फल द्वितीया ( अशून्यशयन व्रत ) का महात्म्य और व्रत विधान
राजा शतानीक ने कहा- मुने कृपा कर आप फल द्वितीया का विधान कहें जिसके करने से स्त्री विधवा नहीं होती और पति-पत्नी का परस्पर वियोग भी नहीं होता।
सुमन्तु मुनि ने कहा- राजन में फल द्वितीया का विधान कहता हूं इसी का नाम अशुन्यशयना द्वितीया भी है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता। क्षीर सागर में लक्ष्मी के समान भगवान विष्णु के शयन करने के समय यह व्रत होता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दिन लक्ष्मी के साथ श्रीवत्स धारी भगवान श्री विष्णु का पूजन कर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए।
श्रीवत्स धारिचरिञ्छ््कान्त श्रीवत्स श्रीपते व्यय।
गार्हस्थ्यं मा प्रनाशं में यातु धर्मार्थकामदं।।
गावश्च मा प्रणस्यन्तु मा प्रणस्यन्तु में जनाः।।
जामयो मा प्रणस्यन्तु मत्तो दाम्पत्यभेदतः।
लक्ष्म्या वियुज्येहं देव न कदाचिद्दाथा भवान।।
तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा में व्युजयतां
लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा।।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा तु मधुसूदन।
इस प्रकार विष्णु की प्रार्थना करके व्रत करना चाहिए जो फल भगवान को प्रिय है उन्हें भगवान की शैया पर समर्पित करना चाहिए और स्वयं भी रात्रि के समय उन्हीं फलों को खा कर दूसरे दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए।
राजा शतानीक ने पूछा- महामुनि भगवान विष्णु को कौन सेफल प्रिय हैं आप उन्हें बताएं दूसरे दिन ब्राह्मण को क्या दान देना चाहिए? उसे भी कहें।
सुमन्तु मुनि बोले- राजन उस ऋतु में जो भी फल हो और पक्के हो उन्हीं को भगवान विष्णु के लिए समर्पित करना चाहिए। कड़वे कच्चे तथा खट्टे फल उनकी सेवा में नहीं चढ़ाने चाहिए। भगवान विष्णु को खजूर नारीकेल मातुलङ्ग अर्थात बिजोरा आदि मधुर फलों को समर्पित करना चाहिए। भगवान मधुर फलों से प्रसन्न होते हैं दूसरे दिन ब्राह्मणों को भी इसी प्रकार के मधुर फल वस्त्र अन्न तथा स्वर्ण का दान देना चाहिए। इस प्रकार जो पुरुष 4 पक्ष तक व्रत करता है उसका 3 जन्मों तक गृहस्थी जीवन नष्ट नहीं होता और ना तो ऐश्वर्या की कमी होती है। जो स्त्री इस व्रत को करती है वह 3 जन्मों तक ना विधवा होती है ना दुर्भागा और ना पति से पृथक ही रहती है। इस व्रत के दिन अश्विनी कुमारों की भी पूजा करनी चाहिए। राजन इस प्रकार मैंने द्वितीया कल्प का वर्णन किया है।

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