका ओज व तेज बढ़ जाता है। तिलक पर भावनात्मक श्रद्धा होने के कारण व्यक्ति का ध्यान शरीर के अन्य अंगों को छोड़कर मस्तक पर विशेषतः रहेगा जो व्यक्ति को 'स्व' बोध की ओर ले जाता है।

फलस्वरूप मस्तिष्क ज्यादा क्रियाशील रहता है।


#समत्व_भाव_का_बढ़ना ।



✍तिलक लगाते ही मस्तक में एक प्रकार की तरावट, ठण्डक, शान्ति व शीतलता की अनुभूति होती है। चन्दन, केसर, कस्तूरी, अष्टगन्ध वगैरह की सुगन्ध के कारण प्रसन्नता रहती है। यह स्व संवेदन का विषय है। 


✍जिस प्रकार परिवार का मुखिया प्रसन्न, शान्त, समता वाला हो तो परिवार में शान्ति रहती है, वैसे ही मस्तक शरीर का मुखिया है, वह शान्त प्रसन्न हो तो जीवन में शान्ति, प्रसन्नता व समत्व (एकरसता) का भाव बढ़ता है।


#तिलक_लगाने_से_उदासी_दूर_होती।



✍मस्तिष्क के रसायन 'सेराटोनिन' तथा 'बीटाएण्डोरफिन' की कमी उदासीनता लाते हैं, मनोभावों को प्रभावित करते हैं। 


तिलक के उपयोग से उपर्युक्त रसायनों का स्राव सन्तुलित हो जाता है।


#सामाजिक_समता_को_बढाता_है।



✍सामाजिक कार्यक्रमों में तिलक लगाने की परम्परा सामाजिक समता की सूचक है। गरीब-अमीर का भेद-भाव नहीं रहता। ऊँच-नीच की दीवार नहीं रहती।


#तिलक_सम्मान_व_शुभ_का_सूचक_है 



✍इसके अतिरिक्त तिलक लगाना सम्मान का सूचक है। अपने यहां आये अतिथियों का जाने वाले दिन अतिथियों को तिलक लगाकर सम्मान प्रकट किया जाता है। 


✍भारतीय परम्परा में कोई भी सम्मान तिलक के बिना अधूरा माना जाता है ।

 यात्रा पर प्रस्थान करना हो, युद्ध में जाना हो, विदा करना हो तो सभी प्रकार की शुभकामनाएं तिलक के माध्यम से प्रकट की जाती हैं।


✍ तिलक लगाने से मन में शान्ति, प्रसन्नता, उल्लास तथा सफलता का शुभ भाव प्रकट होता है।


#तिलक_धारण_करने_का_वैज्ञानिक_रहस्य 



✍हमारे ज्ञान-तन्तुओं का विचारक केन्द्र भृकुटि और ललाट का मध्य भाग है। जब हम मस्तिष्क से अधिक काम लेते हैं तो इसी केन्द्र में वेदना अनुभव होने लगती है। अतः हमारे महर्षियों ने तिलक धारण का विधान किया। 


✍चन्दन की महिमा सभी वैद्य-हकीम डॉक्टर जानते हैं। मस्तिष्क के केन्द्र बिन्दु पर चन्दन का तिलक ज्ञान तन्तुओं को संयमित व सक्रिय रखता है। ऐसे जातक को कभी सिर-दर्द नहीं रहता तथा उसकी मेधाशक्ति तेज रहती है।


#कंकुम_का_तिलक_क्यों_लगाया_जाता_है



✍कंकुम हल्दी का ही चूर्ण होता है जो नींबू के रस में मिलाने से लाल हो जाता है। हल्दी संयोजक और त्वचा शोधन के लिये सर्वोत्तम पदार्थ है।


✍आयुर्वेद में इसके अनेक गुण लिखे हैं। अत: कंकुम के तिलक से त्वचा शुद्धि और मस्तिष्क स्नायुओं का संयोजन नैसर्गिक हो जाता है।


#मृत्तिका_का_तिलक_क्यों_लगाया_जाता_है ?



✍शुद्ध मृत्तिका सर्वविधि संक्रामक कीटाणुओं के विनाश की अद्भुत शक्ति रखती है, ऐसा सभी भौतिक विज्ञान वादी मानते हैं।


✍यह भारत माता निर्विशेष एक मृणमय पिण्ड ही तो है। यदि हम नित्य अपनी मातृभूमि के पवित्र रज को अपने भाल पर धारण करें तो यह गौरव की बात है। 


✍फिर गोपीचन्दन वगैरह की मृत्तिका धारण करना तो और भी गौरवशाली बात है।


#भस्मी_राख_का_तिलक_क्यों_लगाया_जाता ?



✍मृत्तिका के बाद दूसरा स्थान यज्ञ भस्म का है। साधारण राख सिर पर नहीं लगाई जाती। पर यज्ञ देवता की भस्मी प्रसाद रूप में सिर पर धारण करना सौभाग्य-वृद्धि करने के समान पुण्यकार्य माना गया है।


#तिलक_कितने_प्रकार_के_होते_हैं?



✍तिलक अनेक प्रकार के होते हैं। इस पर विस्तार से चर्चा 'तिलक रहस्य' नामक पुस्तक में की गई है।

 यथा- ब्रह्मा को बड़पत्र जो कहिये, विष्णु के दो फाड़।

शक्ति की दो बिन्दु कहिये, महादेव की आड़॥


भावार्थ- ब्रह्मार्पण (ब्रह्मण भोजन) हेतु किया गया तिलक तीन अंगुली से पूरे ललाट पर बारम्बार किया जाता है। 

विष्णु के उपासक ऊर्ध्व तिलक दो पतली रेखा में करते हैं। शक्ति के उपासक दो बिन्दी (शिव-शक्ति) लगाते हैं तथा महादेव के भक्त त्रिपुण्ड (तीन रेखाओं की आड़) करते हैं।

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