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7/26/2022

नाड़ी दोष पर एक विवेचन।

   
                           
   

 नाड़ी दोष पर एक विवेचन ।




👉 विवाह के लिए कुंडली मिलान में नाड़ी को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है इसे सबसे अधिक अंक प्राप्त है। 👉इसके अनुकूल होने पर से ही गुणों में 8 गुणों की वृद्धि हो जाती है।👉 इसलिए नाड़ी की शुद्धि सर्वत्र आवश्यक है। 👉अन्य कूटों में थोड़ा बहुत समझौता किया जा सकता है लेकिन नाड़ी दोष सर्व शिरोमणि महा दोष है। 👉जिस प्रकार विवाहित कन्या के लिए मंगलसूत्र आवश्यक है उसी प्रकार नारी विचार विवाह योग्य करना के लिए सर्वोपरि है। 👉गर्ग मुनि ने लिखा है -

                     नाडीकूटं तु संग्राह्मं कूटानुवाद तु शिरोमणिम्। 

                     ब्रह्माण्ड कन्यकाकण्ठसूत्रत्वेन विनिर्मित।। 


        👉 नक्षत्रों के आधार पर नाडी चक्र का निर्माण किया जाता है यदि वर व कन्या का नक्षत्र एक नाडी में पड़े तो नाड़ी दोष हो जाता है तथा इसे प्राय आठों अंक काट लिए जाते हैं। 👉इसलिए नाड़ी दोष हो एवं शेष सात कूट मिलते भी हो तो भी वे निष्प्रयोजन हो जाता है। 👉जैसे लड़का लड़की विवाह के लिए राजी ना हो तो शेष संबंधी की इच्छा रहने के बाद भी विवाह नहीं हो सकती उसी प्रकार मिलान के 8 कूटो में नाडी विचार अनिवार्य है।👈


नाड़ी दोष के कूफल :- 👉यदि वर व कन्या के जन्म नक्षत्र एक ही नारी में पड़े तो यह नाड़ी दोष दांपत्य सुख का नाशक होता है ऐसा विवाह सदैव अशुभ होता है।👉 वर्तमान काल में हर दूसरा या तीसरा विवाह कामयाब नहीं हो रहे हैं उस का प्रमुख कारण त्रुटि पूर्ण ढंग से कुंडली का मेलापाक।👉शहरों में जहां अधिकांश विवाह प्रेम का परिणाम है वहां कुंडली मिलान का कोई गुंजाइश भी नहीं बचा है फल से हम सब अवगत हैं।👉ऐसी बात नहीं है कि पुराने जमाने में कुंडलियों में प्रेम विवाह के योग नहीं होते थे या फिर दांपत्य सुख का अभाव के योग कुंडली में नहीं होते थे परंतु वर वधु का कुंडली मेलापाक उस समय के दैवज्ञ इतना समर्पित होकर करते थे की कूफल ना के बराबर होता था। 👈


               👉 यद्यपि तीनों ही नाडीयों का निषेध विवाह संबंध में करना चाहिए तथापि फल का कुछ विभिन्नता विद्वानों ने इसमें माना है।👉 इसका चरम अशुभ फल दोनों की या किसी एक की मृत्यु भी हो सकती है लेकिन यह सदा आवश्यक नहीं है। 👈लाक्षणिक पद्धति से दोष के भयावह परिणामों को रेखांकित करने के लिए ऐसा कहा गया है।👉 इसलिए कूफल का अर्थ यहां अलगाव या संबंध विच्छेद वर एवं कन्या के कुंडली भेद से मानना चाहिए। 👉एक अन्य भाषा में नाड़ी दोष होने पर जातक जातिका के कुंडलियों में बने अलगाव या संबंध विच्छेद के योग आयु एवं मृत्यु के योग के बलाबल अनुसार वियोग से लेकर परम वियोग अर्थात मृत्यु तक का विस्तृत फल कहना चाहिए। 👉यह पराशर मुनि का मत है परंतु वशिष्ठ मुनि एक नाडी विवाह के दोष भिन्न प्रकार से बताया है जिसके अनुसार मध्य नारी होने पर अलगाव या वैधव्य एवं शेष नाडीयों में कन्या की मृत्यु कही है। 👉यदि वर वधु के नक्षत्र नाडी चक्र में पास पास हो जैसे अश्वनी वह अर्दा या रोहिणी और अश्लेषा हो तो 1 वर्ष के अंदर ही दुष्परिणाम प्राप्त हो जाता है अन्यथा 3 वर्ष के भीतर अलगाव मृत्यु या निधन जैसा अशुभ फल प्राप्त होता है। 👉स्त्री पुरुष का कुंडली में तनिक मात्र अलगाव का यदि योग हो और नाड़ी दोष भी हो तो विशेष उत्कट फल होता है। 👈


