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6/13/2021

झाला मन्ना

   
                           
   

झाला मन्ना




मेवाड़ के स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा झाला बीदा जी का जन्म- ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीया विक्रम संवत् 1597 (15 मई, 1542) आज ही के दिन हुआ था। 

लेखक - प्रताप सिंह झाला, तलावदा


 जस वरणन हो व्है न जठै, 

                वा धरती मर जाय ।

   संत सती अर शूरमा, 

               ऐ ओझल व्है जाय ।।

                                                                                              जय एकलिंगनाथजी जी, अपने महान पुरूषार्थी, पूर्वजों की प्रतिबद्धता को समर्पित स्वाभिमानी , कर्तव्यपरायण, निष्ठावान,  महान वीर योद्धा झाला बीदा जी ! 

     एक ऐसा व्यक्तित्व जो संकट की घड़ी में भी भावी समय में नेतृत्व की आवश्यकता को समझने वाला, युगदृष्टा , मनाने पर भी नही माने वो  " झाला मान " और मना करने पर भी नही माने वो  "झाला मन्ना"  एवम् ऐसे सभी आर्यावर्त की सनातन संस्कृति के संवाहक पुरोधा मेवाड़जन और  पुरूषार्थी योद्धा जिन्होंने मातृभूमि की अस्मिता, स्वाधीनता और स्वतंत्रता के लिए हल्दी घाटी युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी । आज मैं उन सभी वीर योद्धाऔ को प्रताप जयन्ती के एक दिवस पुर्व स्मरण करते हुए सम्यक भावाञ्जंली देने का एक छोटा सा प्रयास करने का साहस कर रहा हूं ?  प्रातः स्मरणीय, जन नायक महाराणा प्रताप की जयन्ती के पुर्व दिवस पर हम सभी मेवाड़जन पुष्पांञ्जलि अर्पित करने का सामुहिक प्रयास करते है, तो उन सभी वीर योद्धाओं के निमित्त हमारी तरफ से उन्है यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी । मेवाड़जन और प्रताप दोनो एक दूसरे के पूरक है ? जैसे दिन और रात ,धूप और छांव आदि ।

    धन्य है, महाराणा प्रताप जैसे आदर्श जन नायक , जो मेवाड़ की जनता के प्रति समर्पण एवम्  संवेदनशीलता के कारण उसके हृदय में बसता है। इसी उज्ज्वल चरित्र के कारण , उस व्यक्ति के प्रति मेवाड़ के हर जाति, वर्ग, पंथ और संप्रदाय का व्यक्ति संकट की घड़ी में सहज ही अपने प्राण न्योछावर करने के लिए सदा तत्पर रहा । " झाला मान " तो सिर्फ उन सभी वर्गों के युद्ध मे आत्मोतसर्ग करवाले वीर योद्धाऔ को संबोधित करने हेतु एक आदर्श प्रतीकात्मक नायक के रूप में एक संबोधन का पर्याय मात्र है। मेवाड़ के जन जन की यही पुकार थी , कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण बनाये रखने  , एवम् मेवाड़ के  भावी संघर्ष को जारी रखने के लिए नेतृत्व प्रदान करने हेतु  महाराणा प्रताप के प्राणों की रक्षा अति आवश्यक है ? और युद्ध मे आत्मोतसर्ग करवाले वीर योद्धा मृत्यु को गले लगाने के उपरांत भी उस लक्ष्य को हासिल करने में सफल हुए ।

