सिंधु घाटी सभ्यता
हमारे अतीत का वैभव आज इतिहास बनकर खड़ा है
आज जहाँ सभी देश कूटनीति, व्यापार और आधुनिकता की दौड़ में उलझकर रह गए हैं वहीं हजारों वर्ष पहले हमारे भारत ने दुनियाँ के वहशियों और जंगली खानाबदोशों को प्राकृतिक गुफाओं से निकालकर आधुनिक सभ्यता के रास्ते में लाकर खड़ा कर दिया था
हाँ हम बात कर रहे हैं आज से 3000 वर्ष पूर्व की जब दुनियाँ बंजारों की तरह जीवन जी रही थी । सिंधु घाटी सभ्यता ना केवल अपने समकालीन सभी सभ्यताओं से श्रेष्ठ थी बल्कि आधुनिक दुनियाँ के लिए भी एक प्रेरणास्त्रोत है । खुदाई में प्राप्त सभी संरचनाओं के कार्यों को अभी तक पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन पुरतात्विदों ने जितना समझा है वो चौकाने वाला है हड़प्पा में पक्की ईंटो का इस्तेमाल किया जाता था जबकि इसी समय के मिस्र के भवनों में सिर्फ धूप में सूखी ईंट का ही प्रयोग हुआ था और समकालीन मेसोपेटामिया में पक्की ईंटों का प्रयोग मिलता तो है पर इतने बड़े पैमाने पर नहीं जितना सिन्धु घाटी सभ्यता में।
मोहन जोदड़ो की जल निकास प्रणाली अद्भुत थी, लगभग हर नगर के हर छोटे या बड़े मकान में किसी विकसित देशों की तरह स्वयं का प्रांगण और स्नानागार होता था। कालीबंगा के घरों में अपने-अपने कुएं थे। घरों का पानी बहकर सड़कों तक आता था जहाँ इनके नीचे नालियाँ बनी थीं। अक्सर ये नालियाँ ईंटों और पत्थर की सिल्लियों से ढकीं होती थीं। सड़कों की इन नालियों में जगह-जगह मैनहोल भी बने होते थे ।
इस सभ्यता की नगर निर्माण योजना आज के विकसित देशों की नगर योजनाओं से भी अधिक प्रभावी थी, हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ो दोनो नगरों के इलाके एक जाल की तरह जुड़े हुए थे, यानि सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं इस तरह से एक नगर अनेक आयताकार खंडों में विभक्त हो जाता था। ये बात सभी सिन्धु बस्तियों पर लागू होती थीं चाहे वे छोटी हों या बड़ी। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के भवन बड़े होते थे। ईंटों की बड़ी-बड़ी इमारत देख कर सामान्य लोगों को भी यह लगेगा कि यहां के शासक कितने प्रतापी और प्रतिष्ठावान रहे होंगे ।
मोहनजोदड़ो का विशाल सार्वजनिक स्नानागार आधुनिक युग को भी सोचने के लिए मजबूर कर देता है , यह ईंटो के स्थापत्य का एक सुन्दर उदाहरण है। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। दोनो सिरों पर तल तक जाने की सीढ़ियाँ लगी हैं। बगल में कपड़े बदलने के कमरे हैं। स्नानागार का फर्श पकी ईंटों का बना है। पास के कमरे में एक बड़ा सा कुंआ है जिसका पानी निकाल कर होज़ में डाला जाता था। हौज़ के कोने में एक निकासी व्यवस्था है जिससे पानी बहकर नाले में जाता था। ऐसा माना जाता है कि यह विशाल स्नानागार धर्मानुष्ठान सम्बंधी स्नान के लिए बना होगा । यहाँ गांवों के बाहर एक पक्की ईंट की दीवार बनी होती थी ताकि बाढ़ से बचा जा सके ।
बंजारों की तरह जीने वाले युग में, सिंधु घाटी के लोग कृषि के क्षेत्र में आज से भी कहीं आगे थे ये गेहूँ, जौ, मटर, ज्वर, तिल, सरसों उगाया करते थे दुनियाँ में सबसे पहला कपास भी इन्ही लोगों ने पैदा किया। मोहन जोदड़ो में अनाज रखने का कोठार भी प्राप्त हुआ है, जो 45.71 मीटर लंबा और 15.23 मीटर चौड़ा है। इसी तरह के कई कोठार हड़प्पा में भी मिले हैं और कुछ कोठार नदी से चंद मीटर की दूरी पर मीले हैं इससे यह साबित होता है कि आधुनिक देशों की तरह संकट के समय लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए अनाज संरक्षण और अन्य देशों में निर्यात की भी व्यवस्था थी ।
यहाँ के नगरों में मिट्टी के बर्तन बनाने में लोग बहुत कुशल थे। मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग से भिन्न-भिन्न प्रकार के चित्र बनाये जाते थे। इनकी ख़ूबसूरतीं और बारीकी देखकर आप इसे प्राचीन मानने से इनकार कर देंगे। ये लोग अफ़ग़ानिस्तान और फारस से व्यापार करते थे इतना ही नहीं इन्होंने आज की तरह दूसरे देशों में अपना बेस भी स्थापित किया था, उन्होंने उत्तरी अफ़गानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश स्थापित किया जिससे उन्हें व्यापार में सहूलियत होती थी, हड़प्पकालीन सिक्के मेसोपोटामिया में मिले हैं जिनसे जो इस बात का सबूत है कि मेसोपोटामिया से भी उनका व्यापार सम्बंध था।
एक समय ऐसा आया जब बच्चे-बूढ़े, औरतें, इमारतें, वैभव, समृद्धि, महानता और फिर पूरा शहर एक महान सभ्यता का ध्वजवाहक बनकर समय की सीढ़ियों पर चलते हुए प्रकृति के परिवर्तन के प्रारूपों में उलझकर हमेशा के लिए जमीदोंज हो गया और समय के सारथी ने सिंधु के सत्य को श्रुतियों में बदल दिया लेकिन मेसोपोटामिया में मिलने वाले हड़प्पाकालीन सिक्कों की खनक इस बात की गवाह हैं कि लोथल के बंदरगाह से निकली सभ्यता की नौकाओं ने दुनियाभर के भूखे-नंगे खानाबदोशों को नवजीवन से भर दिया था।

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