गीता का सार / Geeta ka Saar
༺꧁ #गीता_सार ꧂༻
🌿न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति ।।🌿
#अर्थ : इसलिये —इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला नि:सन्देह कुछ भी नहीं है, उस ज्ञान को कितने काल से अपने आप समत्वबुद्धिरूप योग के द्वारा अच्छी प्रकार शुद्धान्त:करण हुआ पुरुष आत्मा में अनुभव करता है।
🍀श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्द्धा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।।🍀
#अर्थ : और हे अर्जुन —जितेन्द्रिय, तत्पर हुआ श्रद्धावान पुरुष ज्ञान को प्राप्त होता है, ज्ञान को प्राप्त होकर तत्क्षण भगवत्-प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
☘️अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनयश्यति ।
नायं लोकोअ्स्ति न परो न सुखं संशयात्मन: ।।☘️
#अर्थ : और हे अर्जुन—भगवत विषय को न जानने वाला, श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। संशययुक्त पुरुष के लिये तो न सुख है, न यह लोक है और न परलोक अर्थात् यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए भ्रष्ट हो जाते हैं।
🌲योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।।🌲
#अर्थ : हे धनंजय, समत्वबुद्धिरूप योग द्वारा भगवत-अर्पण कर दिये हैं संपूर्ण कर्म जिसने और ज्ञान द्वारा नष्ट हो गये हैं सब संशय जिसके, ऐसे परमात्म-परायण पुरुष को कर्म नहीं बांधते हैं।
🌱संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत: ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ।।🌱
#अर्थ : परन्तु हे अर्जुन, निष्काम कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिओं और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग, प्राप्त होना कठिन है। भगवतस्वरूप को मनन करने वाला निष्काम कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
🥀कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।।🥀
#अर्थ : इसलिये —निष्काम कर्मयोगी केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्त:करण की शुद्धि के लिये कर्म करते हैं।
🌹शन्कोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ।।🌹
#अर्थ : जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है अर्थात् जिसने काम और क्रोध को सदा के लिए जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोक में योगी है और वही सुखी है।
🌸योअ्न्त:सुखोअ्न्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव य: ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोअ्धिगच्छति ।।🌸
#अर्थ : जो पुरुष निश्चय करके अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही आरामवाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञानवाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव हुआ सांख्ययोगी शान्त ब्रह्म को प्राप्त होता है।
🍃लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: ।
छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता: ।।🍃
#अर्थ : और—नाश हो गये हैं सब पाप जिनके, ज्ञान से निवृत्त हो गया है संशय जिनका, संपूर्ण भूत प्राणियों के हित में है रति जिनकी और एकाग्र हुआ है भगवान के ध्यान में चित्त जिनका, ऐसे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त परब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
🌲कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ।।🌲
#अर्थ : काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्त वाले एवं परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म परमात्मा ही प्राप्त है।
🌴स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: ।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: ।।🌴
#अर्थ : और हे अर्जुन —बाहर के विषय भोगों को बाहर ही त्याग कर, नेत्रों की दृष्टि को भ्रकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जीती हुयी हैं इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जिसकी ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है।
༺꧁🚩#जय_श्री_कृष्ण🚩꧂
((#श्री_कृष्ण_गोविन्द_हरे_मुरारी_हे_नाथ_नारायण_वासुदेवाय।))

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