ध्यान क्या है ? ( भाग--02 )
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पुज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन
-----:शरीर में तीन महत्वपूर्ण केंद्र:----- *********************************
योग-साधना स्थूल शरीर से शुरू होकर आत्मा तक की अंतरंग साधना-यात्रा है और वह भी एक जन्म में नहीं पूरे चौदह जन्म लग जाते हैं पूर्ण होने में उसे। मनुष्य शरीर में तीन महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उन्हीं से आत्मा का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है और उसी से जीवन हर पल संचालित रहता है। यदि उन केंद्रों का ज्ञान साधक को नहीं है तो वह क्या खाक साधक है ? किस बात का साधक है वह ? उसकी साधना कभी भी सफल नहीं हो सकती--यह निश्चित है और यह भी निश्चित है कि साधक कभी भी आत्म-तत्व को उपलब्ध नहीं हो सकता।
स्थूल शरीर में उन महत्वपूर्ण केंद्रों में पहला केंद्र है--'मस्तिष्क'। वैसे यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो मस्तिष्क का सम्बन्ध 'मन' से है। मन का कार्यक्षेत्र मस्तिष्क है। मस्तिष्क के लिए मन महत्वपूर्ण है। मन के माध्यम से मस्तिष्क का सम्बन्ध आत्मा से है। मस्तिष्क और आत्मा के बीच मन है।
ह्रदय दूसरा केंद्र है। प्राणों के माध्यम से ह्रदय का सम्बन्ध आत्मा से है। ह्रदय और आत्मा के बीच 'प्राण' हैं।
तीसरा केंद्र है--नाभि। नाभि से आत्मा का सम्बन्ध सीधा है। उन दोनों के बीच किसी की मध्यस्थता नहीं है। मानव शरीर को जीवन-प्रवाह जहाँ से मिलता है, वह है--नाभि और यही कारण है कि नाभि केंद्र सबसे पहले विकसित होता है शिशु का।मानव शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु नाभि है। गर्भावस्था में इसी बिन्दु से शिशु का सम्बन्ध माता के प्राणों से, चेतना से और जीवन से जुड़ा हुआ रहता है।
------:ज्ञान, कृपा, करुणा, प्रेम, स्नेह आदि का जन्म:------
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मस्तिष्क और मन के संयोग से ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और विचार का जन्म होता है। ह्रदय और प्राणों के संयोग से प्रेम, स्नेह, दया, कृपा, करुणा, अनुकम्पा आदि का जन्म होता है ह्रदय में और यही एकमात्र कारण है कि मनुष्य मस्तिष्क और ह्रदय पर सर्वाधिक बल देता रहता है।
जितनी भी शिक्षाएं हैं, वे सब मस्तिष्क की शिक्षाएं है। सारा ज्ञान मस्तिष्क का ज्ञान है। नाभि पर किसी का ध्यान नहीं जाता और जाता भी है तो बहुत कम। अन्य केंद्रों से सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र नाभि को मानते हैं योगी और साधकगण। सभी प्रकार के लोगों का जीवन मस्तिष्क में हीे उलझा हुआ रहता है। मस्तिष्क की ही परिक्रमा करता रहता है वह।
नाभि सम्पूर्ण शरीर का केंद्र-बिन्दु है। योगी और साधकों की साधना धारा सर्वप्रथम मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर ह्रदय केंद्र पर आती है और वहां से आती है नाभि- केंद्र पर। नाभि-केंद्र एक ओर तो आत्मा से जुड़ा हुआ है और दूसरी ओर जुड़ा हुआ है ह्रदय से भी। मनुष्य को प्राण-ऊर्जा प्राप्त होती है नाभि से। इसलिए कि नाभि का आतंरिक सम्बन्ध ह्रदय से है। गर्भस्थ शिशु की नाभि से निकल कर एक नाड़ी जिसे योग की भाषा में 'पीयूष नाड़ी' कहते हैं, माता के ह्रदय से जुडी हुई रहती है। इसी रहस्यमयी नाड़ी के द्वारा शिशु प्राण-शक्ति और उस प्राण-शक्ति के माध्यम से जीवनी-शक्ति बराबर प्राप्त करता रहता है।
मानव सभ्यता जैसे-जैसे विकसित होती गयी, वैसे-ही- वैसे मनुष्य मस्तिष्क को अधिक-से-अधिक महत्त्व देता चला गया। मस्तिष्क उसके लिए मुख्य हो गया। शरीर का मूल्य कम तथा मस्तिष्क का मूल्य सर्वाधिक हो गया उसकी दृष्टि में लेकिन मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मस्तिष्क को मुख्य मानना और उसे महत्त्व देना सर्वाधिक घातक सिद्ध हो रहा है वर्तमान समय में उसके लिए--इसमें सन्देह नहीं।
आगे और इंतज़ार करें--

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