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2/26/2022

Vastu Tips : त्रिमूर्ति योग का निर्माण

   
                           
   

Vastu Tips : त्रिमूर्ति योग का निर्माण




इन त्रिमूर्ति से निर्मित यह योग अपनी सार्थकता को स्वयं ही प्रकट कर देता है. जिसे जानने के लिए किसी अन्य तथ्य को जानने की आवश्यकता नहीं है. कुण्डली मे बनने वाला यह योग कई प्रकार से फलिभूत होता है जैसे द्वितियेश से दूसरे, आठवें और बारहवें भाव में अगर शुभ ग्रह हों तो हरि योग बनता है. सप्तमेश से चतुर्थ, अष्टम व नवम भाव में शुभ ग्रह हों तो शिव योग बनता है. लग्नेश से चतुर्थ, दशम और एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो ब्रह्मा योग बनता है. यदि त्रिमूर्ति योग के बनने में अशुभ ग्रह भी साथ में हैं तो यह योग भंग हो जाता है. हरि योग शिव योग ब्रह्मा योगो में से कोई भी एक योग आपकी कुण्डली में होता है तो सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है.


त्रिमूर्ति योग का प्रभाव 


हरि ,शिव व ब्रह्मा योग संयुक्त रूप से बनने वाला त्रिमूर्ति योग अपने निम्न रुपों में सामने आत अहै जमें इसके प्रत्येक स्वरुप को लिया जाता है. क्योंकि प्रत्येक भाव के अनुरुप में स्थित होने पर यह योग त्रिमूर्ति को भिन्न रुप से दर्शाता है. भिन्न भिन्न रुप होने पर भी यह योग एक ही नाम त्रिमूर्ति योग से जाना जाता है. 


त्रिमूर्ति हरि योग 


यह योग जन्म कुंडली में दूसरे, आठवें और बारहवें भाव में शुभ ग्रह स्थित होने पर बनता है. हरि योग शुभ फलों को प्रदान करने वाला होता है. व्यक्ति को जीवन में सम्मान की प्राप्ति होती है. इसकी शुभता संपत्ति और धन प्रदान करने वाली होती है.


त्रिमूर्ति शिव योग 


जन्म कुंडली में सप्तमेश से चतुर्थ, अष्टम व नवम भाव में यदि शुभ ग्रह हों तो शिव योग का निर्माण होता है. यह यह योग शक्ति एवं उर्जा प्रदान करने वाला होता है. जातक के भितर साहस एवं शौर्य की भावना समाहित रहती है. इसके प्रभाव स्वरूप व्यक्ति विजय एवं सफलता को प्राप्त करता है.


त्रिमूर्ति ब्रह्मा योग 


जन्म कुंडली में यदि लग्नेश से चतुर्थ, दशम और एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो ब्रह्मा योग बनता है. इस योग के बनने से कर्मों में शुद्धता आती है तथा विद्वता को पाता है. व्यक्ति अपने कार्यों द्वारा समाज में उच्च स्थिति को पाता है. लाभ एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है. 


कुंडली में यदि त्रिमूर्ति योग बन रहा हो, लेकिन अशुभ ग्रह भी साथ में स्थित हों तो इस स्थिति में यह योग भंग हो जाता है. जन्म कुंडली में हरि योग, शिव योग या ब्रह्मा योग में से कोई भी एक योग आपकी कुण्डली में बन रहा है तो आप धनी, सुखी, विद्वान स्वत: ही हो जाते है.: त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग


 


त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग विषेश बहुमूल्य वस्तुओं की खरीददारी करने के लिए हैं . इन योगों में खरीदी गई वस्तु नाम अनुसार भविष्य में दिगुनी व तिगुनी हो जाती है । अतः इन योगों में बहुमूल्य वस्तु खरीदनी चाहिये । इन योगों के रहते कोई वस्तु बेचनी नहीं चाहिये क्योंकि भविष्य में वस्तु दुगुनी या तिगुनी बेचनी पड़ सकती है । धन या अन्य सम्पत्ति के संचय के लिए ये योग अद्वितीय माने गए हैं । इन योगों के रहते कोई वस्तु गुम हो जाये तो भविष्य में दुगुना या तिगुना नुकसान हो सकता है, अतः इस दिन सावधान रहना चाहिए । इस दिन मुकद्दमा दायर नहीं करना चाहिए और दवा भी नहीं खरीदनी चाहिए ।जन्म कुंडली में दुर्घटना होने के योग


 


जन्म कुंडली में आठवाँ भाव अथवा अष्टमेश, मंगल तथा राहु से पीड़ित होने पर दुर्घटना होने के योग बनते हैं.