   आज उसी क्रम में ज्येष्ठ शुक्ला, द्वितीया तिथि का भी बड़ा महत्वपूर्ण योगदान जीसे नजर अंदाज नही किया जा सकता है ? आध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से देखा जाए तो पृथ्वी पर महान त्यागी आत्माओं का अवतरण उत्तरायण के सूर्य और उत्तरायण के सूर्य में प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के बाद, द्वितीया से पूर्णिमा तिथि तक के समय में ही होता आया है । इसीलिए आज शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि का दिन उन सभी महान योद्धाओं को समर्पित करते है, जिन्होंने भारतीयसंस्कृति की अस्मिता और मानवीय नैतिक मूल्यो की रक्षा के निमित्त, 18 जून, 1576 ई. के दिन हल्दी घाटी समरांङ्गण में मात्र भूमी की रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर दिए और इस मेवाड़ के स्वाधीनता संघर्ष को निरंतर जारी रखने हेतु, बहादुरी के साथ कूटनीतिक तरिके से अपने जन नायक महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकालने में सफलता हासिल की 


  ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया ( 13 जून , 2021 ई. ) के दिन उन्ही प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप की जयन्ती का अवसर है । ऐसे शुभ अवसर पर, मै खानवाह युद्ध के महा सैन्य नायक, झाला अज्जा जी और हल्दी घाटी समरांङ्गण के महा योद्धा झाला मान सिंह जी का वंशज प्रताप सिंह झाला, तलावदा, उन महान योद्धाओं के आत्मा की शांति के लिए अनन्य भाव के साथ हार्दिक पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ! 


    धन धरती लीधी कितां, 

              लीधी संपत ठांण ।

    वीर गती पातल तणी, 

             तै लीधी मकवांण ।। 1


भावार्थ - राजतंत्र में बतौर जागीर, धरती, धन और संपत्ति तो बहुत से लोगोने ली, लेकिन अपने नायक की प्राण रक्षा के निमित्त युद्ध मे वीर गती का वरण तो झाला मान ने ही किया ।


     उण उमराव बणावियौ, 

           तूं रण बणियौ रांण ।

     तूं विध नै धारै नहीं, 

        कद अरियां मकवांण ।। 2 


हे, झाला मान महाराणा ने तो तुझे मेवाड़ का उमराव बनाया, लेकिन तूं तो युद्ध मे स्वयं महाराणा बन गया । मुझे ऐसा लगता है, कि तूं विधाता को भी नही मानता है , तो उन दुश्मनों की तो तेरे सामने ओकात ही क्या है ।


     मान सुते ही बण गयो, 

            हिंदवां रौ हम गीर ।

     करता कर कर नह सके, 

            मान तणी तसवीर ।। 3


हे मान, तूं तो युद्ध क्षेत्र मे नायक बनकर खुद स्वयं ही हिंदुओं का रक्षक बन गया, युद्ध क्षेत्र मे विधाता चित्रकार ने तेरे अनेको दृश्य देखे, दृश्यों देखते देखते और चित्र बनाते बनाते विधाता भी थक गया, फिर भी तेरे शौर्य का सही चित्र नही बना पाया ।


     दूण उजाळै जग हुवौ, 

         हरख हुऔ हिंदवांण ।

     इक सूरज राणो पतौ, 

            बियौ मान बखांण ।। 4


हल्दी घाटी युद्ध क्षेत्र मे घमासान मचने से आज दुगुना उजाला देख कर हर्ष की लहर दौड़ गई । क्योंकि उस युद्ध मे एक हिन्दुआ सूरज महाराणा प्रताप पहले से ही मौजूद था, और युद्ध के दौरान झाला मान के रूप मे दुसरे सूर्य के उदय हो जाने से आज दुगुना उजाला हो गया ।


     दहुं दिनकर दिन राख सौ, 

          ऊ जद गयौ अथांण ।

     इक सूरज पातल हतौ, 

           फिर दूजौ मकवांण ।। 5


हल्दी घाटी युद्ध के दौरान आकाश में दैनिक भास्कर / सूर्य जब अस्ताचल की ओर बढ रहा था, तब उसे थोड़ी देर के लिए क्षोभ उत्पन्न हो गया , कि मेरे अस्त हो जाने के बाद संसार में घोर तिमिर / अंधेरा छा जायेगा? लेकिन थोड़ी देर में ही उसे यह अहसास हो गया, कि मेरे पिछे अभी भी दो सूर्य उदयमान है? एक हिन्दुआ सूर्य महाराणा प्रताप और दुसरा सूर्य झाला मान ।


