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6/25/2021

रानीदुर्गावती से घबराते थे मुगल, इस तरह वीरगति को प्राप्त हुईं थी रानीदुर्गावती

   
                           
   

रानीदुर्गावती से घबराते थे मुगल इस तरह वीरगति को प्राप्त हुईं थी रानीदुर्गावती




जबलपुर। चारों तरफ से तलवारें और तीर चल रहे थे। सैनिकों का शोर इतना था कि चीखें भी उसमें दब रहीं थीं। ऐसे में सैनिकों के वेश में एक महिला भी युद्ध कर रही थी। पहला तीर आकर महिला के कंधे पर लगा। दूसरा तीर आकर आंख में लगा। इसके बाद भी महिला ने युद्ध करना नहीं छोड़ा अंत में जब सेना हारने लगी तो महिला ने खुद को कटार से मौत के घाट उतार किया। यह महिला कोई साधारण महिला नहीं बल्कि गोंडवाना साम्राज्य की रानी दुर्गावतीं थीं।


रानी दुर्गावती केवल वीरांगना ही नहीं थी, बल्कि मां, पत्नी और कुशल प्रशासक भी थी। जिनकी युद्धकला के आगे मुगल भी नतमस्तक थे। रानीदुर्गावती का जन्म बांदा जिले के कालिंजर किले में 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। इस दिन दुर्गा अष्टमी थी, इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। दुर्गावती की शादी गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह मडावी के पुत्र दलपत शाह से हुई थी। दोनों परिवारों की जातियां भिन्न थीं फिर भी रानीदुर्गावती के सौंदर्य और पराक्रम के कारण राजा संग्राम शाह ने उन्हें अपनी पुत्रवधु के रूप में अपनाया।


शादी के चार साल बाद ही दलपत शाह की मृत्यु हो गई। इस दौरान दुर्गावती की गोद में तीन साल का पुत्र नारायण था। रानी ने खुद आगे आकर राज्य का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्होंने कई जन उपयोगी निर्माण कराए। कुओं, बावडिय़ों, तालों का निर्माण किया गया। गोंडवाना राज्य पर मालवा के मुगल शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया लेकिन उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी। धन संपन्न गोंडवाना साम्राज्य पर अकबर की भी नजर थी। उसने अपने रिश्तेदार आसफ खां को गोंडवाना राज्य पर हमला करने के लिए भेजा।


अकबर के सेनापति आसफ खां ने गोंडवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया। जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया गया। रानी पुरूष वेष में खुद मैदान मे कूद पड़ीं। मुगलों के तीन हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए। रानी को भी नुकसान हुआ। अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। अपना पक्ष कमजोर होते देख रानी ने पुत्र को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। इसी दौरान उनके शरीर में तीर चुभने लगे। आंख में तीर लग गया। अंत समय आता देख रानी ने अपने वजीर आधार सिंह से आग्रह किया कि वह उनकी गर्दन काट दे। आधार सिंह ने इस पर असमर्थता प्रकट कर दी। रानी ने खुद कटार निकाली और अपने सीने में घोंप ली। इस तरह रानी दुर्गावती वीरगति को प्राप्त हुईं।

बलिदान दिवस पर कोटी कोटी वंदन 

*दुर्गावती जब रण मे निकली*

*हाथो मे थी  तलवारें दो*

*धरती कंपी आकाश हीला* 

*जब चलने लगी तलवारें दो*

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