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6/05/2022

श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--15 )

   
                           
   

श्मशान की सिद्ध भैरवी भाग--15 )


परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन


पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन


      हमारे देश में शुरू से ही मुख्य रूप से दो संस्कृतयों का प्रभाव रहा है। पहली है--तान्त्रिक संस्कृति और दूसरी है--वैदिक संस्कृति। तान्त्रिक संस्कृति यक्षों की देन है। अतः वैदिक संस्कृति के उद्गम और विकास से पहले हमारे देश में तान्त्रिक संस्कृति का ही व्यापक प्रभाव था। इसलिए भारतीय संस्कृति के इतिहास में यक्ष-प्रभाव को काफी अधिक महत्व दिया गया है और सच तो यह है कि भारतीय इतिहास का यह भूला हुआ विषय है जिसके बिना भारतीय इतिहास समझा ही नहीं जा सकता।

       यक्षवाद से आविर्भूत तान्त्रिक संस्कृति का युग वास्तव में शक्ति-युग था। यक्षों की वह आद्याशक्ति दो रूपों में विभक्त थी। एक था--पूज्यारूप और दूसरा था--भोग्यारूप। स्त्री को गुह्य दीक्षा देकर उसमें दोनों रूपों की परिकल्पना की जाती थी। भारतीय संस्कृति के पाश्चात्य प्रखर विद्वान 'जॉन उडरफ' ने यक्षों की आद्याशक्ति से देश-देशान्तर की शक्ति-पूजा की विस्तृत तुलना की है। उनकी दृष्टि में गोधूलि देवता, एलियासिस, काली, सैविला, इडा, त्रिपुर सुन्दरी, आयोनिका माता, शू की पत्नी तेफ, अफ्रोडाइट, अस्तरत, बेबोलोनिया की मिलिटा, बौद्धों की तारा, मैक्सिको की इश और पार्वती के समान विचरण करने वाली अफ्रीका की सलम्बरे, रोमन, जूना, जीवन-विचार आदि की दीप्तस्वामिनी, मिस्री वस्त्रर, असीरिया की माता सुस्कोथ कुण्डलिनी गुह्य महाभैरवी आदि सब यक्षों की आद्या शक्ति के ही रूप हैं।

      इस प्रकार यदि ध्यान से देखा जाय तो शक्ति-पूजा अथवा स्त्री के रूप में शक्ति- पूजा की परम्परा अधिकांशतया उन्हीं जातियों में मिलती है जो आर्येतर थीं और जिनकी सभ्यता बहुत ही अधिक प्राचीन हो चुकी थी।

      दो हज़ार वर्ष पूर्व विक्रम काल में देश और समाज पर कापालिक संप्रदाय के अनुयायियों का भयंकर प्रभाव था। आदि शंकराचार्य के अवतरण के समय भी कम प्रभाव नहीं था उनका। इसके बाद हिमालय का आतंरिक क्षेत्र और तिब्बत का हिमाच्छादित पर्वतीय इलाक़ा कापालिकों की शव-साधना का प्रमुख केंद्र बना। तान्त्रिक साधना के लिए वह स्थान भी अपना अलग महत्व रखता है, जहाँ शिव और शक्ति का समन्वय हो। इस दृष्टि से काशी सबसे उपयुक्त प्रतीत हुआ साधकों के लिए। काशी में जहाँ एक ओर शिव की उपासना होती है, वहीँ दूसरी ओर शक्ति के विभिन्न रूपों की भी साधना होती है। मुग़ल काल के पहले तक शिवोपासना की तरह गुह्य तंत्रों पर आधारित शक्ति की तमाम गोपनीय और रहस्यमयी साधनाएं प्रकट रूप में हुआ करती थीं काशी में।

      काशी के शिवाला घाट से लेकर दशाश्वमेध घाट के अंतर्गत जितने गंगा के तटवर्ती मोहल्ले हैं, वे सब कभी कापालिकों के और शाक्तों के गोपनीय साधना- स्थल थे। उस समय लगभग हर घर में काली की मूर्तियाँ थीं और प्रायः सभी के यहाँ तान्त्रिक साधनाएं हुआ करती थीं। आज भी बहुत से घरों में काली की प्राचीन मूर्तियाँ मिल जाएँगी।

      मुग़ल काल का कुप्रभाव काशी पर भी कम नहीं पड़ा। काशी विश्वनाथ के मंदिर की तरह तान्त्रिक साधना स्थलों को भी कहीं विध्वंसित न कर दिया जाय। काशी के अन्य मन्दिरों और देव-स्थानों की तरह उन्हें भी नष्ट न कर दिया जाय, इसीलिए ज़मीन के भीतर तलघरों और तहखानों में साधना-स्थल बनाये गए। मगर उनके बारे में मात्र वही लोग जानते थे जो साधक की श्रेणी में आते थे।

     साधकों के आलावा और कोई नहीं जानता था कहाँ और किस मोहल्ले में ऐसे भूमिगत साधना-गृह हैं। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि कोई व्यक्ति किसी प्रकार साधन-गृह में चला भी गया तो यदि वह दुबारा वहां जाना चाहे तो नहीं जा सकता। वह भूल जायेगा कि  कहाँ से कैसे गया था वह उस रहस्यमय साधना-गृह में।


क्रमशः--


नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता





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