भगवान् श्री कृष्ण का मेघाडम्बर छत्र ( मेघाडम्बर छत्र का इतिहास )
रुक्मणी जी के स्वयंवर में जब भगवान् श्री कृष्ण विदर्भ प्रदेश के कुण्डनपुर पधारे तब कुण्डनपुर के राजा भीष्मक के द्वारा भगवान् श्री कृष्ण का पद के अनुरूप राज्योचित शिष्टाचार से स्वागत नहीं किया गया.
💥 इस बात के विरोध में श्री कृष्ण जी ने अपना डेरा क्रथकैथ उद्ध्यान में रखा। राजा भीष्मक द्वारा श्री कृष्ण जी का पद के अनुरूप राज्योचित शिष्टाचार से स्वागत न होने से देवराज इंद्र भी प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने श्री कृष्ण जी के लिए स्वर्ग से स्वयं का नृपयोग्य तामझाम उद्यान भेजा, जिसमें शासकीय "मेघाडम्बर छत्र " भी था।
💥 यह सब जानकर राजा भीष्मक को अपनी भूल का ध्यान आया, संकोच से भरे राजा ने क्रथ कैथ उद्यान में ही श्री कृष्ण के लिए सम्राटों के पद के अनुरूप भव्य स्वागत समारोह का आयोजन किया। इस दरबार में उन्हें नजरें भेंट की गई। सभी आगंतुकों ने स्वयं उपस्थित होकर भगवान् श्री कृष्ण को राजकीय सम्मान से उपहार दिए और उनके प्रति श्रद्धा दर्शियी।
💥 रुक्मणी जी ने स्वयंबर में श्री कृष्ण जी को वर चुना .बाकी सब राजा निराश होकर अपने अपने राज्य को चले गये।
💥 स्वयंवर की समाप्ति पर श्री कृष्ण जी ने देवराज इन्द्र का सारा तामझाम उद्यान स्वर्ग लौटा दिया गया, किन्तु शासकीय "मेघाडम्बर छत्र" अपने पास रख लिया और इसे अपना राजकीय अधिकार -चिन्ह बनाकर घोषणा की कि जब तक "मेघाडम्बर छत्र "यदुवंशियों के साथ रहेगा वह धरती पर राज करते रहेंगे।
💥 यह मेघाडम्बर छत्र आज भी
जैसलमेर के भाटी राजपूत परिवार के पास जैसलमेर किले के म्युजियम मे सुरक्षित रखा हुआ है!
💥 यह तकरीबन 5200 साल से भी पुराना है. कुछ वैज्ञानिको ने इसकी कार्बन टेस्टिंग की थी, उन्होने ने भी यह प्रमाणित किया है कि यह छत्र 5000 साल से भी ज्यादा पुराना है!
💥 भगवान श्री कृष्ण के असली वंशज वर्तमान मे भाटी, जाडेजा, जादौन, चुडासमा, सलारिया आदि राजपूत है,

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