जतिन दास ( आज़ादी के क्रांतिवीर )
एक ऐसा क्रान्तिकारि जिनकी अंतिम संस्कार यात्रा में #नेताजी_सुभाषचन्द्र_बोस समेत पुरा देश शामिल हुआ था। जतिन दास जी ने कहा था की मेरे अनशन का अर्थ है, 'विजय या मृत्यु'। 🙏।
जतिन दास जी का मनोबल बहुत ऊंचा था। जतिन दास जी का मत था कि संघर्ष करते हुए गोली खाकर या फांसी पर झूलकर मरना आसान है। क्योंकि उसमें अधिक समय नहीं लगता, पर अनशन में व्यक्ति क्रमशः मृत्यु की ओर आगे बढ़ता है। ऐसे में यदि उसका मनोबल कम हो, तो संगठन के व्यापक उदेश्य की हानि होती है।
जतिन दास जी को अनशन के दौरान काफी यातनाएं दी गई। जब अनशन का 60 वा दिन था तब अंग्रेजो ने नकली द्वारा खाना अन्दर डालने की कोशिश की गई उसके बाद ब्रिटिशों के इस करतूतों के बाद दास की हालत नाजुक हो गई और अनशन के 63 वें दिन 13 सितंबर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इनकी मृत्यू के बाद उनके भाई किरण चंद्र दास को कोलकाता बुलाया गया था।
आगे लाहौर से उनकी शव को ट्रेन से ले जाने की तैयारी की गई थी।
लाहौर शहर थम सा गया था। इनकी अंतिम यात्रा देखने के लिए लोगों का एक बड़ा हुजूम उमड़ पड़ा था, जिसे देखकर ब्रिटिशों की नींव हिल गई थी। दास को गुलाब बहुत पसंद था, इसीलिए उनका शव गुलाब के फूलों से पूरा ढक गया था।
हालांकि, उनके शव को ट्रेन से ले जाया गया। उनकी अंतिम यात्रा में कई महान क्रांतिकारियों ने भाग लिया।
इसमें सुभाष चंद्र बोस भी शामिल थे। जिस जगह पर ट्रेन रूकती वहां पर लोग इस शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और जब इनका शव कल पहुंच जाता है तो लाखों की संख्या में लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होते हैं।
फिर इस क्रांतिकारी को अग्नि दे दी गई।
हे महान योद्धा मैं सत्यवान मोर नतमस्तक होकर आपको बारम्बार प्रणाम करता हूं। देश आप के बलिदान का सदैव हरिणी रहेगा। आप हमारे हिरो हैं। आप हमारे आदर्श हैं।
🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏।

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