झाला मानसिंह
हल्दीघाटी का समर दृश्य, बिभत्स खून की होली थी,
राणा की सेना से ज्यादा, मुगलो की घातक टोली थी।२
भाले का वेग भयंकर था, आंधी के जैसा डोला था,
राणा को देख मुगल सैनिक बस, अल्लाह अल्लाह बोला था। २
राणा के शिर पे राजमुकुट, ये देख शत्रु पहेचाना था,
सो सो मुगलो के तीरो का, राणा पे सिर्फ निशाना था। २
टकराते तीर कवच से थे, फिर दाव शत्रु ये खेला था,
थी चारो ओर मुगलसेना, महाराणा वीर अकेला था। २
रण क्षेत्र स्वयं ये दृश्य देख, भीतर भीतर शर्मिंदा था,
लेकिन राणा का रक्षक, झाला मान अभी तक जिंदा था। २
झाला की रग रग मे जिंदा, बस पुरखो की परपाटी थी,
किस्मत का खेल अजब देखो, राणा जैसी कदकाठी थी। २
स्वामी पर संकट देख वीर, साहस की हद से गुजर गया,
मुगलो की सेना चीर चीर, वह वीर समर मे उतर गया। २
राणा को खींच किनारे फिर, राणा से राजमुकुट मांगा,
राणा ने मना किया लेकिन, वह झाला मान नही माना। २
भिड गया अकेला मुगलो से, था शोर घना तलवारो का
मरने से किंचित डरा नहीं, बेटा झाला सरदारो का। २
थी स्वामीभक्ति की वो मिशाल, साहस की अपर गवाही था
राणा पे जान लुंटा बैठा, राणा का वीर सिपाही था। २
इतिहास पढेगा यह जो भी, मेवाड धरा पर आयेगा,
राणा की प्रतिमा से पहले, झाला को शीश नमायेगा। २

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