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5/12/2021

जिस भक्त को परमात्मा के धाम में जगह मिली वह स्थान इन्द्र से भी बहुत ऊंचा है

   
                           
   

जिस भक्त को परमात्मा के धाम में जगह मिली वह स्थान इन्द्रसे भी बहुत ऊंचा है




सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।

 रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥


ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं। 


भगवान श्री कृष्ण कहते हैं जो मुझे प्राप्त होता है वह संसार में लिप्त नहीं होता,क्यू की जब युगों की हजार चौकड़िया व्यतीत होती है, तब जहां वास्तव में एक दिन होता है।  तथा हजारों चोकादिया की एक रात होती है।  जहां इतने बड़े दिन रात हो वहां उन को वे भाग्यवान ही देखते हैं।  जिनका क्षय नहीं होता, वे स्वर्गस्ता चिरंजीवी है। 

 वहां दूसरे देवताओं की प्रतिष्ठा का कोई मोल नहीं है, मुख्य इंद्रदेव की ही दशा देखो कि दिन में चौदह हो जाते हैं।  ब्रह्मा के आठों पहर  को जो अपने नेत्रों से देख रहे हैं, उन्हें अहोरात्रविद कहते हैं। 

 ॥17॥


अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।

 रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥


संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं।  और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं। 


उस ब्रह्मभवन में जब दिन निकलता है उस समय निराकार में से विश्व इतनी बाहुल्य ता  से प्रकट होता है कि उसकी गणना नहीं की जा सकती। पश्चात जब दिन के चारों प्रहर निकल जाते हैं तब यह आकार समुद्र सूखने लगता है, और फिर प्रातकाल होते ही वैसा का वैसा भर जाता है। 

 

 ॥18॥


भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

 रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥


हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है। 


शरद काल के आरंभ में जैसे मेघ आकाश में विलीन हो जाते हैं, और ग्रीष्म ऋतु के अंत में जैसे फिर प्रकट होते हैं।  वैसे ही ब्रह्मा के दिन के आरंभ में यह भूत सृष्टि का समुदाय प्रकट होकर सहस्त्र युग तक बना रहता है।  तत्पश्चात जब रात्रि का समय होता है तब विश्व अव्यक्त में लीन हो जाता है।  कहने का मतलब यह जगत की उत्पत्ति और प्रलय ब्रह्मभवन के दिन रात में ही होती है।

 उसकी श्रेष्ठता इतनी है कि वह सृष्टि के बीच का भंडार है।  और जन्म मरण के माप की सीमा है।  यह त्रैलोक्य जो उस ब्रह्मभवन का ही विस्तार है, सो ब्रह्मा का दिन उदय होते ही एकदम रचा जाता है, और रात्रि को लीन हो जाता है। 

 ॥19॥

जो भगवान के प्रिय भक्त है, जो ब्रह्मभुवन रहते हैं, वह संपूर्ण विश्व का उदय और अस्त अपने ही नेत्रों से देखते हैं।


अस्तु। 


सद्गुरु नाथ महाराज की जय।

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