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2/14/2022

वर्ण का मेला

   
                           
   

वर्ण का मेला


एक महान परंपरा की विरासत...


महासूद बीज... बढ़ियार समा सुकाप्रदेश में धूम मच रही है जश्न इस क्षेत्र की आस्था का सबसे बड़ा स्थान है वर्ण का खोडियार... इस प्रकार आई खोडियार पूरे गुजरात में सबसे अधिक पूजनीय लोकदेवी है। सौराष्ट्र में खोडियार के कई प्रसिद्ध स्थान हैं लेकिन वर्ण सबसे अलग, अनोखा और अनोखा है। यह एकल धाम आई खोडियार के जन्म से जुड़ी घटना को और अधिक स्पष्ट रूप से उजागर करता है। भावनगर के पास आई खोडियार के मूल रोहिशाला में वर्ण मंदिर में वर्षों से सेवा दे रहे हमीरमामा के अनुसार, लेकिन माताजी का जन्म राजस्थान के चलकनेश गांव में हुआ था। ट्रस्टी श्री लाभूदान गढवी भी इस बात का समर्थन करते हैं। आई खोडियार वर्ण का नेहमा राजस्थान से गुजरात आते समय रोका गया। वर्ण अहिरो का गांव था। एक अहीर बेऔलाद था खोडियार की कृपा से उनके यहां पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई यह परंपरा तभी से शुरू हुई थी। आज भी महासूद बीज का पहला भोग अहीर परिवार द्वारा वर्षों से कायम है यह परंपरा। घानी मतलब तिल गुड़ का मिश्रण.. जो पुत्र को जन्म दे वो सवामन है।। मतलब पच्चीस किलो का सानी चढ़ाया जाता है.. याद आया... यह परंपरा केवल वर्ण खोडियार से जुड़ी है। मटेल, राजपरा या रोहिशाला में यह परंपरा नहीं है। ट्रस्टी श्री विरदान गढवी के अनुसार सानी खोडियार खेतरपाल के भाई को दिया जाता है। माताजी ने भाई मेरखिया के साथ बुलावा आया था कि तू पैर चढ़ेगी और मैं तुझे पुत्र दूंगा। यही इतिहास है...! अब देखते हैं इस भाटीगढ़ मेले की एक झलक.. पौष मास की पूर्णिमा पूरी होते ही इस मेले की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। गपशप, मौत का कुआं, रंगीन सामान बेचने वाले दुकानदार आदि से कुछ ही दिनों में वर्ण का माहौल उग्र हो जाता है। गुजरात और अन्य राज्यों से भी दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन बढ़ियार, वागड़, खरापाट और बनासकांठा के लोगों के लिए यह मेला उनके परिवार का अवसर लगता है। ढाणी चढ़ाने का तरीका किसी रूदा अवसर से कम मजेदार नहीं है। जिस तरह हम जान से जुड़कर शादी में शामिल होते हैं, उसी तरह पच्चीस आदमी ट्रेक्टर, टेम्पो जैसी गाड़ियों में बैठ कर वराना खोडियार में विश्वास करते हैं। गपशप में गलतियां चीख रही हैं और मस्ती में उधम मचा रही है। युवा मेले का भरपूर आनंद लेते हैं। जिंदगी की शाम को खोडियार की गोद में सर रखकर बड़े बुजुर्ग महान कृपा महसूस करते हैं। इस मेले की एक खासियत यह भी है कि अन्य मेलों में जिस तरह की अधिकता या तीव्रता का माहौल बनता है, उसका नाम यहां नहीं लिया जाता। माताजी की मर्यादा भरकर सभी भरपूर आनंद लेते हैं। इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा आश्चर्य कहा जा सकता है कि इतना निर्दोष, बेकाबू सुख इतनी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। पंद्रह दिन इतने शानदार माहौल में सोचने वाले ही बता सकते हैं कि वर्ण के खोडियार के चमत्कार को आधुनिक लोग भी क्यों नमस्कार करते हैं। जब लगभग एक दशक श्रद्धालु अपने जीवन के अमूल्य क्षणों का आनंद लेने आते हैं, तब निर्मित अभूतपूर्व वातावरण को आधुनिक भारत का परम आश्चर्य कहा जा सकता है। टेक्नोलॉजी ने मानव जाति से शांति छीन ली है, तो वर्ण खोडियार जैसे पवित्र स्थान भी हैं जहां दिल मजबूत हो जाता है। मंदिर से अनुशासित व्यवस्था और स्वयंसेवक मित्रों से मिलते हैं तो लगता है कि माँ की छत्रछाया में कैसे सभी आपस में सहयोग से अठारह जाति के लोग इस मेले में आते हैं। चारण, अहीर, भरवाड़, रबारी, ठाकोर और मालधारी कोमो से सुसज्जित इस क्षेत्र के लिए वर्ण का यह मेला मतलब साल में अगले पंद्रह दिनों का महान उत्सव..! उन अनमोल पलों को देखने को तैयार हो तो आइये...

भव्य मेले का आनंद लेने के लिए...


जय खोडीयार.




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