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5/27/2021

वीर अहीर आल्हा

   
                           
   

वीर अहीर आल्हा




भारतीय इतिहास में महान योद्धा,पराक्रमी ,बुन्देलखंड की शान यदुवंश शिरोमणि क्षत्रिय वीर अहीर आल्हा जी की जयंती पर शत शत नमन 

#VeerAhirAlha 

#वीर अहीर आल्हा

बड़े लडैया महोबा बाले इनकी मार सही ने जाए।एक को मारे दुई मर जाए तीसरा ख़ौफ़ खाय मर जाए।'आल्हा जयंती पर विशेष'

''आल्हा-ऊदल''

महोबा (बुन्देलखण्ड) के चन्द्रवंशी राजा परमाल (परमार्दिदेव) 1165-1202, के दरबारी कवि एवं जगनेर के राजा 'जगनिक' (जागन) द्वारा 'परमालरासो' की रचना की गई। जिसके एक खण्ड में 'आल्हा-ऊदल' की बेजोड़ वीरता का छन्दोबद्ध वर्णन है। 'आल्हा' के नाम पर इस खण्ड का नाम 'आल्हखण्ड' और इस वीर छन्द का नाम 'आल्हा' रखा गया है। 'आल्हा' की लोकगायकी, अधिकांश उत्तरी व मध्यभारत में जनमानस के बीच वीरता के भाव भरती रही है। 'आल्हखण्ड' में आल्हा-ऊदल द्वारा विजित 52 लड़ाइयों की गाथा है। जिसका संकलन, 1865 में फर्रुखाबाद के तत्कालीन कलेक्टर, सर चार्ल्स 'इलियट' ने अनेक भाटों की सहायता से कराया था। सर जार्ज 'ग्रियर्सन' ने बिहार में इण्डियन एण्टीक्वेरी तथा 'विसेंट स्मिथ' ने बुन्देलखण्ड लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया में भी आल्हखण्ड के कुछ भागों का संग्रह किया था। वाटरफील्डकृत अनुवाद "दि नाइन लाख चेन" (नौलखा हार) अथवा "दि मेरी फ्यूड" के नाम से कलकत्ता-रिव्यू में सन १८७५-७६ ई० में इसका प्रकाशन हुआ था। इलियट के अनुरोध पर डब्ल्यू० वाटरफील्ड ने उनके द्वारा संग्रहीत आल्हखण्ड का अंग्रेजी अनुवाद किया था। जिसका सम्पादन 'ग्रियर्सन' ने १९२३ ई० में किया।

यूरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को रणमत्त करने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेंट को इस 'आल्हखण्ड' का सहारा लेना पड़ा था।

   जस्सराज तथा बच्छराज बनाफर गोत्रीय यदुवंशी/अहीर क्षत्रिय थे।  कुछ इतिहासकार इनका निकासा बक्सर(बिहार) का मानते हैं। इनके लिए दलपति अहीर की पुत्रियां 'दिवला' तथा 'सुरजा' (तिलका) व्याही थीं। दलपति को ग्वालियर का राजा भी बताया गया है। दुर्धर्ष योद्धा दस्सराज-बच्छराज परमाल के यहाँ सामन्त/सेनापति थे। जिन्हें माढ़ोंगढ़ के राजा जम्बे के पुत्र कडिंगाराय ने सोते समय धोखे से गिरफ्तार करके कोल्हू में जिंदा पेर कर खोपड़ी पेड़ पर टँगवा दी थी। जिसका बदला पुत्रों, आल्हा-ऊदल और मलखे-सुलखे ने कडिंगा और उसके बाप को मारकर लिया और इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया कि अहीर 12 वर्ष तक भी अपना बदला नहीं भूलता। स्वाभिमानी वीर आल्हा-ऊदल ताउम्र परमाल तथा कन्नौज के राजा जयचन्द के विस्वसनीय सिपहसालार बने रहे। जबकि मलखान ने सिरसा में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। कन्नौज नरेश जयचन्द, सम्राट पृथ्वीराज के मौसेरे भाई थे जिनकी पुत्री संयोगिता को पृथ्वीराज द्वारा भगा लाना, दोनों के बीच वैमनष्यता का कारण बना था। जिसका कुफल सारे देश को भोगना पड़ा। संयोगिता अपहरण के समय ही 'एटा' जनपद में रुस्तमगढ़ के पास पृथ्वीराज के दस्ते से दुस्साहसपूर्वक टकराते हुए जखेश्वर यादव (जखैया) शहीद हुआ था। जिसकी जात ककराला (एटा) और पैडत (फिरोजाबाद) में होती है। 

      'बनाफर' वंश को ओछा समझकर राजा इन्हें अपनी कन्याएँ ब्याहने में हिचकते थे। किन्तु इन्होंने तलवार के बल पर अधिकांश राजाओं को अपना करद बनाकर उनकी लड़कियां व्याही थीं। जिसकी गवाही आल्हखण्ड की यह निम्न पंक्तियां स्वयं देती हैं...


जा गढ़िया पर चढ़े बनाफर,

ता पर दूब जमी है नाय।

दृष्टि शनीचर है ऊदल की,

देखत किला क्षार है जाय।।

    स्वयं पृथ्वीराज चौहान को आल्हा-ऊदल की तलवार के आगे विवश होकर, न चाहते हुए भी, अपनी पुत्री बेला, चन्द्रवंशी 'परमाल' के पुत्र ब्रह्मा को व्याहनी पड़ी थी। परमाल की पुत्री 'चन्द्रावलि' बाँदोंगढ़ (बौरीगढ़/बदायूं) के राजकुमार इंद्रजीत/इन्द्रसेन यादव को व्याही थी। उरई का चुगलखोर राजा 'माहिल' परिहार स्वयं अपने बहिनोई राजा 'परमाल' से डाह मानते हुए उनके विरुद्ध 'पृथ्वीराज चौहान' को भड़काता रहता था। क्योंकि महोबा उसी के बाप 'वासुदेव' का था जिसे परमाल ने हस्तगत कर लिया था। सन 1182 में हुए दिल्ली-महोबा युद्ध में कन्नौज सहित यह तीनों ही राज्य वीर विहीन हो गए थे। इसी कमजोरी के कारण भारत पर विदेशी हमले शुरू हो गए थे...

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