मां मकरवाहिनी (नर्मदा ) मंदिर, जबलपुर
💥 स्थान परिचय : पान दरीबा, कमानिया गेट
के पास, जबलपुर, मध्यप्रदेश
💥 अद्वितीय शिल्प
पुण्यसलिला मां नर्मदा की विश्व की सबसे प्राचीन, सुंदर एवं एकमात्र प्रतिमा मां मकरवाहिनी जबलपुर स्थित मंदिर में है. कल्चुरी कालीन इस प्रतिमा में मां नर्मदा के अवतरण की शिल्प कला दिखती है। दरअसल मगर को संस्कृत में मकर कहा गया है जो मां नर्मदा का वाहन है। इसलिए इसका नाम मकरवाहिनी पड़ा। मां नर्मदा का प्राकट्य ही इस मूर्ति का मूल विषय है। इसलिए मूर्ति में अंकित विभिन्न देवि-देवता वही चित्रित किए गए हैं जो अवतरण के समय साक्षी थे।
💥 मुर्ति सबंधित कथा
कल्चुरी काल की शिल्प कला को उत्तर और दक्षिण क्षेत्र के मूर्ति शिल्प का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है। इस काल की शिल्प को कल्चुरी शिल्प कला कहा जाता है। दरअसल कल्चुरीकाल की स्थापना के बाद राजा कर्ण सर्वप्रमुख राजा साबित हुए। उन्होंने सन 1041 से 1072 तक शासन किया। राजा कर्ण को वाराणसी बहुत प्रिय थी और उसने मंदिर और एक बस्ती भी बनाई थी। वहीं उसे नर्मदा नदी के महात्म्य के बारे में जानकारी मिली थी। उन्हें पता चला कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पाप दूर हो जाते हैं और विश्व में केवल इसी नदी की परिक्रमा होती है। इसलिए राजा कर्ण ने मां मकरवाहिनी की मूर्ति का निर्माण कराया ताकि दर्शन लाभ और उनकी प्रतिमा की परिक्रमा कर नर्मदा की परिक्रमा का लाभ उठाया जा सके। कालांतर में मंदिर कैसे ध्वस्त हुआ इस के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है.
💥 मुर्ति का मिलना
वर्ष 1860 में जबलपुर में रेलवे लाइन बिछ रही थी। तब त्रिपुरी से खनन करके पत्थरों को तोड़कर लाया जा रहा था। खनन में कईं मूर्तियां मिलीं, इस में मां मकरवाहिनी की मुर्ति भी थीं. तभी के अंग्रेज शासकों ने कुछ मूर्तियां ब्रिटेन और अमेरिका भेज दिया। लेकिन यह मां मकरवाहिनी की प्रतिमा बच गई। उस समय जबलपुर में पान दरीबा में हल्कू हलवाई रहते थे, वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे। त्रिपुरी में चल रहें खनन में मां मकरवाहिनी की मूर्ति निकलने की बात का हल्कू पहलवान को पता चला, उसने तुरंत अपने दो पहलवान बेटे, मित्रों और रिश्तेदारों को त्रिपुरी भेजा और मां मकरवाहिनी की मूर्ति को कंधों पर लादकर जबलपुर लाने को कहा। वो मुर्ति ले आये. सबने पान दरीबा में ही मंदिर बनवाने का निर्णय किया। जिस जगह पर मंदिर बनानां चाहते थे वहां सात कुएं थे, 6 कुओं मिटाकर मंदिर बनाया और एक कुआं सार्वजनिक उपयोग के लिए छोड़ दिया गया। इस तरह पान दरीबा की गली के मुहाने पर मक्रवाहिनी मंदिर बना।
💥 वर्तमान
कालांतर में धीरे-धीरे मंदिर जर्जर होने लगा। तब संवत 2024 को इसका पुनर्निर्माण शुरू हुआ और संवत 2026 में इसका निर्माण पूरा हुआ और 7 नदियों के जल से अभिषेक कर प्रतिमा पुनःस्थापित की गई।
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