एक नाड़ी दोष का तीन परिहार:-

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👉१) यदि वर कन्या का नक्षत्र एक हो और राशिया भिन्न हो जैसे कृतिका के प्रथम चरण (मेष राशि) एवं शेष तीनों चरणों (वृष राशि) में नक्षत्र होने पर राशि भेद है। 👈


👉२) एक राशि के भिन्न नक्षत्र में जन्म होने पर नाड़ी दोष नहीं रहता। जैसे स्वाति व विशाखा नक्षत्र में एक ही राशि होने पर भी नक्षत्र भेद रहता है।👈 


👉३) वर वधु दोनों का नक्षत्र एक होने पर भी यदि चरण अलग अलग हो तो भी नाड़ी दोष नहीं रहता है। अन्य किसी परिस्थिति में दैवज्ञ द्वारा दिया गया एक भी अंक महापाप है। 👈


            👉 नाड़ी दोष एक ऐसा महा दोष है जिसका नाम सुनकर ही लोग डर जाते हैं इसमें उत्कट फल दंपत्ति का मरण है अतः मृत्यु से किसे डर नहीं होता लेकिन आज के पंचांगों में मेलापक सारणी दी होती है उसमें एक नारी होने पर तीन अंक लिख दिया जाता है अर्थात अत्यंत साधारण नियमों के आधार पर बिना अपवाद के यह सारणी बनाई जाती है।👉परीक्षा हेतु किसी भी एक मेलापक सारणी को देख लीजिए वहां चरण भेद राशि भेद प्रसिद्ध परिहारो का भी प्रयोग सारिणी निर्माण में नहीं किया जाता है।👉  इस कारण साधारण दैवज्ञ सारणी से देखकर एकदम नाडी आदि दोषों का घोषणा कर देते हैं।👉 अच्छा खासा बना बनाया काम बट्टे खाते में चला जाता है दोनों पक्षों में निराशा छा जाती है सारे प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं और शेष रह जाती है लड़की के पिता की हताशा। 👉एक नारी होने पर भी 3 अंक देकर अन्य कूटों एवं ग्रह मैत्री राशि मैत्री के आधार पर विवाह के अनुमति दे देते हैं जो कि शास्त्र विरुद्ध है।👉 जिसका परिणाम  हम सब समाज में देख रहे हैं कि हर तीसरा शादी टूटता चला जा रहा है।👉 दैवज्ञ को सदा धर्म अनुसार आचरण लोकहित में करना चाहिए ना की आत्महित में। ऐसे दैवज्ञ अपने अज्ञानता के कारण कार्य नाश का कारण बन जाता है।👉 जब साधारण प्रचलित परिहारो की ही स्थिति ऐसी है तब विशेष परिहार की तो बात ही क्या है इसलिए दैवज्ञ को मानवता बस क्षमा तो किया जा सकता है परंतु शास्त्र ज्ञान की कमी कभी क्षोभनिय नहीं हो सकता।👉 साधारण पाठकों से हमारा निवेदन है की अधिकृत, निर्मत्सर, शास्त्रज्ञ दैवज्ञ का ही संपर्क सदैव हितकर है।👉 अच्छे दैवज्ञ टेलीविजन पर आने वाले अथवा यूट्यूब चैनल पर आने वाले शिरोमणि नामधारी लोगों से नहीं आपितु पूर्ण योग्यता रखने वाले व्यक्ति से कार्य सिद्धि होगी यह सर्वदा ध्यान में रखना चाहिए।👈


( नोट- उपरोक्त लेख केवल सामान्य जानकारी हेतु है )

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