भागवद गीता ( अध्याय ६ )
योग की परम स्थिती का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण बताते है कि " सर्व रूप में अवस्थित जीव के लिए परमात्मा भाव से सबका प्रेम से सम्मान करना"
परमात्मा कोई मंदिर या सातवे आसमान पर नहीं पर वे सर्वत्र विराजमान है सबके अंतर में।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
॥31॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
॥32॥
(भगवान श्रीकृष्ण के यह वचन सुनकर अर्जुन ने प्रश्न किया कि यह कार्य दुष्कर लगता है। मन के निग्रह का विषय क्यों की मन ही है जो हमे हमारी साधना में लीन होने से रोकता है और आगे भी बढ़ता है। )
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस् याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ।
॥33॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
॥34॥
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है
॥35॥
आत्म ज्ञान का मार्ग प्रशस्त कैसे करें??
अभ्यास और वैराग्य। यह दो ही चीज है जो इस अशंभव आत्म ज्ञान को संभव बनती है।
हम वैराग्य पूर्वक सतत प्रयास करना चाहिए।
आत्म ज्ञान ऐसा नहीं कि धीरे धीरे मिलेगा एक साथ ही मिलजता है जैसे हजारों साल के अंधेरे को एक दीपक क्षण मात्र में दूर कर देता है। इस लिए निराश नहीं होना की मुझे ज्ञान कब मिलेगा, निरंतर प्रयत्न करते रहो।


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