प्राचीन भारत में सबसे घातक योद्धा कौन है ?
चयन का आधार:
1- प्रशिक्षण
2- अस्त्र-शस्त्र
3- दिव्यास्त्र
4- युद्धों की संख्या
5- विजयें
6- योद्धाजन्य उदात्तता यानि पराजितों के प्रति व्यवहार।
उपरोक्त आधार पर प्राचीन भारत के 10 सार्वकालिक महान योद्धाओ की सूची:
रावण और कर्ण योद्धा तो ठीक थे परंतु दोनों ने अपने योद्धा तत्व का विकास रोक दिया था और दोनों ही अपने प्रतिद्वंदियों से कई बार पराजित हुए और रावण की इंद्र सहित कार्तवीर्य अर्जुन व बाली के हाथों पराजय और कर्ण द्वारा गंधर्वों के युद्ध में कायरतापूर्वक पलायन उन्हें टॉप 10 की सूची से बाहर कर देती है। पराजितों के प्रति रावण और कर्ण का व्यवहार भी योद्धा की गरिमा के विपरीत होता था। यही हाल अश्वत्थामा का भी है।
बलराम यूँ तो बड़े योद्धा थे पर एक तो उन्होंने अपना विकास नहीं किया, दूसरे उनके दिव्यास्त्रों का ज्ञान सीमित था। अतः वे भी टॉप 10 में जगह डिजर्व नहीं करते।
प्राचीन भारत में सबसे घातक टॉप 10 योद्धा इस प्रकार हैं:
🎈10) मेघनाद 'इंद्रजीत'
प्रशिक्षण: शुक्राचार्य और साक्षात महादेव शिव से।
अस्त्र शस्त्र: धनुष व खड्ग। लगभग सभी दिव्यास्त्रों का ज्ञाता।
युद्ध: कई युध्द में इन्द्र सहित समस्त देव जाति का विजेता और इंद्र से अपना अभिषेक करवाकर 'इन्द्रजित' की उपाधि धारण की।
पराजय: अपने विशिष्ट रथ पर अत्यधिक निर्भरता, अगस्त्य द्वारा बनाये गए कुछ नए दिव्यास्त्रों जैसे सूर्यास्त्र, एन्द्रास्त्र आदि से अनिभिज्ञता जो उसकी पराजय और मृत्यु का कारण बनी।
🎈9) द्रोण:
प्रशिक्षण: परशुराम से।
अस्त्र शस्त्र: धनुष, लगभग सभी दिव्यास्त्रों के ज्ञाता सिवाय तीन दिव्यास्त्रों प्रस्वपास्त्र, पाशुपतास्त्र और सुदर्शन चक्र को छोड़कर।
युद्ध: एकमात्र विराट युद्ध एवं महाभारत युद्ध में भाग लिया।
पराजय: क्रमशः अर्जुन व भीम के हाथों पराजित हुए।
पराजित द्रुपद के राज्य अपहरण और अभिमन्यु की कायरतापूर्ण हत्या में भी भागीदार जो इन्हें केवल एक क्रूर सेनापति की पदवी ही दिला सकती है, सर्वश्रेष्ठ योद्धा की नहीं।
🎈8) परशुराम:
प्रशिक्षण: सीधे महादेव शिव से।
अस्त्र-शस्त्र: परशु (फरसा) और अस्त्रों में धनुष। लगभग सभी दिव्यास्त्र सिवाय प्रस्वापास्त्र और पाशुपतास्त्र के। कलरीपयट्टु की एक विधा के संस्थापक।
युद्ध:- हैहयों और उसके समर्थक क्षत्रियों के विरुद्ध 21 युद्ध लड़े और जीते।
पराजय: राम के समक्ष समर्पण और भीष्म के समक्ष प्रस्वपास्त्र के कारण हार स्वीकार करनी पड़ी।
(यहां उन्हें कल्पांत अमर मानने वाला फंडा मान लिया गया है और यदि भीष्म वाले परशुराम को परशुराम पीठ के अन्य पीठाधीश मान भी लें तो भी राम की वैष्णव धनुष चढ़ाने की परीक्षा लेने के बाद स्वयं ही पराजय स्वीकार कर ली थी।)
पराजितों के प्रति व्यवहार भी अत्यन्त कठोर जैसे कि पराजित योद्धाओं के रक्त का कुंड बनाकर उनके खून से तर्पण करना।
🎈7) लक्ष्मण:
प्रशिक्षण: क्रमशः वसिष्ठ, विश्वामित्र और अगस्त्य द्वारा।
अस्त्र शस्त्र: धनुष और खड्ग। समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान।
युद्ध: छोटे बड़े कई युद्धों में भाग लिया, परशुराम को चुनौती और मेघनाद जैसे उस युग के श्रेष्ठतम योद्धा को पराजित कर उसका वध किया।
पराजय: परंतु लव कुश के हाथों पराजय।
