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9/23/2020

खेज़डली आंदोलन

   
                           
   
खेज़डली आंदोलन



#खेजडली_आन्दोलन

खेजडी वृक्षो को बचाने के लिए चार बार बलिदान

पहला बलिदान सन् 1604 रामासनी गांव जोधपुर 

दूसरा बलिदान जोधपुर जिले के बिलाड़ा तहसील के तिलवासनी गांव मे 

तीसरा बलिदान नागौर जिले के पोलावास गांव में फाल्गुन वद तृतीया विक्रम संवत 1700 सन् 1643

चौथा बलिदान 21 सितंबर 1730 मंगलवार , भाद्रपद सुद दशमी , विक्रम संवत 1787 खेजडली जोधपुर 

खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के खातिर सबसे पहला बलिदान जोधपुर जिले के रामासनी गांव की विश्नोई महिलाएं करमा और गौरा में सन् 1604 में दिया इन दोनों ने गांव के बीच चौराहे पर शनिवार के दिन खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा करते हुए स्वेच्छा से अपने प्राणों का बलिदान दिया था जिसका उल्लेख जाम्भाणी साखी में विलोजी जी महाराज द्वारा विशेष रुप से किया गया है

खेजड़ी के रक्षार्थ दूसरा बलिदान भी जोधपुर जिले के बिलाड़ा तहसील के तिलवासनी गांव में घटित हुआ। गांव के ठाकुर गोपालदास और कृपा दास भाटी दो भाई थे जिन्होंने खेजड़ी के पेड़ों को काटना शुरु कर दिया बिश्नोई समाज के लोगों ने इनका विरोध किया और विरोध स्वरुप बिश्नोई स्त्री खिंवणी देवी, नेतु नैण और  मोटाराम खोखर ने वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे और उन लोगों को वृक्षों की कटाई रोकनी पड़ी थी।

खेजड़ी के वृक्षों की रक्षार्थ तीसरा बलिदान नागौर जिले के पोलावास गांव में फाल्गुन वद तृतीया विक्रम संवत 1700 सन 1643 में वृक्ष रक्षार्थ व गुरु जंभेश्वर के पर्यावरण धर्म  नियमों का पालन करते हुए एक अद्वितीय घटना घटित हुई। पोलावास गांव के पास राजोद गांव मैं मेड़तिया ठाकुर रहते थे ठाकुरों ने होली जलाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए खेजड़ी के हरे भरे पेड़ों को काटना शुरु कर दिया था तो पोलावास गांव के विश्नोईयों ने एकत्रित होकर सामंतवादी प्रवर्ति का विरोध किया। वहां पर बूचोजी ऐचरा ने वृक्षों से चिपक कर अपना बलिदान दिया था।

21 सितंबर 1730 मंगलवार , भाद्रपद शुक्ल दशमी , विक्रम संवत 1787

वृक्षों के रक्षार्थ जोधपुर के खेजड़ली गांव में सन् 1730 में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई जाति के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है। अमृता देवी विश्नोई  के नेतृत्व में 363 लोगों द्वारा वृक्षों के रक्षार्थ किया गया जीवन बलिदान अपनी पृथ्वी, वृक्ष और पर्यावरण के प्रति अनुकरणीय राह दिखाता है। 

खेजड़ली के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है।  सन् 1730 में जोधपुर के राजा अभयसिंह ने महल बनवाने का निश्चय किया. नया महल बनाने के कार्य में सबसे पहले चूने का भट्टा जलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता बतायी गयी. राजा ने मंत्री गिरधारी दास भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी  की नजर महल से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव खेजडली पर पड़ी. मंत्री गिरधारी दास भण्डारी व दरबारियों ने मिलकर राजा को सलाह दी कि पड़ोस के गांव खेजड़ली में खेजड़ी के बहुत पेड़ है, वहां से लकड़ी मंगवाने पर चूना पकाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. इस पर राजा ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. खेजड़ली गांव में अधिकांश बिश्नोई लोग रहते थे !

