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10/29/2020

जीवन एक तरह का धन है

   
                           
   

जीवन एक तरह का धन है




जीवन एक सीढ़ी है—— ध्यान के मंदिर की। सीढ़ी पर मत बैठे रहो। सीढ़ी का अपने में कोई अर्थ नहीं है। सीढ़ी का प्रयोजन इतना ही है कि तुम मंदिर में पहुंच जाओ। द्वार पर मत जकड़कर बैठ जाओ। द्वार व्यर्थ है। मंदिर में प्रवेश करो। मंदिर का देवता भीतर विराजमान है। जीवन को सीढ़ी बनाओ। जीवन को मार्ग समझो। जीवन मंजिल नहीं है। जीवन गंतव्य नहीं है। जीवन मिल गया तो सब मिल गया, ऐसा मत समझो।

जीवन का उतना ही मूल्य होगा जितना तुम उसमें पैदा कर लोगे। जीवन केवल एक संभावना है। जीवन एक तरह का धन है।


ऐसा समझो, मैंने सुना है, एक कृपण आदमी था। उसके पास सोने की ईंट थीं। वे उसने अपनी तिजोरी में रख छोड़ी थीं। भूखा—प्यासा, रूखा—सूखा खाता था। बस रोज तिजोरी खोलकर अपनी सोने की ईंटों को देख लेता था। उसका बेटा जवान हुआ। उसने देखा, यह भी क्या पागलपन है! हमें खाने को नहीं, पीने को नहीं, ओढ़ने का ठीक वस्त्र नहीं, घर—द्वार ढंग का नहीं——और हमारे पास इतना धन है और बाप कुल इतना करता है कि तिजोरी खोलके, जैसे लोग मंदिर में जाकर भगवा; के दर्शन करते हैं। ऐसे सोने की ईंटे का दर्शन कर लेता है, प्रसन्न होकर, फिर तिजोरी बंद कर देता है! ये जो सोने की ईंटे है, इनका मूल्य केवल संभावना में है, पोटेंशियल है। अगर इनका उपयोग करो तो ही मूल्य है। अगर उपयोग न करो तो सोने की ईंटे रखी हैं तुमने तिजोरी में कि पत्थर की ईंटें रखी हैं, क्या फर्क पड़ता है?

बेटे ने एक होशियारी की। उसने पीतल की ईंटे बनवाईं, सोने का पालिश चढ़वाया और तिजोरी में बदल दीं। बाप वही करता रहा। रोज खोले तिजोरी—— अब तो पीतल की ईंटे थीं—— नमस्कार कर लें। बड़ा प्रसन्न हो जाए। बाप को तो कोई फर्क नहीं पड़ा।


धन तभी पता चलता है कि धन है जब तुम उसका उपयोग करो, अन्यथा निर्धन और धनी में क्या फर्क है? तुम अगर करोड़ों रुपए भी अपनी जमीन में गड़ाकर बैठे हो और भीख मांग रहे हो, तो तुम में और उस भिखमंगे में क्या फर्क है जिसके पास एक पैसा नहीं है? धन का मूल्य उपयोग में है। धन का मूल्य धन में नहीं है, उपयोग में है, उसके विनिमय में, एक्स्चेंज में है। धन जितना चले उतना उपयोगी हो जाता है। जितना तुम उसका रूपांतरण करो उतनी ही उपयोगिता बढ़ती जाती है।

इसलिए कंजूस के पास धन होता ही नहीं, क्योंकि धन गति में है। इसलिए तो अंग्रेजी में धन के लिए जो शब्द है, वह करेंसी है। करेंसी का मतलब : जो चलता रहे, बहता रहे। बहाव, जैसे नदी की धारा बहती है। चलने में। अगर अमरीका बहुत धनी है तो उसका कुल कारण इतना है कि अमरीका एकमात्र देश है जो धन का करेंसी होने का अर्थ समझता है; चलता रहे, बहता रहे। अगर यह हमारा देश गरीब है तो उसका कारण यही है कि हम धन को पकड़ना जानते हैं। और पकड़ते ही धन व्यर्थ हो जाता है। फिर सोने की ईंट में और पीतल की ईंट में कोई फर्क नहीं होता। बचाओ कि धन मर गया, तुमने गरदन घोंट दी। फैलाओ, उपयोग कर लो। जितना उपयोग कर लेते हो उतना उसका अर्थ है।


और यही जीवन—धन के संबंध में भी सच है। जीवन को पकड़कर मत बैठे रहो। कंजूस बनकर मत बैठे रहो। इसका उपयोग करो। फिर उपयोग जितना विराट करना चाहो, कर सकते हो। इससे चाहो तो कचरा खरीद सकते हो, उतना मूल्य होगा तुम्हारे जीवन का। इससे चाहो तो परमात्मा खरीद सकता हो, उतना मूल्य होगा तुम्हारे जीवन का। जीवन तो कोरी किताब है, तुम उस पर जो लिखोगे वही मूल्य हो जाएगा। गालियां लिख सकते हो, गीत लिख सकते हो। सब तुम पर निर्भर है।

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