पराजितों के प्रति उदार।
🎈6) प्रद्युम्न:
प्रशिक्षण: अर्जुन और कृष्ण द्वारा। भारत के 5 योद्धाओं में से एक जो चक्रव्यूह का भेदन कर सकते थे।
मुख्य आयुध: धनुष व खड्ग। कृष्ण के अतिरिक्त एकमात्र व्यक्ति जो कृष्ण के सुदर्शन चक्र का संचालन कर सकते थे। मायायुद्ध में भी प्रवीण।
युद्ध: कई युद्ध लड़े और विजयी भी हुये विशेषतः बाणासुर युद्ध के समय उसकी पक्ष से लड़ने आये कार्तिकेय को भी पराजित किया।
पराजय: पांडवों के अश्वमेध यज्ञ के समय एक असुर से पराजित हुए।
पराजितों के प्रति सामान्य व्यवहार।
🎈5) हनुमान:
प्रशिक्षण मूल रूप से मरुद्गणों और विवस्वान अर्थात सूर्य द्वारा। (आकाश के सूर्य नहीं बल्कि देव जाति के एक देव सूर्य द्वारा)
अस्त्र-शस्त्र: गदा और परिघ विशेष प्रिय अस्त्र।
युद्ध: विवस्वान को अपनी बहुत कम आयु में पराजित कर बंदी बना लिया (जिसे काव्यरूप में सूर्य निगलने के रूप में वर्णित किया गया)।
मेघनाद, कुम्भकर्ण, रावण और यहां तक कि स्वयं श्रीराम का भी सफलता पूर्वक बराबरी से सामना किया।
महादेव शिव को कार्तिकेय, गणेश और वीरभद्र आदि गणों सहित अकेले पराजित किया।
द्वापरयुग में गरुड़ व सुदर्शन चक्र को भी निस्तेज किया।
पराजितों के प्रति गरिमापूर्ण व्यवहार।
पराजय: दिव्यास्त्रों का प्रतिरोध में प्रवीण अर्थात उनसे बचाव के तरीकों में माहिर परंतु दिव्यास्त्रों के व्यवहारिक उपयोग में प्रवीण होने का जिक्र नहीं मिलता हालांकि उन्होंने या उनके नाम पर कपीन्द्रास्त्र नाम के एक दिव्यास्त्र का विकास किया था। रामास्त्र के प्रयोग से प्रद्युम्न ने उन्हें बांधकर पराजित भी किया।
🎈4) अर्जुन:
प्रशिक्षिण: क्रमशः द्रोण, इन्द्र एवं साक्षात महादेव द्वारा।
मुख्य अस्त्र: धनुष व खड्ग। प्रस्वपास्त्र और सुदर्शन चक्र को छोड़कर सारे अस्त्रों का ज्ञान। सबसे भयंकर दिव्यास्त्र ब्रह्मशिरस व पाशुपतास्त्र।
युद्ध: द्रुपद के विरुद्ध अभियान से लेकर महाभारत और फिर अश्वमेध यज्ञ तक निरंतर युद्ध।
पराजय: महादेव रुद्र से परास्त हुये। भीष्म के विरुद्ध कमजोर सिद्ध हुए। इसके अलावा अपने पुत्र वभ्रुवाहन और अंत में आभीरों (अहीरों) के हाथों पंजाब में हुई पराजय बड़ी पराजयें थीं।
इंद्र, हनुमान व कृष्ण के विरुद्ध युद्ध में बराबरी परंतु मद्रों की राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में धनुर्विद्या की प्रतियोगिता में कृष्ण के सामने असफल हुये।
🎈3) भीष्म:
प्रशिक्षण: परशुराम व वसुओं द्वारा।
मुख्य अस्त्र शस्त्र: धनुष तलवार एवं गदा।
अन्य दिव्यास्त्रों के साथ वसुओं से प्राप्त अमोघ विशिष्ट प्रस्वपास्त्र जिसके कारण परशुरामजी को भी पराजय स्वीकारनी पड़ी।
युद्ध: हस्तिनापुर के सम्राट चित्रांगद की हत्या करने के बाद गंधर्व सेनायें भीष्म की आगमन की बात सुनते ही भाग खड़ी हुईं।
जब सत्यवती को हासिल करने कामांध राजा ने आक्रमण किया तो भीष्म ने अकेले ही जाकर उसका वध कर दिया।
काशी में अंबा, अंबिका व अंबालिका के स्वयंवर में शाल्व सहित पूरे भारत के राजाओं को अकेले परास्त किया।
उनके जीवन का सबसे भयानक युध्द परशुराम से हुआ जो इक्कीस दिन चला जिसमें प्रस्वपास्त्र के सम्मुख अंततः परशुरामजी को पराजय स्वीकार करनी पड़ी।
