श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--10 )
परम श्रध्देय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन
पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन
निश्चय ही वह मेरे जीवन का संक्रान्ति-काल था। पूरे चार साल तक मैं स्वर्णा के सान्निध्य में रहा। इस बीच उस महान् साधिका के संपर्क में मैंने जिन अविश्वसनीय और अलौकिक चमत्कारों को देखा तथा पारलौकिक अथवा सूक्ष्म जगत की जिन मानवेतर शक्ति-सम्पन्न आत्माओं का मुझे अनुभव हुआ था, सच पूछिये उसने मेरे ह्रदय में भूत, प्रेत, पिशाच , तंत्र-मन्त्र एवं उनकी विभिन्न तामसिक साधनाओं व विभिन्न क्रियाओं के प्रति गहरी रूचि, जिज्ञासा और असीम कौतूहल की सृष्टि कर दी थी। इस दिशा में और कुछ जानने-समझने तथा खोज करने के लिए व्याकुल हो उठी थी मेरी आत्मा।
----:मानवेतर शक्ति से संपर्क:---- ********************************
इसके आलावा एक और जिज्ञासा जागी मेरे मन में, वह यह कि मैं उन दुर्धर्ष और असीम मानवेतर शक्ति-संपन्न आत्माओं से स्वयं संपर्क करके आध्यात्मिक तथा भौतिक क्षेत्रों में उनका सहयोग प्राप्त करूँ।
सच बात तो यह थी कि भूत-प्रेत, तंत्र-मन्त्र के प्रति मेरे मन में असीम जिज्ञासा और कौतूहल की सृष्टि हो गयी थी उस समय। घंटों गंगा किनारे गालों पर हाथ रखकर बैठा मैं बस यही सोचा करता था कि काश, किसी तरह मुझे भी मानवेतर शक्ति प्राप्त हो जाये तो....।
आखिर मैंने अपने मन की यह बात स्वर्णा को बतलायी। पहले तो वह काफी समय तक गम्भीर बनी कुछ सोचती रही, फिर एक झटके से उसने सिर घुमा कर मेरी ओर गहरी दृष्टि से देखा। उस समय उसकी दृष्टि में न जाने क्या था कि एकबारगी सहम-सा गया मैं।
इन सबके चक्कर में मत पड़ो तुम, समझे--स्वर्णा का गम्भीर स्वर सुनाई पड़ा मुझे--मानवेतर शक्ति प्राप्त करना सबके बस की बात नहीं है। जानते हो, इसके लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, गंवाना पड़ता है...मनुष्य का जीवन सरल और सहज नहीं रह जाता फिर। इसके बाद वह परिवार और समाज में व्यवस्थित नहीं कर पाता अपने आपको। उसका जीवन हर समय एक ऐसी आग की लपटों में झुलसता रहता है जो कभी बुझने वाली नहीं होती। उसके भीतर हर समय एक ऐसी चिता 'धू-धू' कर जलती रहती है जिसके आगोश में उसकी सारी कामनाएं दफ़न हो जाती हैं।
फिर वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता स्वतंत्र रूप से। वह अपने अस्तित्व को हर समय एक ऐसी स्थिति में अनुभव करता है जिसके एक ओर तो असीम अलौकिक शक्तियां रहती हैं और दूसरी ओर होती हैं उसकी भस्मीभूत हुई अनगिनत कामनाओं और अभिलाषाओं की राखों का ढेर !
मुझको ही ले लो। कभी तुमने मुझे जानने-समझने की कोशिश की ? कभी तुमने मेरे जीवन की गहराई में उतरने का प्रयास किया ? कभी तुमने मेरे अतीत में झांकने का प्रयास किया ? नहीं, कभी नहीं।
सच कह रही थी वह। मैंने कभी ऐसी कोशिश नहीं की थी। कभी ऐसी आवश्यकता ही नहीं समझी मैंने यह सब जानने-समझने की। लेकिन एक बात अवश्य थी--वह यह कि उसकी अनुपस्थिति जब चरम सीमा पर पहुँच जाती तो मेरी आत्मा व्याकुल हो उठती। मन विचलित होने लगता। उसमें कौन-सा आकर्षण था जो मेरे मन-प्राण को झकझोरने लगता ? यह सब भी जानने-समझने की कोशिश कभी नहीं की मैंने।
उस दिन भी ऐसी ही स्थिति थी। पिछले तीन-चार महीनों से स्वर्णा से भेंट नहीं हुई थी। मेरे लिए वह खिन्नता-भरी उदास साँझ थी। सिर झुकाये घाट की सीढ़ियों पर चुपचाप बैठा हुआ स्वर्णा के विषय में ही सोच रहा था मैं उस समय। कब तक उस अवस्था में बैठा रहा मैं, बतला नहीं सकता। मगर जब चलने के लिए उठने को तैयार हुआ तो उस समय रात काफी गहरा गयी थी। जब सीढियां चढ़कर मैं केदारेश्वर मन्दिर की गली में आया तो अचानक मेरी दृष्टि सामने जाती हुई एक सद्यस्नाता युवती पर स्थिर हो गयी। एकबारगी ख़ुशी से झूम उठा मैं। वह युवती और कोई नहीं, स्वर्णा ही थी। मैंने उसे पुकारा और जल्दी-जल्दी लपक कर उसके करीब पहुँचना चाहा, लेकिन मेरा और उसका फासला बराबर उतना ही बना रहा।
चौकी घाट के ऊपर हनुमानजी का एक मन्दिर है। उसके बगल में घूमकर एक सकरी गली गयी है। स्वर्णा उसी गली में मुड़कर आगे बढ़ने लगी। काफी तेज चल रही थी वह। मैंने फिर पुकारा, लेकिन इस बार भी उसने नहीं सुना। आखिर बात क्या है ? समझ में नहीं आ रहा था। उसकी अपेक्षा तेज गति से चलने पर भी मेरे और उसके बीच का फासला बराबर बना रहा।
कई गलियों को पार् करने के बाद आखिर वह #पातालेश्वर मोहल्ले के एक मकान के भीतर चली गयी। मकान काफी पुराना और जीर्ण-शीर्ण था। ऐसा लगता था जैसे काफी लम्बे अरसे से वह वीरान पड़ा हुआ है। दरवाजा भी टूुटा-फूटा था। स्वर्णा के पीछे-पीछे मैं भी घुस गया उसके भीतर, मगर जैसे ही मैं भीतर घुसा, वैसे ही सड़ांध का एक तेज भभका मेंरे नथुनों में समा गया। जी मिचलाने लगा मेरा। किसी तरह संभाला मैंने अपने आपको, आगे बढ़ा तो पहले एक लम्बा गलियारा मिला--अँधेरे में डूबा हुआ। टटोल-टटोल कर उसे पार करने के बाद मैं एक छोटे-से आँगन में पहुंचा। वहां हल्का-सा प्रकाश हो रहा था और उसी हलके प्रकाश में मुझे आँगन के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे दिखलायी दिए। वे सब भी गन्दे और दुर्गन्धमय थे।
क्रमशः--
आगे है--'वह भयानक दृश्य'
नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता

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