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7/01/2021

राम भरत मिलन से मिला सबसे बड़ा संदेश

   
                           
   

राम भरत मिलन से मिला सबसे बड़ा संदेश




श्रीराम व भरत के चित्रकूट में मिलन व उनके प्रेम को कौन नही जानता। जब भगवान श्रीराम को माता कैकेयी व मंथरा के छल के द्वारा 14 वर्षों का वनवास हुआ व भरत को यह सब पता चला तो वह सब कुछ छोड़कर सीधे अपने भाई श्रीराम को लेने चित्रकूट पहुँच गए । उनके साथ अयोध्या के राज परिवार के सदस्य गण, राजगुरु, मंत्री व माता सीता के मायके से राजा जनक व सुनैना भी गए थे ।

चित्रकूट में भगवान श्रीराम माता सीता व लक्ष्मण के साथ एक कुटिया बनाकर रह रहे थे  व वही पर उनका व भरत का मिलन हुआ था । जब भरत ने उनसे पुनः अयोध्या चलने का आग्रह किया तो श्रीराम ने मना कर दिया । भरत अपने भाई श्रीराम से अत्यधिक प्रेम करते थे इसलिये उन्होंने सबके सामने उनसे क्षमा मांगी व अयोध्या का राज सिंहासन उन्हें दिया ताकि वे अयोध्या चल सके।

श्रीराम के बार-बार मना करने व भरत के हठ करने के कारण गुरुजन भी इसका निर्णय नही ले पा रहे थे। जब भगवान श्रीराम ने अयोध्या जाने को मना कर दिया व अपने स्वर्गीय पिता दशरथ के वचनों से बंधे होने का कारण बताया तो भरत उनके वन में रहने की बात मान गए किंतु उन्होंने वही पर अपनी कुटिया बनाने व श्रीराम की सेवा करने का निर्णय किया । यदि भरत वहां रहते तो अयोध्या का राज सिंहासन सँभालने में समस्या आती इसलिये इसका निर्णय महाराज जनक को सौंपा गया ।

महाराज जनक ने भगवान शिव को साक्षी मानकर भरत के पक्ष में निर्णय सुनाया । उनके अनुसार कर्तव्य व धर्म को सबसे महान माना जाता हैं लेकिन प्रेम व भक्ति किसी स्वार्थ भावना के बिना किया जाता है। प्रेम के अंदर किसी भी प्रकार का कपट इत्यादि नही छिपा होता है। जब यही प्रेम अत्यधिक बढ़ जाता है तो वह भक्ति का रूप ले लेता है। चूँकि भरत भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त थे इसलिये प्रभु श्रीराम को अपने भक्त के सामने झुकना ही पड़ेगा। यही सोचकर राजा जनक ने भरत के पक्ष में निर्णय सुनाया।

निर्णय सुनाने के साथ ही राजा जनक ने भरत से पूछा कि तुम अपने प्रेम के लिए क्या दे सकते हो । इस पर भरत ने प्रभु श्रीराम के लिए अपने प्राणों को त्याग देने तक की बात कह डाली। इस पर राजा जनक ने उन्हें समझाया कि प्रेम में अपने प्राणों का त्याग देना सरल है क्योंकि इससे हम सांसारिक बंधनों से उसी समय मुक्त हो जाते है किंतु अपने प्रेम के लिए जीना व त्याग उतना ही कठिन होता हैं।

राजा जनक के अनुसार प्रेम के भी अपने विधान होते है व यदि व्यक्ति निस्स्वार्थ प्रेम करता है तो वह अपने प्रेमी से कभी कुछ आशा नही रखता। इसलिये वह कुछ लेने के उद्देश्य से नही अपितु हमेशा कुछ देने के उद्देश्य से ही प्रेम करता है। उन्होंने भरत के प्रेम को ही आधार बनाते हुए उन्हें अपना प्रेम सिद्ध करने को बोला व आदेश दिया कि यदि वे श्रीराम से सच्चे मन से प्रेम करते हैं तो उन्हें अपने प्रभु के जीवन को और कठिन नही बनाना चाहिए, उनको किसी चीज़ के लिए विवश नही करना चाहिए व उनके आदेश का हमेशा पालन करना चाहिए।

राजा जनक के ऐसे वचन सुनकर भरत की आखें खुल गयी । अभी तक भरत प्रेम में डूबे हुए अप्रत्यक्ष रूप से केवल अपने ही हित, प्रतिष्ठा का सोच रहे थे लेकिन राजा जनक के समझाने के पश्चात उन्होंने प्रभु श्रीराम की मन की व्यथा को समझा। इसलिये उन्होंने उसी समय प्रभु श्रीराम के चरणों में बैठकर आज्ञा ली व पुनः अयोध्या जाने का निश्चय किया ।

साथ ही भरत ने स्वयं को कभी राजा नही माना अपितु वे जाते समय भगवान श्रीराम की चरण पादुका लेकर गए ताकि उन्हें श्रीराम के सांकेतिक रूप में राज सिंहासन पर रख सके। इस प्रकार श्रीराम व भरत का मिलन हमें यह संदेश देता है कि एक मनुष्य के लिए यदि प्रेम सच्चा हो तो उसके लिए त्याग ही सबसे बड़ा होता है ।

यदि हम इसे आज के संदर्भ में देखे तो हमें इस प्रकार प्रेम करना चाहिए जिससे हमारे प्रेमी को किसी प्रकार की परेशानी ना हो व उसे दुःख ना भोगना पड़े । कभी-कभी हम प्रेम में इतने अंधे हो जाते है कि हमें अपने प्रेमी के मन की व्यथा समझ नही आती व हम सोचते है कि हम यह सब उसके लिए ही कर रहे है लेकिन वास्तव में हम केवल अपना भला ही सोच रहे होते है। यदि आपका प्रेम सच्चा होता है तो आप अपनी आखों से नही अपितु अपने प्रेमी की मन की आखों से उसकी पीड़ा को समझने का प्रयास करेंगे व हर वह कार्य करेंगे जिससे आपके प्रेमी का जीवन सरल बने।


जय श्री राम

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