    हळद घाट रण दिट्ठिया , 

           इक साथै त्रय भांण ।

    राण उदय रवि अस्त गा, 

           मध्य तप्त मकवांण ।। 6


कवि कहता है, कि उस दिन हल्दी घाटी युद्ध के समय एक साथ तीन तीन सूर्य एक साथ सूर्य उदित हो रहे थे ? उनमें एक हिंदुआ सूर्य महाराणा प्रताप का उदयमान हो रहा था, तो दूसरा संवत्सर सूर्य आकाश मार्ग में अस्ताचल की तरफ आगे बढ रहा था, उसी समय झाला मान रूपी तीसरा सूर्य, इन दोनो सूर्यो के मध्य , हल्दी घाटी युद्ध क्षेत्र में समर कर तप रहा था ।


    छत्र चमर लिधा मरण, 

            हळ्दी घाट सुथांन ।

    गादी पर बैठौ नही, 

             हय पर बैठौ मान ।। 7


कवि कहता है, हल्दी घाटी युद्ध क्षेत्र में झाला मान ने छत्र चमर  (मेवाड़के राज्य चिन्ह ) समरांङ्गण में समर करने के लिए लिये थे, राज्य गद्दी पर बैठने के लिए नही लिये थे । झाला मान राज्य चिन्ह धारण कर मेवाड़ की राज्य गादी पर नही बैठा, वह तो समरांङ्गण में आक्रांताओ से युद्ध करने के निमित्त राज्य चिन्ह धारण कर घोड़े पर बैठा ।


    अभिमन्यु नै काढ न सक्या, 

        द्रोण रच्यौ जिण दांण ।

    मुगल चक्र सूं रांण नै , 

           तै काढ्यौ मकवांण ।। 8


महाभारत के युद्ध में सभी पांडव मिलकर भी व्यू चक्र से अकेले अभिमन्यु को बाहर नही निकाल पाये, लेकिन ? हे, झाला मान तैने तो अकेले ही महाराणा प्रताप को मुगल चक्र से सुरक्षित बाहर निकाल दिया ।


    हेक बांह करता करी, 

           दोय हुई जिण दांण ।

    सकत सिंह हैवर दियौ, 

          सीस दियौ मकवांण ।। 9


प्रताप की प्राण रक्षा हेतु एक सहायक बांह के रूप मे परमात्मा ने भाई के रूप में शक्ति सिंह को भेज दिया,  संकट के समय शक्ति सिंह ने प्रताप को अपना घोड़ा उपलब्ध करवाया, लेकिन प्रकृति के विलक्षण संयोग से झाला मान के रूप में दूसरी बांह उदय हुआ, उसने तो महाराणा प्रताप के प्राणों की रक्षा के निमित्त अपने प्राण न्योछावर कर दिए ।


   आ बापी झालां अजब ,

           छत्र चमर सुरथान । सांगा सूं अजमल(अज्जा) लिया, 

         पातल सूं फिर मान ।। 10 


यहां भी प्रकृति का क्या विलक्षण और अद्भुत संयोग है, कि खानवाह के युद्ध मे "  झाला मान " के प्र- प्रपितामह अज्जा जी ने मेवाड़के राज्य चिंह धारण कर युद्ध में वीर गती को प्राप्त हुए, लेकिन ऐसा ही संयोग पुनः हल्दी घाटी युद्ध मे झाला मान के समक्ष उद्घाटित होता है? जहां " झाला मान " एक बार फिर मेवाड़के राज्य चिंह धारण अपने पुरूषार्थी पुरखों की भूमिका को दोहराते हुए, हल्दी घाटी युद्ध में अपने प्राण न्योछावर कर वीर गती को प्राप्त होते है । 


