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5/13/2022

श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--08 )

   
                           
   

श्मशान की सिद्ध भैरवी ( भाग--08 )




परम श्रध्देय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन


पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन


    धीरे-धीरे रात का पहला प्रहर बीत गया। विषय कुछ ऐसा था कि समय का कुछ पता ही न चला किसी को। बारिश अभी भी हो रही थी। बीच-बीच में बिजली कौंध जाती थी और उसी के साथ बादल भी बुरी तरह से गरज उठते थे। सम्मोहनभरी दृष्टि से स्वर्णा ने फिर एक बार मेरी ओर देखा और भर्राये स्वर में बोली--फिर प्यास लग गयी रे !

      मैं क्या बोलता ! मेरा मन तो चमत्कारों की दुनियां में उलझा हुआ था उस समय। अचानक कमरे का वातावरण कुछ अजीब-सा हो उठा। लालटेन की पीली रौशनी का दायरा  एक बार कसमसाया फिर फ़ैल गया। कमरे के दरवाजे अपने आप खुल गए और उसी के साथ एक काली छाया प्रकट हो गयी वहां। उसे देखकर एकबारगी सहम गया। वह छाया बड़ी वीभत्स और बड़ी भयानक थी। पहले तो मेरी समझ में ही नहीं आया कि कैसी थी वह छाया, लेकिन बाद में जब उसका आकार-प्रकार स्पष्ट हुआ तो मैंने देखा कि वह एक  ऐसी आकृति की छाया थी जो मनुष्य से मिलती-जुलती होते हुए भी मनुष्य की नहीं थी। काफी लम्बी-चौड़ी काठी का था वह विचित्र व्यक्ति। कोहड़े की तरह बेडौल उसका सिर, माथा हद से ज्यादा चौड़ा, कान काफी लंबे, आँखे बड़ी-बड़ी तथा कानों तक खिंची हुई और उनमें पीले रंग की अजीब-सी चमक !  नाक भी हद से ज्यादा लम्बी और नुकीली, नीचे का जबड़ा काफी बड़ा और भद्दे ढंग से झूल रहा था। वह ज़ोर-ज़ोर से उस समय साँस ले रहा था जिसकी आवाज़ कमरे में स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही थी।

      ऐसा रूप कभी देखने को मिलेगा--इसकी कल्पना तक मैंने नहीं की थी। स्तंभित हो गए मेरे मन-प्राण। भय से रोमांचित हो उठा मेरा सारा शरीर। उस गीली रात में उस अमानवीय छाया की उपस्थिति अत्यन्त डरावनी लगी मुझे। प्राण सूखने लगा मेरा। न जाने कब और कैसे मेरी दृष्टि स्वर्णा की ओर घूम गयी। देखा--पहले तो उसकी ऑंखें भावशून्य थीं लेकिन बाद में एकाएक जल उठीं जैसे। उस समय एक अतीन्द्रिय ज्योति थी उसकी आँखों में। दूसरे ही क्षण उसके होंठों पर एक पैशाचिक मुस्कान खेल गयी। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। डरा-सहमा और भयभीत-सा दुबका रहा मैं कमरे के एक कोने में।

      थोड़ी देर बाद सब कुछ सामान्य हो गया पहले जैसा। मैं जैसे सोते से जागा तो देखा कि स्वर्णा के सामने चमचमाती थाली में पूड़ी, सब्जी, खीर और तरह-तरह की मिठाइयां रखी हुई हैं। एक पात्र में पका हुआ मांस भी रखा हुआ था। इतना ही नहीं, बगल में शराब से भरी एक बोतल भी थी। निश्चय ही कीमती शराब थी वह।

      हे भगवान ! कहाँ से आया यह सब ? उस गीली बरसाती रात में खाने-पीने की ये तमाम चीजें कौन और कब रख गया यहाँ ? यह सब मैं सोच ही रहा था कि स्वर्णा खिलखिला कर हंस पड़ी। शायद वह मेरे मन की बात समझ गयी। कहने लगी--क्या करूँ, भूख और प्यास दोनों लगीं थीं। जानती थी कि तुम तो कुछ खिलाओगे-पिलाओगे नहीं, इसीलिए सोचा कि अपने साथी से ही कुछ क्यों न मंगवा लूँ  खाने-पीने के लिए ?

      जब वह बोतल खाली कर चुकी और खाना भी खा चुकी तो मैंने पूछा--वह छाया कैसी थी ? किसकी छाया थी वह ? खाने की थाली और शराब की बोतल कैसे आई ?

      मेरी बात सुनकर पहले तो कुछ पल चुप रही स्वर्णा फिर धीमे स्वर में बोली--वह पिशाच था।

      पिशाच ?--एकबारगी मेरे मुंह से निकल गया।

      हाँ, मुझे पिशाच सिद्ध है। उसी ने ये सब लाकर दिया है। उसके लिए ये चीजें मामूली हैं। मगर किसी से कहना मत ये सब बातें।

      यह सुनकर छाती के भीतर कुछ खाली-खाली-सा प्रतीत हुआ। भूत, प्रेत, पिशाच आदि का नाम तो सुना था। पर उनका इस तरह प्रत्यक्ष अनुभव भी होगा--सोचा तक न था। भय, संशय और आतंक के मिले-जुले भाव से भर गया मेरा मन।

      स्वर्णा ने बतलाया--जहाँ उन तीनों प्रकार की आत्माओं के लोक की सीमा समाप्त होती है, उसके बाद अंतरिक्ष में काफी विस्तृत शून्यक्षेत्र है। वह कितना लम्बा-चौड़ा है--यह बतलाया नहीं जा सकता। जानकार लोगों का कहना है कि उस क्षेत्र में सूर्य की किरणें भी प्रवेश नहीं कर पातीं। फिर भी हल्का-सा प्रकाश सदैव विद्यमान रहता है वहां।

      अंतरिक्ष के उसी विस्तृत शून्यक्षेत्र में अनेक प्रकार की ऐसी दुर्धर्ष आत्माएं निवास करती हैं जो न कभी मनुष्य थीं और न कभी मनुष्य शरीर धारण कर सकती हैं। वे इस भव-चक्र से बिलकुल अलग हैं। प्रकृति पर उनका पूरा अधिकार होता है। वे चाहें तो प्रकृति में विकृति पैदा कर सकती हैं, संसार में भयानक उत्पात उत्पन्न कर सकती हैं, भयानक प्रलयंकारी स्थिति पैदा कर सकती हैं...जो चाहे वह कर सकने में समर्थ हैं वे। सामूहिक रूप से मनुष्यों पर प्रभाव डाल कर वे युद्ध की भी भयानक विभीषिका उत्पन्न कर सकती हैं। उनके अधिकार-क्षेत्र में बहुत कुछ है। उनकी तमोगुणी शक्ति की कोई सीमा नहीं। उन्हीं आत्माओं को हाकिनी-डाकिनी-शाकिनी, पिशाच, बेताल आदि कहते हैं। उनका कोई आकार-प्रकार अथवा रूप-रंग नहीं है। फिर भी वे इच्छानुसार,  आवश्यकतानुसार किसी भी रूप में प्रकट हो सकती हैं। कभी-कदा मनोरंजन या किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे मनुष्य का रूप धारण कर संसार में विचरण भी करती हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें पहचानना कठिन है।

      

क्रमशः--


आगे है--'डाकिनी'


नोध : इस लेख में दी गई सभी बातें सामान्य जानकारी के लिए है हमारी पोस्ट इस लेख की कोई पुष्टि नहीं करता

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