भोजन के सम्बन्ध में महर्षि मनु के विचार
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महर्षि मनु के मतानुसार भोजन को प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करना उचित है। भोजन की निन्दा कभी नहीं करना चाहिए। जूठा भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आवश्यकता से अधिक भोजन करना असामाजिक कृत्य है।
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वश:।।
मनुस्मृति २/५४
भोजन के पदार्थों का 'यह प्राणार्थक भोज्य है' ऐसा ध्यान करके आदर करे। उसकी निन्दा न करे। उसे पूरा खाये, जूठा भोजन छोड़े नहीं। भोजन को देखकर हर्षित हो। मन को प्रसन्न रखे। भोजन करने के पश्चात् भी उसका प्रतिनन्दन करे कि यह अन्न मुझे सर्वदा प्राप्त हो।
भोजन का सत्कार इसलिए करना चाहिए क्योंकि वह अद्य अर्थात् खाने योग्य है। इसका तात्पर्य यह है कि खाने योग्य पदार्थ ही खाना चाहिए अखाद्य भोजन कदापि नहीं।
आज हमें भरपेट भोजन मिल गया है इसलिए भोजन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना, भोजन का प्रतिनन्दन करना कहा जाता है।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति।
अपूजितं तु तद् भुक्तमुभयं नाशयेदिदम्।।
मनुस्मृति २/५५
जो भोजन नित्य सत्कारपूर्वक प्रसन्न मन से किया जाता है, वह बल और वीर्य, ऊर्जाशक्ति प्रदान करता है। अपूजित (तिरस्कृत) अन्न को खाने से वह इन दोनों बल और वीर्य का नाश कर देता है।
नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्ट: क्वचिद् व्रजेत्।।
मनुस्मृति २/५६
जूठा अन्न किसी को खाने को न दे। स्वयं भी किसी का जूठा भोजन न खाए। बीच में (प्रात: और सायं के) भोजन न करे। बहुत अधिक भोजन न करे और जूठे मुँह (बिना अँचवन अथवा कुल्ला किये) कहीं न जाए।
जूठा भोजन प्रायः रोगाणुओं का सञ्चरण करता है। जूठे मुँह यहाँ वहाँ घूमना से भी रोग के कीटाणुओं का फैलना सम्भव है। जूठे व्यक्ति को भी वायुमण्डल में उपस्थित कीटाणुओं से क्षति होना सम्भव है।
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्।।
मनुस्मृति २/५७
अति भोजन आरोग्य, आयु, स्वर्ग (सुख) पुण्य के लिए अहितकर है। अधिक भोजन लोकनिन्दित है। इस कारण उसे (अधिक भोजन करने को) त्याग देना चाहिए।
अधिक भोजन, भोजन करने वाले को अजीर्णादि रोग तो उत्पन्न करता ही है, साथ ही अपनी आवश्यकता से अधिक खाना, अन्य व्यक्तियों का भाग खाने के समान है। इससे समाज में असन्तोष उत्पन्न होता है। भूखे व्यक्तियों के मन में अधिक भोजन करने वाले के प्रति रोष, द्वेष और घृणा उत्पन्न होती है।
महर्षि के ये विचार आज भी मनन करने और आचरण में लाने योग्य हैं।

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