सारावली के अनुसार शनि, चंद्रमा और मंगल दूसरे, चतुर्थ व दसवें भाव में होने पर वाहन से गिरने पर बुरी दुर्घटना देते हैं.


जन्म कुंडली में सूर्य तथा मंगल चतुर्थ भाव में पापी ग्रहों से दृष्ट होने पर दुर्घटना के योग बनते हैं. 


सूर्य दसवें भाव में और चतुर्थ भाव से मंगल की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना होने के योग बनते हैं. 


निर्बली लग्नेश और अष्टमेश की चतुर्थ भाव में युति हो रही हो तब वाहन से दुर्घटना होने की संभावना बनती है. 


लग्नेश कमजोर हो और षष्ठेश, अष्टमेश व मंगल के साथ हो तब गंभीर दुर्घटना के योग बनते हैं. 


जन्म कुंडली में लग्नेश कमजोर होकर अष्टमेश के साथ छठे भाव में राहु, केतु या शनि के साथ स्थित होता है तब गंभीर रुप से दुर्घटनाग्रस्त होने के योग बनते हैं. 


जन्म कुंडली में आत्मकारक ग्रह पापी ग्रहों की युति में हो या पापकर्तरी में हो तब दुर्घटना होने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली का अष्टमेश सर्प द्रेष्काण में स्थित होने पर वाहन से दुर्घटना के योग बनते हैं. 


जन्म कुंडली में यदि सूर्य तथा बृहस्पति पीड़ित अवस्था में स्थित हों और इन दोनो का ही संबंध त्रिक भाव के स्वामियों से बन रहा हो तब वाहन दुर्घटना अथवा हवाई दुर्घटना होने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव तथा दशम भाव पीड़ित होने से व्यक्ति की गंभीर रुप से दुर्घटना होने की संभावना बनती है

: विदेश यात्रा योग


 


1- दुसरे भाव अथवा एकादश भाव में सूर्य और चंद्रमा से अतिरिक्त दो या दो से अधिक ग्रह स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति जीवन में एकबार अवश्य ही विदेश यात्रा करता है ! 


2- लग्न भाव का अधिपति, राहू, और केतु में से एक ग्रह बारहवे भाव में स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति विदेश यात्रा करता है ! 


3- नवम एवं बारहवे भाव भाव के स्वामी आपस में स्थान परिवर्तन करके स्थित हो तो भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है ! 


4- लग्नेश बारहवे भाव में स्थित हो और एवं दशम भाव में कोई ग्रह स्थित न हो तो व्यक्ति विदेश यात्रा करता है ! 


5- लग्न भाव का अधिपति और नवम भाव का अधिपति नवम भाव में स्थित हो तो भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है अल्पायु योग


 


1, 4, 5, 8 स्थानों का शनि लग्न में हो | 


शुभग्रह 3, 6, 9 स्थानों में हो | 


अष्टमेश पापग्रह होकर गुरु से दृष्ट हो | 


चन्द्र, शनि और सूर्य आठवें भाव में हो | 


लग्नेश निर्बल होकर पाप राशि में पड़ा हो | 


दिन में जन्म हो और चन्द्रमा से आठवें स्थान पर पापग्रह हो | 


दीघॉयु योग का अभाव हो घाव तथा चोट लगने के योग


 


यह मंगल की पीड़ित अवस्था के कारण होने की संभावना अधिक रहती है. 


जन्म कुंडली में यदि मंगल लग्न में हो और षष्ठेश भी लग्न में ही स्थित हो तब शरीर पर चोटादि लगने की संभावना अधिक होती है. 


जन्म कुंडली में मंगल पापी होकर आठवें या बारहवें भाव में स्थित होने पर चोट लगने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली में यदि मंगल, शनि और राहु की युति हो रही हो तब भी चोट अथवा घाव होने की संभावना बनती है. 


चंद्रमा दूसरे भाव में हो, मंगल चतुर्थ भाव में हो और सूर्य दसवें भाव में स्थित हो तब चोट लगने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो, आठवें भाव में शनि स्थित हो और दसवें भाव में चंद्रमा स्थित हो तब चोट लगने की अथवा घाव होने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली के छठे भाव में मंगल तथा चंद्रमा की युति हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती है. 


चंद्रमा तथा सूर्य जन्म कुंडली के तीसरे भाव में होने से भी चोट लगने की संभावना बनती है. 


कुंडली का लग्नेश तथा अष्टमेश शनि और राहु या केतु के साथ आठवें भाव में स्थित हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती है. 


