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3/04/2021

हनुमान जी चिरंजीवी हैं

   
                           
   

हनुमानजी चिरंजीवी हैं




हनुमान जी चिरंजीवी हैं। वे ऐसे महायोगी हैं जो हजारों साल से पृथ्वीलोक पर ही रह रहे हैं। वे यहाँ रहकर न केवल भक्तों की रक्षा करते आ रहे हैं बल्कि उन गूढ रहस्यों की सुरक्षा भी करते आ रहे हैं जो कभी ऋषि मुनियों के आश्रमों में सुरक्षित थे। जैसे-जैसे समय बीता, वैसे-वैसे मानवता का आध्यात्मिक पतन होता गया। धर्म ग्रन्थों से गूढ़ रहस्य लुप्त हो गए और केवल कहानियाँ बाकी रह गईं।


यह देवी-देवताओं को भी पता था कि कलियुग में मानव जाति का आध्यात्मिक पतन होगा। इसलिए उन गूढ रहस्यों को सुरक्षित रखने के लिए हनुमान जी ने अपनी एक गुरु-परंपरा स्थापित की थी। उन्होने कुछ आदिवासियों को अपना शिष्य बनाया था। वे आदिवासी एक पर्वतीय वन में आज तक बाहरी समाज से कटकर रह रहे हैं।


हनुमान जी द्वारा स्थापित गुरु परंपरा अन्य गुरु परम्पराओं से भिन्न है। अन्य गुरु परम्पराओं में गुरुओं का देहावसान होता गया और गुरु बदलते रहे। इसीलिए पीढ़ी दर पीढ़ी उन परम्पराओं का पतन हो गया। हनुमान जी चिरंजीवी हैं । इसलिए उनकी गुरु परंपरा में सदियों से वे स्वयं ही गुरु हैं। वे हर 41 साल में अपने शिष्यों की नई पीढ़ियों से मिलने आते हैं और उन्हे गूढ रहस्य प्रदान करते हैं।


इस बार जब वे अपने शिष्यों से मिलने आए तब एक असाधारण घटना घटी। बाहरी समाज के तीन योगी भटकते-भटकते श्रीलंका के सप्तकन्या पर्वत पर स्थित उस जंगल में पहुँच गए जहां वे आदिवासी रहते हैं। स्वाभाविक है कि यह हनुमान जी की इच्छा के बिना तो नहीं हुआ होगा। कदाचित मानवता अब एक ऐसे मोड़ पर आ पहुंची है कि उन गूढ़ रहस्यों का पुनः समाज में पहुँचना आवश्यक हो गया था।


ये वे रहस्य हैं जिनको साधने से कोई भी भक्त अपने इष्ट देवी-देवता के साक्षात दर्शन पा सकता है। वे साक्षात दर्शन किसी स्थान विशेष पर जाने से नहीं मिल सकते। टिकट खरीदकर किसी स्थान विशेष पर जाना तो आजकल बहुत आसान है किन्तु अपने घर पर रहकर ही शांत मन से इन रहस्यों को साधना कठिन है।


इन रहस्यों को साधने वाला भक्त तीन चरणों में अपने इष्ट देवी-देवता तक पहुंचता है : पहले चरण में वह अपने जीवन की सभी समस्याओं से मुक्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप उसके मन से सभी भय व चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं। दूसरे चरण में उसके जीवन की अपूर्ण इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं और परमात्मा को पाने के सिवाय और कोई इच्छा उसके मन में नहीं रहती। इस दौरान यह भी आवश्यक है कि उसके मन में कोई नई इच्छा उत्पन्न न हो क्योंकि इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती।


तीसरे चरण में भक्त एक ऐसी अद्भुत अवस्था में चला जाता है जिसमें उसको संसार एक सपने की भांति प्रतीत होता है। यह अवस्था इस बात का संकेत है कि वह अपने इष्ट देवी-देवता के साक्षात दर्शन पाने के निकट है। तब उसे समझ में आता है कि कैसे कुछ आदिवासी लोग अपने इष्ट हनुमान जी को अपनी आँखों से देख सकते हैं और उनसे वार्तालाप कर सकते हैं।


ये गूढ़ रहस्य “कलिहनुवाणी” नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए हैं। कलिहनुवाणी अर्थात कलियुग में हनुमान जी की वाणी। हनुमान जी द्वारा त्रेता युग में की गई लीलाएँ रामायण में हैं और द्वापर युग में की गई लीलाएँ महाभारत में हैं। ये पहली बार है कि उनकी कलियुग में की गई लीलाएँ प्रकाश में आई हैं। इन लीलाओं में हनुमान जी अपने आदिवासी शिष्यों को वे गूढ़ रहस्य प्रदान करते हैं जो हर जगह से लुप्त हो चुके हैं।


इन लीलाओं का प्रकाश में आना भी एक रहस्य है। जो तीन योगी इन रहस्यों को जंगल से समाज में लाने का माध्यम बने हैं, वे अपने 'अहम' अर्थात नाम से मुक्त होकर "शून्य" हो चुके हैं। “कलिहनुवाणी” नामक पुस्तक का प्रकाशन अन्य पुस्तकों की भांति नहीं हुआ है। इस पुस्तक की सीमित प्रतियाँ ही छापी गई हैं और हर प्रति को एक विशेष अनुष्ठान द्वारा पवित्र किया गया है। इसलिए यह पुस्तक किसी भी पुस्तक भंडार में उपलब्ध नहीं है


 जीवन में परमात्मा को पाने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। परमात्मा को पाने के बाद बाकी सब चीजें अपने आप मिल जाती हैं। जिनको कुआँ मिल जाता है उनको बूंद-बूंद के लिए भटकना नहीं पड़ता। कलियुग में भी बहुत लोग ये जानते हैं। किन्तु वे ये नहीं जानते कि परमात्मा को पाने के लिए क्या किया जाए। 


इस पवित्र पुस्तक के हर शब्द में जीवन है क्योंकि ये शब्द 41 साल में एक बार होने वाली चरण पूजा में स्वयं हनुमान जी द्वारा बोले गए हैं। यह पुस्तक जिस स्थान पर रखी होती है उस स्थान के पास से गुजरने वाले नास्तिक को भी वहाँ पर एक जीवित ऊर्जा के होने का आभास होता है। जो भी इस पुस्तक के ऊपर छपे दिव्य चरण चिन्ह को देख लेता है उसको वह चरण चिन्ह बंद आँखों से भी दिखाई देने लगता है।

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