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6/06/2022

ध्यान क्या है ? ( भाग--03 )

   
                           
   

ध्यान क्या है ? ( भाग--03 )


परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन


पुज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन 


     ------------:मस्तिष्क के अत्यधिक विकास का परिणाम:-------------

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      वर्तमान समय में एक पूर्ण योग्य और पूर्ण विवेकशील व्यक्ति का दर्शन दुर्लभ हो गया है और यही एकमात्र कारण है कि आज का प्रत्येक व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है, उद्भ्रान्त है और है-- तनावग्रस्त। वह क्या करना चाहता है और कर क्या रहा है--इसका होश उसे नहीं और यही एकमात्र कारण है कि इस समय जितने भी रोग और जितनी भी व्याधियां हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत मन से सम्बंधित हैं, शरीर से नहीं। यदि भविष्य में भी ऐसी ही स्थिति रही तो एक दिन ऐसा आएगा जब सौ प्रतिशत लोग मानसिक रूप से रुग्ण हो जायेंगे।

       महाभारत काल में तीनों केंद्रों का उपयोग होता था समय-समय पर। उसके बाद मानव जीवन, मानव सभ्यता और मानव संस्कृति में भारी परिवर्तन हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य का ध्यान नाभि केंद्र से हट गया और केंद्रित हो गया मस्तिष्क केंद्र और ह्रदय केंद्र पर। इसके फलस्वरूप आध्यात्मिक उन्नति हुई और अध्यात्म से सम्बंधित योग, तंत्र आदि का विकास हुआ और उन पर आधारित हज़ारों ग्रन्थों की भी रचनाएँ हुईं। कालान्तर में सर्वाधिक भक्ति और प्रेम रस का भी विकास हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि रस, प्रेम, श्रृंगार, सौंदर्य, त्याग आदि का आश्रय लेकर विभिन्न प्रकार के काव्यों की रचना कवियों ने की लेकिन नाभि केंद्र का उपयोग बहुत कम होता गया। इसका भी परिणाम सामने आना ही था और वह आया पतंजलि, बुद्ध, महावीर आदि जैसे कुछ ही योगी प्रत्यक्ष रूप में संसार को अपने-अपने ज्ञान से प्रकाशित कर सके, इससे अधिक नहीं।


------:मस्तिष्क के विकास का परिणाम:------

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     पिछले 500 वर्षों में मनुष्य ने सर्वाधिक उपयोग मस्तिष्क का किया है और अभी भी कर रहा है जिसके परिणामस्वरुप प्रबल रूप से ज्ञान-विज्ञान का विकास हुआ और उसके प्रत्येक क्षेत्र की उन्नति हुई। लेकिन मनुष्य को यह ज्ञात होना चाहिए कि मस्तिष्क अत्यन्त नाजुक अंग है और ऐसे नाजुक अंग पर पिछले 500 वर्षों से इतना भार बराबर दिया जा रहा है कि अब तक मस्तिष्क के तन्तु टूटकर बिखरे क्यों नहीं ?--यह आश्चर्य की बात है। सोचने की बात है कि मानव मस्तिष्क पर कितना भार पड़ता है--दुःख का भार, कष्ट का भार, चिन्ता का भार, शोक का भार, रोग का भार, शिक्षा का भार, ज्ञान का भार यहाँ तक कि सम्पूर्ण जीवन का भार।

      मस्तिष्क में अरबों-खरबों कोशिकाएं हैं और लगभग सात करोड़ सूक्ष्म तन्तु हैं। इसीसे समझ लेना चाहिए कि मस्तिष्क कितना नाजुक है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि उन सात करोड़ तन्तुओं से पृथ्वी को नापा जाय तो पूरी पृथ्वी का व्यास उसके अन्दर आ जायेगा। इतने सूक्ष्म हैं वे तन्तु।

      मस्तिष्क पर सर्वाधिक भार विचारों का पड़ता है ।विचारों का भार जब अपनी सीमा से अधिक हो जाता है तो मनुष्य को पागल बनने में देर नहीं लगती। अत्यधिक विचार करने पर जीवन की जो धारा है वह मस्तिष्क के चारों ओर घूमने लगती है। एक साधक उसी जीवन-धारा को अपनी विशेष साधना-बल से नीचे उतारने का प्रयास करता है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब वह शरीर- विज्ञान से सम्बंधित आवश्यक ज्ञान प्राप्त किये हुए होता है।


       ---:शरीर के प्रति दो दृष्टियां हैं:---

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      वे दो दृष्टियां हैं--भोग दृष्टि और त्याग दृष्टि। जो इन दोनों से ऊपर उठ जाता है अर्थात्--न भोग और न त्याग, वही साधक सफल होता है। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, जो भी महत्वपूर्ण है और जो भी उपलब्ध करने योग्य है, उसका मार्ग शरीर के भीतर है और जो उस मार्ग से भली-- भांति परिचित है, वही जीवन- धारा को नाभि-केंद्र तक ले जा सकने में समर्थ है।


  आगे और इंतज़ार करें--





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