गांधार पर धृतराष्ट्र के लिए गांधारी को लाने के लिए भी अभियान अकेले ही किया।
बाद में महाभारत में भी अपराजेय थे।
महाभारत में सिर्फ कुछ समय भर के लिये पूर्ण क्षमता से युद्ध करने पर अर्जुन पराजित हो गये और कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए विवश कर दिया।
विराट युद्ध में भी अर्जुन का राजकुमार उत्तर को कहना था कि उन्हें विश्वास नहीं है कि भीष्म पराजित हुए हैं यानि कि वे अचेत नहीं हुए हैं।
उनकी यह चुनौती थी कि महादेव व कृष्ण को छोड़ संसार में कोई अन्य उन्हें परास्त नहीं कर सकता था।
पराजय: उन्होंने स्वयं माना कि कृष्ण उन्हें पराजित कर सकते हैं। इसके अलावा विराटनरेश के पुत्र निःशस्त्र श्वेत पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उसकी हत्या उनके योद्धा जीवन पर एक धब्बा है।
🎈2) श्रीराम:
प्रशिक्षण: वसिष्ठ, विश्वामित्र व अगस्त्य द्वारा।
मुख्य अस्त्रशस्त्र: धनुष और खडग। समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान और स्वयं भी एक नये दिव्यास्त्र 'रामास्त्र ' का निर्माण किया जिसका ज्ञान भविष्य में लोग विस्मृत कर गये। हालांकि प्रद्युम्न ने एक बार इसके लघु रूप का प्रयोग हनुमान द्वारा बनाये गये कपीन्द्रास्त्र के विरुद्ध किया था।
युद्ध: कई युद्धों के विजेता विशेषतः रावण के विरुद्ध।
हस्तिनापुर के पुरुवंशियों को परास्त कर समस्त उत्तरीभारत पर सार्वभौम सत्ता स्थापित की।
गीता में कृष्ण ने इन्हें शस्त्र धारियों में सर्वश्रेष्ठ कहा है। (कुछ गीता के राम को परशुराम कहते हैं पर वे परशुराम और भार्गव के नाम से ही उल्लिखित किये गए हैं केवल राम के नाम से नहीं।)
पराजय: एक भी नहीं लेकिन हनुमान के विरुद्ध युद्ध टाई रहा इसलिये द्वितीय स्थान।
🎈1) श्रीकृष्ण:
प्रशिक्षण: प्रारम्भ में स्वप्रशिक्षण और बाद में दिव्यास्त्रों का प्रशिक्षण क्रमशः सांदीपनि, परशुराम से और सुदर्शन चक्र की प्राप्ति देव अग्नि से।
कलारीपट्टु के एक और स्कूल के रूप में कुंगफू की एक नई शाखा का विकास और गोपों को प्रशिक्षित कर नारायणी सेना की नींव डाली।
ज्ञात विश्व के समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान।
मुख्य अस्त्र शस्त्र: चक्र, धनुष, खड़ग और गदा। विशिष्ट दिव्यास्त्र के रूप में सुदर्शन चक्र जिसे लौकिक और देवास्त्र दोंनों रूपों में प्रयुक्त किया जा सकता था।
विश्व में शिव के अतिरिक्त दूसरे योद्धा जिन्हें 'वैष्णव ज्वर' के रूप में 'Bio-weapons' का भी ज्ञान था।
युद्ध: जरासंध के अठारह आक्रमण व कालयवन के कैंची आक्रमण का सफलता पूर्वक सामना किया।
मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में प्रमाणित हुआ की वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे क्योंकि उस प्रतियोगिता में अर्जुन भी असफल हो गये।
पूरा जीवन युद्धों में। सदैव अपराजित।
महादेव शिव तक को पराजित किया और अकेले ही इन्द्र सहित समस्त देवसेना को खदेड़ दिया।
जीवन में केवल एक बार अर्जुन से युद्ध बराबर रहा और वह भी उनकी स्वयं की इच्छा से।
इसलिये भारत के प्राचीन काल के सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं.. "श्री कृष्ण"!!
स्रोत:-
रामायण
महाभारत
हरिवंश
पद्मपुराण
गर्गसंहिता

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