अरियां नूं झाला दिया, 

          पाछा दिया न पांव ।

जिंण हूं झाला देश दै, 

      अब झाला फिर आव ।। 11 


हे, झाला वीर तैने मातृ भूमि की स्वाधीनता के लिए युद्ध करते हुए,  युद्ध मे आक्रांताओ के सिर काट कर दुश्मनों को काफी छकाया, इसीलिए एक बार फिर देश को  ऐसे वीर योद्धा की आवश्यकता है ? हे झाला वीर एक बार फिर इस पृथ्वी पर वापस आओ ।


उँचौ झंडो हिंद रौ , 

            उँची मूंछ अणीह ।

उँची कीरत राण री, 

           राखी मान घणीह ।। 12 


धन्य है, हे झाला वीर तैने भारत वर्ष की संस्कृति के झंडे को, भाले की नोक की तरह अपने मूंछ की शान के साथ मेवाड़ के महाराणा की कीर्ति को हमेशा उज्ज्वल बनाये रखा ।


के गंगा जमना करै, 

           करै गोमती स्नान । 

तै धारा तीरथ कियौ, 

           हळ्दी घाटी मान ।। 13 


हे, झाला मान लोग तो गंगा, यमुना और गोमती मेंं पवित्र स्नान करने के लिए तीर्थ यात्रा पर जाते है ? लेकिन तैने तो धर्म और संस्कृति की रक्षा के खातिर, हल्दी घाटी में धर्म के खातिर रक्त बहाकर, हल्दी घाटी को ही संगम स्नान का धारा तीर्थ बना दिया ।

             *****  झाला मान से 


जात धरम तज वरग मन,

             वृद्ध शिशु नर नारीह ।

जद् जद् भारत जुंझसी, 

               पातल जय थारीह ।।


हे, जन नायक प्रताप, जब जब भी भारत वर्ष की आजादी, अस्मिता और संस्कृति पर प्रहार होगा, तब तब भारत वर्ष का हर व्यक्ति जाति, वर्ग, पंथ और संप्रदाय के मतभेदों को भूलकर , पुर्व - पूर्वाग्रहों से उपर उठकर एक आवाज से  तुज जैसे आदर्श व्यक्तित्व को बार बार याद करेगा ।

महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से लेकर महाराणा अमर सिंह जी के समय फरवरी, 1615 ई. में मेवाड़ - मुग़ल सम्मान जनक मैत्री  संधि , जिसके विषय में अकबर के समय  1567 - 68 में युद्ध के दौरान मेवाड़ के जागीरदारों द्वारा अकबर के साथ शर्ते रखी गई थी , उन्ही शर्तो को महाराणा प्रताप ने अकबर के चारों संधि प्रस्तावों के समय दोहराया था ? अंततोगत्वा उन्ही बुनियादी शर्तो के आधार पर उपरोक्त सम्मान जनक तरिके के साथ मेवाड़ - मुग़ल मैत्री पूर्ण संधि की गई । इसलिए हम यह कह सकते है, कि 1567 ई. से लेकर फरवरी,  1615  ई. तक लगभग  48 वर्षो तक का लगातार मेवाड़ - मुग़ल युद्ध संघर्ष किसी व्यक्ति के निजी स्वार्थ, अहमं या जमीन के लिए नही लड़ा गया था! यह युद्ध भारतीय सांस्कृतिक मानवीय नैतिक मूल्यो की रक्षा, मातृभूमि की अस्मिता, स्वाधीनता के बुनियादी सिद्धांतों के संरक्षण के लिये महाराणा प्रताप के नेतृत्व और सान्निध्य में अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण बनाये रखने हेतु लड़ा गया युद्ध संघर्ष का था ।

      यह आलेख तत्कालीन मेवाड़ के उन सभी जन समुदाय, प्राणी मात्र को समर्पित है ?  जिन्होंने परोक्ष और अपरोक्ष रूप से युद्ध में अपने प्राण न्योछावर किये या फिर उस स्वाधीनता संग्राम में सहयोग किया ।

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