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6/09/2022

ध्यान क्या है ? ( भाग--05 )

   
                           
   

ध्यान क्या है ? ( भाग--05 )


परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन


पुज्यपाद गुरूदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन


    ---:नाभि का विकास आवश्यक:---     **********************************

      नाभि सबसे महत्वपूर्ण है और इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिशु नाभि से जन्म लेता है और इसलिए कि जीवन का जो परम सत्य है, उसमें प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग नाभि ही है। जीवन के वास्तविक सत्य से परिचित होने के लिए एकमात्र साधन नाभि को ही बतलाया गया है।

       मनुष्य दिनभर फेफड़े से श्वास लेता है लेकिन रात्रि में सोने के बाद वह श्वास लेता है नाभि से। जरा यह समझने की बात है। दिन में फेफड़े से श्वास लेने के कारण मनुष्य की छाती सिकुड़ती-फैलती है, जबकि निद्रावस्था में नाभि से श्वास लेने के कारण पेट फूलता-पिचकता है। कहने के लिए तो हम हमेशा यही कहते-समझते हैं कि मनुष्य फेफड़े से ही सदैव श्वास लेता है पर कुछ बातें मनुष्य के अधिकार में नहीं होतीं। मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर साधारण मनुष्य का अधिकार नहीं होता। फेफड़े दिन-रात कार्य करते हैं, मस्तिष्क दिन-रात कार्य करता है, उसका हृदय दिन-रात कार्य करता है, उसका पाचन-तंत्र और आंतें दिन-रात कार्य करती हैं और इसी तरह उसकी नाभि भी दिन-रात कार्य करती रहती है। मनुष्य के मस्तिष्क का अधिकार उसके हाथ, पैर, नेत्र, जीभ, मुख, कान आदि इन्द्रियों पर तो है, पर कुछ वस्तुएं उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। वह जब चाहे नेत्र बंद कर सकता है, जब चाहे , नेत्र खोल सकता है। वह जब चाहे हाथ-पैर आगे बढ़ा सकता और जब चाहे पीछे को उल्टा चल सकता है। लेकिन मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर मनुष्य का अधिकार नहीं है। उन पर अधिकार है प्रकृति का। तो जब मनुष्य रात्रि को निद्रा में बेहोश होता है, उस समय उसका श्वास प्रकृति की संचालन शक्ति(आत्मचेतना) चलाती है जिसका माध्यम होती है--नाभि।

       बच्चा अपने जन्म से लेकर पांच वर्ष की आयु पर्यन्त नाभि से ही श्वास लेता है। पांच वर्ष के बाद उसके श्वास की गति धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठने लग जाती है और उसी के अनुसार उसकी नाभि का कम्पन कम होने लगता है और फेफड़े का कम्पन बढ़ने लगता है। प्रकृति के कार्य में त्रुटि नहीं होती है। जब तक शिशु प्रकृति के अधीन है और वह नाभि से श्वास लेता है तब तक उसके श्वास के लेने की प्रक्रिया सही रहती है। लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य जब बड़ा होने लगता है तो नाभि का प्रयोग घटता जाता है और फेफड़े का प्रयोग बढ़ता जाता है और इसीलिए यदि देखा जाय तो मनुष्य आलसवश ठीक से श्वास फेफड़ों में नहीं भरता है। उसकी स्वाभाविक श्वास छोटी होती है। श्वास के द्वारा हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) अपने भीतर खींचते हैं जिससे हमारा जीवन चलता है। शरीर, उसकी असंख्य धमनियाँ, अरबों-खरबों कोशिकाएं ऑक्सीजन के द्वारा शुद्ध होकर अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहती हैं। लेकिन मनुष्य है कि वह ठीक से श्वास भी नहीं लेता। आधा-अधूरा श्वास भरता है वह फेफड़ों में जिसका परिणाम यह होता है कि पहले तो प्राणवायु पूरे फेफड़ों में नीचे तक नहीं पहुँच पाता और फेफड़े अस्वस्थ होकर रुग्ण रहने लगते हैं। फेफड़े रुग्ण होने पर वे ह्रदय द्वारा अशुद्ध रक्त को ठीक से साफ नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि मनुष्य के शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होते जानेे से वह सदैव रुग्ण रहने लगता है। शरीर में शुद्ध रक्त-संचालन होता रहे, सारे अंगों में, धमनियों में, कोशिकाओं में शुद्ध रक्त पहुँचता रहे--इसके लिए आवश्यक है सहज श्वास, दीर्घ श्वास। हमारे योगियों ने, ऋषियों ने इसीलिए प्राणायाम का महत्व बतलाया है।


    ------------:नाभि का कम्पन:------------

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      नाभि का कम्पन उस समय बढ़ जाता है जिस समय मनुष्य भयभीत होता है, अचानक डर जाता है, अचानक कोई संकट सामने आ जाता है, अचानक मृत्यु की आशंका उपस्थित हो जाती है, किसी दुर्घटना का आभास लग जाता है। उस समय सबसे पहले नाभि के स्थान पर 'धक्' की ध्वनि के साथ कम्पन बढ़ जाता है। मनुष्य के डर का, भय का, वासना का स्थान नाभि ही है। अतः नाभि के कम्पन बढ़ जाने से ह्रदय का भी संचालन तेज होने लगता है। दिल 'धक्-धक्' कर तेज-तेज धड़कने लगता है और उसी के साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी प्रभावित हो जाता है। कभी-कभी तो मस्तिष्क का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। यदि वह इस समय किसी वाहन को चला रहा है तो दुर्घटना की आशंका बढ़ जायेगी। इसके कारण के पीछे है--नाभि का अधिक कम्पन।

       जैसे मस्तिष्क और ह्रदय को स्वच्छ, निर्मल और विकसित करने के लिए ध्यान आवश्यक है, इसी प्रकार नाभि को विकसित करने के लिए और उसके द्वारा अधिक-से-अधिक आत्म-चेतना ग्रहण करने के लिए भी साधन है और वह साधन है सभी प्रकार के भय से मुक्ति अर्थात् 'अभय की साधना'। मनुष्य जितनी अभय की साधना करेगा, उतना ही वह भय से मुक्त होता जायेगा, और उतनी ही उसकी नाभि विकसित होती जायेगी। जितनी उसकी नाभि विकसित होगी, उतना ही वह गहराई में प्रवेश करता जायेगा और उतना ही वह आत्म-चेतना को भी होगा उपलब्ध।


 इन तीनों केंद्रों की साधना कैसे सम्भव है ?


एकमात्र ध्यान से।


आगे है--'ध्यान के तीन चरण'





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