लग्नेश, चतुर्थेश तथा अष्टमेश की युति होने पर भी चोट लगने की संभावना बनती है. 


जन्म कुंडली के लग्न में ही छठे भाव का स्वामी राहु या केतु के साथ स्थित हो. 


जन्म कुंडली के छठे अथवा बारहवें स्थान में शनि व मंगल की युति हो रही हो. 


जन्म कुंडली के लग्न में पाप ग्रह हो या लग्नेश की पापी ग्रह से युति हो और मंगल दृष्ट कर रहा हो.


 


आज के भगदौड़ वाले समय में व्यवसाय या नौकरी में प्रमोशन की चाह सभी के मन में देखी जा सकती है. अक्सर देखने में आता है कि कुछ व्यक्तियों को अत्यधिक परिश्रम के बावजूद भी आशानुरूप सफलता नहीं मिल पाती है और कुछ लोगों को कम मेहनत से ही अच्छी सफलता मिल जाती है. इस का एक कारण ज्योतिष में भी खोजा जा सकता है ज्योतिष अनुसार यह ग्रहों और उनके गोचर का प्रभाव और व्यक्ति के प्राब्धय के प्रभाव होता है .सफलता किसे प्राप्त होगी और कब कोई उन्नति के शिखर पर पहुंचता है इन सब बातों का विचार ज्योतिष द्वारा समझने का प्रयास किया जा सकता है. 


कुण्डली विवेचना 


जन्म कुण्डली द्वारा व्यक्ति की प्रगत्ति और उन्नती को समझा जा सकता है. कुण्डली में एकादश भाव को आय की प्राप्ति का भाव अर्थात लाभ भाव कहा जाता है इसलिए इस भाव पर उच्च के ग्रहों का गोचर अच्छी सफलता दिलाता है. थोडा़ और सूक्ष्म अध्ययन के लिये नवांश कुण्डली को देखा जाता है. व्यवसाय मे उन्नति के काल को निकालने के लिये दशमांश कुण्डली की विवेचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है जितनी की डी-1 और डी-9 इन वर्ग कुण्डलियों में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व होता है. वर्ग कुण्डलियों से जो ग्रह दशम/एकादश भाव या भावेश विशेष संबध बनाते है. उन ग्रहों की दशा, अन्तरदशा में जातक को उन्नति मिलने की संभावना रहती है. इसी प्रकार बली ग्रहों की तथा शुभ ग्रहों की दशा मे भी पदोन्नती मिल सकती है. 


दशा विवेचन 


कुण्डली में लग्नेश, दशमेश व उच्च के ग्रहों की दशाएं व्यक्ति को जीवन में ऊँचाईयाँ प्रदान करने में सहायक होती हैं. जब इन का संबध व्यवसाय भाव या लाभ भाव के साथ होता है तो व्यक्ति को व्यवसाय या नौकरी में उन्नती व वृद्धि प्राप्त होती है. इन दशाओं का संबध यदि सप्तम या सप्तमेश से हो जाये तो शुभ फलों की प्राप्ति में अधिकता आ जाती है. 


कुण्डली के दशम भाव का स्वामी नवांश कुण्डली में जिस राशि में जाये उसके स्वामी के अनुसार व्यक्ति का व्यवसाय व उस पर बली ग्रह की दशा/ गोचर उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है, इन ग्रहों की दशा में व्यक्ति को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. यदि इस समय व्यक्ति परिश्रम के द्वारा कार्यों को करने का प्रयास करे तो उसे निश्च्य ही सफलता मिलती है. कुण्डली में उन्नति के योग हो, पद लग्न पर शुभ प्रभाव हो, दशवे घर व ग्यारहवें घर से जुड़ी दशाएं हो व गुरु शनि का गोचर हो तो व्यक्ति को मिलने वाली उन्नति को कोई नहीं रोक सकता है. 


इसके अतिरिक्त कुछ ग्रह योग व्यक्ति के जीवन संवार देते हैं. ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि. ज्योतिष विधा ग्रह और उनके योगों के आधार पर फल का ज्ञान देता है. महान योगों में महालक्ष्मी योग धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है. यह योग कुण्डली में तब बनता है जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है. यह धनकारक योग माना जाता है। इसी प्रकार एक महान योग है सरस्वती योग यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों, युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं. इस प्रकार कुण्डली के विस्तार पूर्वक विवेचन द्वारा यह समझा जा सकत अहै कि जीवन में प्रगती व उन्नती के लिए भाग्य का साथ व कर्म की उपयोगिता बहुत आवश्यक होती है.

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