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5/14/2022

श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--09 )

   
                           
   

श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--09 )




परम श्रध्देय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन


पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन


        ----:डाकिनी:----

        *************         

       कुछ क्षण रूककर स्वर्णा ने बतलाया--बनारस में ऐसी ही एक डाकिनी काफी दिनों से औरत के रूप में है। यह सुनकर अवाक् रह गया मैं। आश्चर्य से पूछा मैंने-- अच्छा ! क्या मैं उससे मिल सकता हूँ ?

       क्यों नहीं ! घाट के किनारे की गलियों में वह इधर-उधर घूमती रहती है, भीख मांगती रहती है। मगर उसे पहचानना और समझना मुश्किल है। कोई यह नहीं कह सकता कि उस भिखारिन के भीतर किसी डाकिनी की आत्मा है। उसे बच्चा भी पैदा होता है, लेकिन मार कर खा जाती है वह।

       दूसरे ही दिन से मैं उन गलियों के चक्कर काटने लगा। ज्यादा खोजना नहीं नहीं पड़ा। एक टूटे-फूटे जर्जर मकान के चबूतरे पर बैठी मिल गयी मुझे वह। गोरा रंग, मगर मैल की पर्तें भी जमीं थीं शरीर पर कहीं-कहीं। दमकता, मुस्कराता चेहरा, धूल से भरे बाल, बदन पर लाल किनारी की मटमैली फटी साड़ी, ऑंखें बड़ी-बड़ी, पर गहरी थीं उनमें अथाह रहस्य भरा पड़ा था। उसने उसी रहस्यमयी दृष्टि से मेरी ओर देखा, फिर हंस पड़ी। सामने एक कटोरा पड़ा था जिसमें कई दिनों की सूखी रोटियां पड़ी थीं। पास ही टीन के एक डिब्बे में पानी भरा रखा था। अचानक वह बोल पड़ी--खाना खिलायेगा ?

       क्या खायेगी ?--मैंने पूछा।

       तेरा सिर..फिर 'खी-खी' कर हंसने लगी वह।

       बड़ा ही अजीब लगा मुझे उसका व्यवहार। कुछ देर खड़ा-खड़ा उसकी पागलों जैसी हरकतें देखता रहा, फिर लौट आया मैं।

       तीन-चार दिनों के बाद अचानक वह फिर मिल गयी मानसरोवर घाट की सीढ़ियों पर बैठी हुई। कुछ आवारा किस्म के लड़के उसे परेशान कर रहे थे। मुझे देखकर वह मुस्कराई।

       उसी समय गंगा की धारा में बहती हुई एक लाश देखकर एकाएक चीख पड़ी वह, फिर दोनों हाथ ऊपर उठाकर उसे ज़ोर-ज़ोर से बुलाने लगी। उसके इस व्यवहार से लड़के सहम कर भागे। घाट सुनसान हो गया। चमत्कार ही कहा जायेगा उसे। मैंने देखा--लाश धारा से निकलकर अपने आप घाट की ओर बढ़ने लगी। वह उसे बराबर बुलाये जा रही थी। धीरे-धीरे घाट की सीढ़ियों से आ लगी वह लाश। पगली लपक कर आई और लाश का कफ़न नोचने लगी। दूसरे ही क्षण लाश निर्वसन हो गयी पूरी तरह। गौर से देखा--भले घर के किसी युवक् की लगी वह लाश। मरने के बाद भी उसके सौंदर्य और आकर्षण में कमी नहीं आई थी। लगता था जैसे गहरी नींद में सो रहा है वह। शरीर का गोरा रंग काला पड़ गया था। शायद सर्प के काटने से उसकी मृत्यु हुई थी।

       लगभग एक सप्ताह बाद मुझे वह पगली फिर मिली। उसके साथ एक युवक भी था उस समय। काफी स्वस्थ, सुन्दर और आकर्षक था वह। दोनों एक चबूतरे पर बैठे कुछ खा-पी रहे थे। मुझे देखकर वह पगली पहले तो चौंकी, फिर मुस्कराने लगी। उनके नजदीक जब मैं पहुंचा तो चौंक पड़ा मैं एकबारगी। उस युवक का चेहरा उसी लाश से मिलता था जिसे उस पगली ने गंगा की धारा से बाहर निकाला था। मगर वह जीवित कैसे हो गया ? एक अभूतपूर्व और अविश्वसनीय घटना थी वह। काफी देर तक मैं कभी पगली की ओर तो कभी उस युवक की ओर देखता रहा था। बाद में पता चला कि उस युवक का नाम था--राम अवतार पाण्डेय। जिला मिर्जापुर का रहने वाला था वह। एक महीना पहले उसका विवाह हुआ था। सर्प के काटने से ही उसकी मृत्यु हुई थी। प्रचलित प्रथा के अनुसार उसकी लाश को गंगा में प्रवाहित कर दिया गया था।

       उसके बाद फिर वह युवक मुझे कहीं नहीं दिखलायी पड़ा। हाँ, वह रहस्यमयी पगली अवश्य मुझे कई बार मिली रास्ते में। और जब भी वह मिली, उसे देखकर आतंकित हो उठता था मैं।

       जब मैंने ये सारी बातें स्वर्णा को बतलायीं तो वह कहने लगी--उन लोगों के लिए यह सब कोई कठिन काम नहीं है।

      क्या सचमुच पगली ने उस युवक को जीवित कर दिया था ? --मैंने पूछा।

       नहीं, मृत व्यक्ति को जीवित करने की शक्ति किसी में नहीं है। पगली ने अपने किसी खास काम के लिए उस युवक के मृत शरीर में किसी आत्मा को प्रवेश करा दिया है।

       क्या कहा ?--चौंक कर बोला मैं।

       इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है। शव यदि गल-सड़ नहीं गया है, उसकी नस-नाड़ियां अपनी जगह ठीक हैं और सर्प काटने या विषपान से मृत्यु हुई है तो ऐसे व्यक्ति के शव में विशेष क्रिया द्वारा आसपास भटकती किसी भी अनुकूल आत्मा को प्रविष्ट करा देना सम्भव है। इसलिए आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

       इस प्रयोग के पीछे पगली का कौन-सा अभीष्ट है ?

       स्वर्णा ने कहा--तुमको बतला चुकी हूँ कि वह अपने बच्चे को मार कर खा जाती है।

        हाँ, यह तो बतलाया था।

        बस, समझ लो उस युवक द्वारा शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर बच्चे पैदा करना ही उसका एकमात्र अभीष्ट है।

       यह सुनकर अवाक् और स्तब्ध रह गया मैं। फिर न कुछ बोला गया और न कुछ पूछा ही गया मुझ से।


क्रमशः--


नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता

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