बिश्नोईयों में पर्यावरण के प्रति प्रेम और वन्य जीव सरंक्षण जीवन का प्रमुख उद्देश्य रहा है. खेजड़ली गांव में प्रकृति के प्रति समर्पित इसी बिश्नोई समाज की 42 वर्षीय महिला अमृता देवी के परिवार में उनकी तीन पुत्रियां आसु, रतनी, भागु बाई  और पति रामू खोड़ थे, जो कृषि और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते थे. खेजड़ली में राजा के कर्मचारी सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास में लगे खेजड़ी के पेड़ को काटने आये तो अमृता देवी ने उन्हें रोका और कहा कि “यह खेजड़ी का पेड़ हमारे घर का सदस्य है यह मेरा भाई है इसे मैंने राखी बांधी है, इसे मैं नहीं काटने दूंगी.” इस पर राजा के कर्मचारियों ने प्रति प्रश्न किया कि “इस पेड़ से तुम्हारा धर्म का रिश्ता है, तो इसकी रक्षा के लिये तुम लोगों की क्या तैयारी है.” इस पर अमृता देवी और गांव के लोगों ने अपना संकल्प घोषित किया “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” अर्थात् हमारा सिर देने के बदले यह पेड़ जिंदा रहता है तो हम इसके लिये तैयार है !

उस दिन तो पेड़ कटाई का काम स्थगित कर राजा के कर्मचारी चले गये, लेकिन इस घटना की खबर खेजड़ली और आसपास के गांवों में शीघ्रता से फैल गयी !

कुछ दिन बाद मंगलवार 21 सितंबर 1730 भाद्रपद सुद दशमी विक्रम संवत 1787 को मंत्री गिरधारी दास भण्डारी लाव लश्कर के साथ पूरी तैयारी से सूर्योदय होने से पहले आये, जब पूरा गाँव सो रहा था. गिरधारी दास भण्डारी के साथ आए लोगों ने सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास लगे खेजड़ी के हरे पेड़ो की कटाई करना शुरु किया तो, आवाजें सुनकर अमृता देवी अपनी तीनों पुत्रियों के साथ घरसे बाहर निकली उसने ये कृत्य विश्नोई धर्म में वर्जित (प्रतिबंधित) होने के कारण उनका विरोध किया  उद्घोष किया “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” और अमृता देवी गुरू जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले पेड़ से लिपट गयी, क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर सिर धड़ से अलग कर दिया. फिर तीनों पुत्रियों पेड़ से लिपटी तो उनकी भी गर्दनें काटकर सिर धड़ से अलग कर दिये !

इस बात का पता चलते ही  खेजड़ली गांव के लोगों ने अपनी जान की कीमत पर भी वृक्षों की रक्षा करने का निश्चय किया। चौरासी गांवों को इस फैसले की सूचना दे दी गई। सैकड़ों की तादाद में लोग खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए और पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। 

उन्होनें एक मत से तय कर लिया कि एक पेड़ के एक विश्नोई लिपटकर अपने प्राणों की आहुति देगा. सबसे पहले बुजुर्गों ने प्राणों की आहुति दी. तब मंत्री गिरधारी दास भण्डारी ने बिश्नोईयों को ताना मारा कि ये अवांच्छित बूढ़े लोगों की बलि दे रहे हो. उसके बाद तो ऐसा जलजला उठा कि बड़े, बूढ़े, जवान, बच्चे स्त्री-पुरुष सबमें प्राणों की बलि देने की होड़ मच गयी. बिश्नोई जन पेड़ो से लिपटते गये और प्राणों की आहुति देते गये. एक व्यक्ति के कटने पर तुरंत दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। 

इसमें कुल 363 बिश्नोईयों (71 महिलायें और 292 पुरूष) ने पेड़ की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी. खेजड़ली की धरती बिश्नोईयों के बलिदानी रक्त से लाल हो गयी. जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली तब जाकर उन्होंने पेड़ों की कटाई रुकवाई और भविष्य में वहां पेड़ न काटने के आदेश दिए। उन्होंने बिश्नोईयों को ताम्रपत्र से सम्मानित करते हुए जोधपुर राज्य में पेड़ कटाई को प्रतिबंधित घोषित किया और इसके लिये दण्ड का प्रावधान किया।

इस बलिदान में अमृतादेवी और उनकी दो पुत्रियां हरावल में रहीं। पुरुषों में सर्वप्रथम अणदोजी ने बलिदान दिया था और बाद में विरतो बणियाल, चावोजी, ऊदोजी, कान्होजी, किसनोजी, दयाराम आदि पुरुषों और दामी, चामी आदि स्त्रियों ने अपने प्राण दिए। 

मंगलवार 21 सितंबर 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) का वह ऐतिहासिक दिन इतिहास में सदैव के लिए प्रेरणा बनकर अमर हो गया। खेजड़ली के इन वीरों की स्मृति में यहां हर वर्ष भादवा सुदी दशमी को मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।

शत शत नमन बलिदानीयो को वंदे मातरम 

जय माताजी

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